
आज भारतीय जन नाट्य संघ (indian Peoples Theatre Association – IPTA) का 84 वाँ स्थापना दिवस है। 25 मई 1943 को पहली बार औपनिवेशिक भारत के विभिन्न राज्यों और रियासतों के विभिन्न कलाकारों और समूहों ने इसी मुंबई में इकट्ठा होकर इप्टा की स्थापना की थी। अब 2026 में फिर एक बार इप्टा की विभिन्न राज्यों की इकाइयाँ मुंबई में एक साथ आठ दिनों तक नाटकों, गीतों और संवाद का आदान-प्रदान कर रही हैं।
जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय नाट्य समारोह का आयोजन 20 से 27 मई 2026 तक मुंबई के मैसूर एसोसिएशन ऑडिटोरियम में किया जा रहा है। इप्टा की राष्ट्रीय समिति के नेतृत्व में तथा मुंबई इप्टा की मेज़बानी में संपन्न होने वाले इस नाट्य समारोह में अब तक इप्टा की दिल्ली, तमिलनाडु, नाशिक, कपूरथला पंजाब, इंदौर मध्य प्रदेश और लखनऊ उत्तर प्रदेश के हिन्दी, तमिल, पंजाबी और मराठी भाषाओं के नाटक मंचित किए जा चुके हैं। इप्टा की विभिन्न राज्य इकाइयों ने इस नाट्य समारोह के लिए कुछ विशेष विषयों पर – आदिवासी, दलित एवं जेंडर के सवाल, विषमता और सामाजिक न्याय, दमन, सांप्रदायिकता, पर्यावरण असंतुलन, बाज़ारवाद और साम्राज्यवाद के विभिन्न चरण और चेहरे, वैज्ञानिक चेतना पर नए नाट्यालेख तैयार किए हैं। विभिन्न शैलियों में प्रस्तुत इन बहुभाषीय नाटकों में भारतीय संस्कृति की विभिन्न छवियाँ उभरकर आ रही हैं। हम कोशिश कर रहे हैं कि हरेक दिन प्रस्तुत होने वाले नाटकों की रिपोर्ट यहाँ दर्ज करें।

23 मई 2026 को दो नाटकों का मंचन हुआ। पहला नाटक था पंजाबी भाषा में इप्टा पंजाब का ‘कुढ़े विच ख़िदेया गुलाब’। डॉ. दविंदर कुमार द्वारा लिखित इस नाटक में एक सफ़ाईकर्मी बाप-बेटे की कहानी में वर्ण और वर्ग की विषम स्थितियों और मानसिकताओं को बुना गया है। कुछ हद तक सरलीकृत कहानी और चरित्रों में प्रस्तुत किए गए इस नाटक में एक युवा सफ़ाईकर्मी का अपनी प्रतिभा और आत्मविश्वास के बल पर विपरीत परिस्थितियों में आईएएस पास करने का क़िस्सा बयान है। भारतीय संविधान के आधार में बुने गए सपनों के अनुसार हरेक नागरिक को समान अवसर मिलने की संभावना पैदा हुई है। समाज में कुछ इने-गिने उदाहरण भी सामने आए हैं कि वे विषम आर्थिक, सामाजिक परिस्थिति में पैदा होने के बावजूद सफलता की सीढ़ियाँ लाँघते हुए प्रतिष्ठित पदों पर आसीन हुए। हालाँकि डॉ. आम्बेडकर के ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ नारे से जन-जागरण हुआ है, मगर समानता अभी भी कोसों दूर है। अधिकांश पिछड़े समुदाय अभी भी हाशिये पर ही खड़े हैं, बल्कि नवउदारवादी क्रोनी कैपिटलिज्म उन्हें और ज़्यादा पीछे धकेलने का काम कर रहा है।

ग्रेजुएशन के बाद भी प्यारेलाल को तहसीलदार के घर सफ़ाई जैसे कामों में लगाया जाता है। मगर वहाँ तहसीलदार के पिता और प्यारेलाल के शिक्षक और उसकी पोती के प्रोत्साहन से वह आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण हो जाता है। समाज के कई लोग और तहसीलदार की पत्नी, जो पहले प्यारेलाल को दुरदुराया करती थी, उन सबका रवैया बदल जाता है। प्यारेलाल और तहसीलदार की बेटी के बीच जातियों की दीवार तोड़कर प्रेम खिलता है। नाटक में एक ओर जातिभेद, शोषण, अन्याय, पाखंड से भरे चरित्र हैं तो दूसरी ओर मानवीयता से लबरेज़ पात्र भी हैं।

