
इप्टा द्वारा मुंबई के मैसूर एसोसिएशन माटुंगा में आयोजित आठ दिवसीय जितेंद्र रघुवंशी बहुभाषिक राष्ट्रीय नाट्य समारोह के अंतिम दिन इप्टा पटना का नाटक ‘कोर्टमार्शल’ प्रस्तुत किया गया। स्वदेश दीपक लिखित इस प्रसिद्ध नाटक का निर्देशन किया था तनवीर अख़्तर ने। अभिनेताओं का कसा हुआ अभिनय, स्पष्ट देहबोली और सुनिश्चित मंचीय गतियों के साथ संवादों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अर्थ-संदर्भों को भी निर्देशक और अभिनेताओं ने ईमानदारी से मंच पर साकार किया था। इसमें तनवीर अख़्तर की अनुभवी निर्देशकीय दृष्टि, वैचारिक गहराई और प्रस्तुति-शैली की समझ भी साफ़ झलक रही थी। 1991 में लिखे इस नाटक के अनेक संदर्भों को निर्देशक ने समसामयिकता से जोड़ा और सामाजिक ढाँचे में आसानी से किए जाने वाले अन्याय, शोषण के स्वीकार की पीड़ा को तीखेपन के साथ रेखांकित किया।

यह नाटक सीधा-स्पष्ट होने के बावजूद कई अर्थों में चुनौतीपूर्ण है क्योंकि नाटककार ने हरेक पात्र और दृश्य संबंधी तमाम डिटेल्स रंगमंचीय निर्देशों में लिख दिये हैं इसलिए यह नाटक शिल्प की दृष्टि से लचीला नहीं है। निर्देशक ने इसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समसामयिकता प्रदान करने के लिए मूल नाटक में दृश्यों के बीच में क्षेपक की तरह संवाद करते ‘चेहरों’ के स्थान पर सफ़ेद चोग़ों में लिपटी लाल-नीले प्रकाश में नहाई तीन ‘छायाओं’ को प्रस्तुत किया है तथा डिफेंस वकील बिकाश रॉय द्वारा शेक्सपियर के नाटक ‘हैमलेट’ का एक वाक्यांश ‘समथिंग इज़ रॉटन इन द स्टेट ऑफ़ डेनमार्क’ को उनके द्वारा दी जाने वाली सामूहिक चेतावनी के रूप में बार-बार प्रतिध्वनित कर न केवल नाटक में घटने वाली घटनाओं में बल्कि (हमारे देश की) वर्तमान व्यवस्था में भी बहुत कुछ सड़ा हुआ, भ्रष्ट, विकृत और अन्यायपूर्ण होने की ओर संकेत किया है। प्रकाश, ध्वनि तथा मंच-सज्जा का संतुलित प्रयोग नाटक के महत्त्वपूर्ण कथ्य के साथ न्याय कर रहा था। इस प्रभावपूर्ण प्रस्तुति के लिए इप्टा पटना के निर्देशक और समूची टीम बधाई की पात्र है।

इप्टा का 20 मई से 27 मई 2026 तक आयोजित यह नाट्य समारोह एक विशेष उद्देश्य से आयोजित किया गया था। समसामयिक महत्त्व के कुछ विषयों पर कुछ नई स्क्रिप्ट्स के साथ नए निर्देशकों, नए कलाकारों की नई सोच को अभिव्यक्त करने के लिए इसका आह्वान किया गया था। ‘सामाजिक न्याय – जाति-भेद, वर्ग और वर्ण-भेद, जेंडर-भेद, समाज की तथाकथित मुख्य धारा और आदिवासी समाज का द्वंद्व, विकास की अवधारणा तथा पर्यावरण का द्वंद्व, सांप्रदायिकता का ज़हर, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास, कृषि और उद्योगों की समस्याएँ आदि विषयों के वर्तमान संदर्भों को नई-पुरानी रचनाओं के माध्यम से मंच पर उतारने का प्रयास इस नाट्य समारोह की मूल प्रेरणा रहा है। इसमें इप्टा की विभिन्न राज्यों की इकाइयों ने शिरकत की। दिल्ली, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तरप्रदेश, ओड़िशा तथा राजस्थान के हिन्दी, तमिल, मराठी, पंजाबी, ओडिया तथा उर्दू नाटक प्रस्तुत हुए। इस नाट्य समारोह की मेज़बानी इप्टा मुंबई ने की। उद्घाटन दिवस, समापन दिवस तथा 25 मई को इप्टा के स्थापना दिवस पर इप्टा मुंबई द्वारा कबीर गीत-गायन और अन्य नाट्य-प्रस्तुतियाँ की गईं।

यहाँ समापन दिवस के अवसर पर प्रस्तुत नाटक ‘कोर्टमार्शल’ की सिर्फ़ प्रस्तुति पर बात करने के साथ-साथ मैं मूल नाट्यालेख पर भी बात करना चाहती हूँ क्योंकि उपर्युक्त सभी विषयों का निचोड़ इस नाटक के कथ्य में उपस्थित है।

विषमता पर आधारित भारत की समाज-व्यवस्था वर्गगत, जातिगत, क्षेत्रगत, लिंगगत ऊँच-नीच की अनेक श्रेणियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी से बँटी रही है और इसके आधार पर लोगों की व्यक्तिपरक और सामूहिक मानसिकता, सोच और व्यवहार उनके वर्चस्व और विशेषाधिकारवादी प्रवृत्तियों में झलकता है। कुछ तथाकथित ‘ऊँचे’ लोगों को तथाकथित ‘निचले’ लोगों को अपमानित करने में कुछ भी ग़लत नहीं लगता, बल्कि ऐसा करने से उन्हें एक प्रकार का विकृत आनंद और सत्ता-सुख का अहसास होता है। यह अन्याय कई स्तरों पर क्रूरता के साथ बरसों से होता आया है। आज तो इसके और भी नए-नए रूप सामने आ रहे हैं। कुछ ‘रामचन्दर’ आज भी इसके ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं, और सींखचों के पीछे बंद हो रहे हैं।

नाटक में रामचन्दर एक ऐसी जाति का पात्र है, जिसे कैप्टन बी डी कपूर और उसके सह-अधिकारियों द्वारा बार-बार जातिसूचक संबोधनों और आदेशों से अपमानित किया जाता है। समूचे नाटक में अनेक अधिकारियों द्वारा इस बात की पुष्टि की जाती है कि रामचन्दर न केवल एक कर्तव्यनिष्ठ, सत्यानिष्ठ, ईमानदार और सद्चरित्र व्यक्ति है, बल्कि एक शानदार धावक भी है। दिक़्क़त यह है कि इन गुणों के बावजूद शेष हर मामले में वह ‘छोटा’ है।
सेना में पृथक-पृथक काम करने वाले विभागों के कर्मचारियों और अधिकारियों को पृथक-पृथक नामों/पदों/ओहदों से पुकारा जाता है। ऊँचे ओहदे के अधिकारियों के इन पद-नामों का उल्लेख करने में बहुत सावधानी बरती जाती है, मगर नीचे के ओहदों के लोगों के लिए यह सावधानी नहीं बरती जाती। यह मानसिकता हमारे समूचे समाज में दिखाई देती है। नाटक की शुरुआत में ही डिफेंस वकील बिकाश रॉय रामचन्दर को ‘जवान’ कहने पर आपत्ति दर्ज करता है कि जब रामचन्दर बख़्तरबंद रेजिमेंट का है तो उसे ‘सवार’ कहा जाना चाहिए। ‘समता, समानता, बराबरी, सामाजिक न्याय, मनुष्यता, सम्मान आदि हरेक नागरिक को मिलना चाहिए, इसको केंद्र में रखकर भारत का संविधान गढ़ा गया है। मगर काग़ज़ पर अंकित इन अधिकारों को समाज के पीढ़ी-दर-पीढ़ी से विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग-जाति-लिंग के लोग नकारते आये हैं। ‘कोर्टमार्शल’ इन जीवन-मूल्यों की स्थापना के लिए, ग़ैरबराबरी की बद्धमूल मानसिकता को रेखांकित करने के लिए भरपूर भावनात्मकता, वैचारिकता के साथ नाटकीय उतार-चढ़ावों को शक्तिशाली संवादों के माध्यम से प्रस्तुत करने वाला नाटक है। कैप्टन कपूर को रामचन्दर को जातिगत गालियाँ देने में कुछ भी ग़लत नहीं लगता, परंतु जब बिकाश रॉय उसको उसके पूरे नाम ‘भिखारी दास कपूर’ से पुकारता है, तब वह बुरी तरह भड़क जाता है। “अगर आप भंगी को भंगी और चूहड़ा पुकार सकते हैं तो मैं आपको असली नाम से क्यों नहीं पुकार सकता? भिखारीदास कपूर!” बिकाश रॉय का सवाल सामाजिक विषमता के पाखंड को तार-तार करता है।

बिकाश रॉय के सवालों और दलीलों में पंक्ति-दर-पंक्ति यह बात खुलती जाती है कि, किस तरह हमारे समूचे समाज में जातिगत भेदभाव के अन्तर्गत तथाकथित ‘नीच’ या ‘छोटे’ लोगों को हमेशा अपमानित करना तथाकथित ‘ऊँचे’ और ‘ख़ानदानी’ लोगों का विशेषाधिकार रहा है। यह आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा-प्राप्त वर्ग अपने-आप को उसका स्वाभाविक हक़दार मान लेता है। इस वर्ग को विरासत में मिला है – अहंकार, वर्चस्ववाद, घृणा, मानसिक और शारीरिक शोषण करने की उसकी आदतें और अपने स्वार्थ के लिए किसी भी इंसान का कैसा भी ‘उपयोग’ करने की बेशर्मी – ये सभी आदतें कैप्टन कपूर की रग-रग में समाई हुई हैं। वह न केवल अपनी जाति, अपने ख़ानदान, अपने पद, बल्कि अपने पति होने के विशेषाधिकार का दुरुपयोग करता है।
कर्नल सूरत सिंह, जो नाटक के अंत में ब्रिगेडियर बन जाते हैं, मुक़दमे के दौरान क्रमशः बदलने वाला उनका नज़रिया नाटक के आरंभ से लेकर अंत तक एक क्रमशः ऊँचाइयों की ओर ले जाने वाला मानवता का ग्राफ बनाते हैं। वे रामचन्दर को सामान्य तौर पर हत्यारा मान चुके हैं मगर बचाव पक्ष के वकील बिकास रॉय के सवालों और खुलासों से उनके दृष्टिकोण में ३६० डिग्री का परिवर्तन दिखाई देता है। बिकास रॉय के पिता हाई कोर्ट के जज हैं, वहीं उसका एक भाई नक्सलाइट रहा है। उसकी इस पृष्ठभूमि के बावजूद उसकी सामाजिक न्याय-आधारित समझ, मानवीय गुणवत्ता तथा गहरी दलीलें पेश करने की क्षमता के आधार पर उसे उच्चाधिकारियों द्वारा दिल्ली से डिफेंस के लिए भेजा गया है। उसे नाटककार ने ‘आत्मा का अहेरी’ कहा है। मनुष्य-मन की व्यक्तिपरक और सामाजिक मनोविज्ञान की गुत्थियों को नाटक की कहानी में बारीकी से गूँथा गया है।

अभिनेताओं की देहभाषा और मंच पर पात्रों का चलना, उनकी मूवमेंट, उनकी नज़रों की भाषा, विभिन्न पात्रों की परस्पर आंगिक-वाचिक क्रिया-प्रतिक्रियाओं के साथ-साथ यहाँ तीन स्तरों पर श्रेणीकृत चरित्र सामने आते हैं – ज्यूरी सदस्य, अफ़सर और मंच पर उपस्थित तीन गार्डों के साथ आरोपी रामचन्दर। कैप्टन बी डी कपूर के घिनौने कारनामों की वजह से सभी गार्डों का उसके साथ सांकेतिक विद्रोही व्यवहार अन्याय के ख़िलाफ़ पृथक स्तर पर विरोध को अभिव्यक्त करते हैं। तीनों गार्ड्स और रामचन्दर ने अपने अभिनय से इस विरोध को बखूबी वाणी दी है।मुक़दमे के लगभग अंतिम पड़ाव पर ब्रिगेडियर सूरत सिंह द्वारा कैप्टन कपूर को स्वरक्षा के लिए एक पृथक रिवॉल्वर जारी करना, जश्न की पार्टी के दौरान उससे हाथ मिलाने तक से इनकार करना, रामचन्दर को पार्टी में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित करना और अंत में कपूर द्वारा उसी रिवॉल्वर से गोली दागकर आत्महत्या करना ‘काव्यगत न्याय’ के रूप में विकसित किया गया है।

इप्टा पटना की इस कसी हुई प्रस्तुति में मंच पर थे – श्रीकान्त किशोर, सुजीत कुमार, मनोज कुमार, दिनेश शर्मा, सुनील किशोर, अभिषेक शर्मा, शाक़िब ख़ान, दीपक कुमार, विशाल तिवारी, पीयूष सिंह, कुमार संजय और उज्जल कुमार। प्रकाश संचालन था राज कपूर का, वेशभूषा – विशाल तिवारी एवं दीपक कुमार की, मंच-सज्जा – दिनेश शर्मा व शाकिब ख़ान की, मंच सामग्री – उज्जल कुमार, कुमार संजय की, रंगसज्जा – दीपक कुमार की, ध्वनि-प्रभाव एवं संगीत था कुमार सौरभ का, प्रस्तुति नियंत्रक थे पीयूष सिंह। नाटककार स्वदेश दीपक तथा परिकल्पना एवं निर्देशन था तनवीर अख़्तर का।
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27 मई 2026 को नाट्य समारोह के अंतिम दिवस के समापन पर इप्टा मुंबई का नाटक प्रस्तुत हुआ – ‘हम परवाने’। सागर सरहदी द्वारा लिखित अशफ़ाकुल्लाह ख़ान वारसी के क्रांतिकारी चरित्र को उभारते हुए इस नाटक का निर्देशन किया था रमेश तलवार ने। अशफ़ाकुल्लाह ख़ान और रामप्रसाद बिस्मिल के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद और महान देशभक्ति के जज़्बे को, उनके निर्णयों को जेल की कुछ घटनाओं के माध्यम से साकार किया गया।


अशफ़ाकुल्लाह ख़ान एवं उनके कुछ साथियों को काकोरी षड्यंत्र रचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। 9 अगस्त 1925 को शाहजहांपुर से लखनऊ जाने वाली 8 डाउन ट्रेन को उन्होंने लूटा था ताकि ब्रिटिश सरकार के ख़ज़ाने में सेंध लगाई जा सके। इसके लिए अशफ़ाकुल्लाह ख़ान, रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को 1927 में फाँसी दी गई थी। उनके इस बलिदान से प्रेरणा लेकर आगे चलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन की स्थापना हुई, जिसे भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद ने क्रांतिकारी कदम उठाते हुए आगे बढ़ाया। नाटक में धर्मनिरपेक्ष, एकजुट तथा लोकतांत्रिक भारत के उनके सपनों को साकार किया गया है।

मंच पर इसे साकार किया – आसिफ़ शेख़, अवतार गिल, मसूद अख़्तर, विकास रावत, नीरज पांडेय, अकबर ख़ान एवं विकास यादव ने। मंच-परिकल्पना थी एम एस सत्थ्यू की, संगीत परिकल्पना कुलदीप सिंह की, निर्देशन रमेश तलवार का तथा नाट्यलेख था सागर सरहदी का।
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इप्टा द्वारा आयोजित आठ दिवसीय जितेंद्र रघुवंशी बहुभाषिक राष्ट्रीय नाट्य समारोह का समापन करते हुए इप्टा के कार्यकारी अध्यक्ष राकेश वेदा तथा राष्ट्रीय महासचिव तनवीर अख़्तर ने मुंबई के दर्शकों का तथा आयोजक इकाई इप्टा मुंबई के सभी साथियों के प्रति आभार प्रकट किया। साथ ही इप्टा मुंबई की अध्यक्ष सुलभा आर्य एवं महासचिव मसूद अख़्तर ने समूचे आयोजन में सहयोगी सभी व्यक्तियों और संस्थानों को धन्यवाद दिया।