मंच पर थे – कश्मीरी लाल, सरबजीत रूपोवाली, दलजीत सोना, शरनजीत सोहल, दीपक नाहर, आँचल नाहर, जसमीत सिंह, अनमोल सिंघा, लालकृष्ण तथा जसलीन कौर। संगीत था दलजीत सोना का, पार्श्व गायन जसलीन कौर का, मंच-सज्जा सावन रूपोवाली और प्रकाश परिकल्पना थी अनमोलप्रीत रूपोवाली की। निर्देशक थे इंद्रजीत रूपोवाली।
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नाटक शुरू होने से पहले इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव तनवीर अख़्तर ने प्रस्तुत नाट्य समारोह की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए पूर्व महासचिव जितेंद्र रघुवंशी के व्यक्तित्व और कृतित्व की जानकारी प्रदान की, जिनकी स्मृति को यह समारोह समर्पित है। इप्टा बीच में कुछ वर्षों तक छुटपुट रूप में काम कर रही थी, इसमें राजेंद्र रघुवंशी, जितेंद्र रघुवंशी के अलावा राकेश, हिमांशु राय, तनवीर अख़्तर, राजेश श्रीवास्तव जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश के साथियों के साथ-साथ वे साथी भी 1985 में इकट्ठा हुए, जो 1957-58 में इप्टा से जुड़े हुए थे और फिर एक बार इप्टा का राष्ट्रीय स्तर पर पुनर्गठन किया गया, देश भर में गतिविधियाँ फिर से नए सिरे से शुरू हुईं, जो आज भी जारी हैं।
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23 मई का दूसरा नाटक इप्टा इंदौर का था – ‘आज़ादी के तराने’। जया मेहता और विनीत तिवारी ने काफ़ी शोधपूर्वक नाट्यालेख लिखा है। इसमें 1942 से 1947 तक की कुछेक ऐसी जगहों और घटनाओं का ज़िक्र तथा वर्णन है, जिससे स्पष्ट होता है कि भले ही देश के स्वतंत्रता आंदोलन में हम चंद नेतृत्वकारी नामों को जानते हों, मगर सामान्य जनता भी अपने देश को आज़ाद करने में तन-मन-धन से लगी हुई थी। अपने नेताओं और देश पर अपनी जान क़ुर्बान करने के लिए स्त्री-पुरुष-बच्चे तक नहीं हिचकते थे। आज़ादी का जज़्बा सबके दिलों में हिलोरें मारता रहता था। नाटक समाप्त होने के बाद प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक आनंद पटवर्धन ने रेखांकित किया कि, ‘आज़ादी की लड़ाई में कौन नहीं थे? यह भी दिखाता है यह नाटक। वो नहीं थे, जो आज देश चला रहे हैं। उनका कोई भी प्रतिनिधि इस नाटक में नहीं था।”

नाटक की शुरुआत होती है 8 अगस्त 1942 को गोवलिया टैंक मुंबई से। किस तरह देश भर से किसान, मज़दूर, औरतें, विद्यार्थी और सामान्य लोग वहाँ एकत्रित हो रहे थे! इसी तरह महाराष्ट्र के चिमुर (ज़िला चन्द्रपुर) में संत गाडगे बाबा के नेतृत्व में अहिंसात्मक आंदोलन चला, इसी तरह उत्तर प्रदेश के बलिया में क्रांतिकारी चित्तू पांडेय को, जिन्हें ‘शेर-ए-बलिया’ कहा जाता था, जेल से मुक्त करने के लिए लोग इकट्ठे हुए। नाटक में इस बात की याद दिलाई गई कि 1942 में ही पहली बार बलिया में कुछ समय के लिए ही क्यों न हो, समानांतर सरकार का गठन किया गया था। तीसरी घटना थी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में पड़े हुए भयानक अकाल की, जहाँ अंग्रेज़ सरकार ने जापानी सेना के आक्रमण को रोकने के लिए अनाज की बोरियाँ और नावें बाहर भिजवाकर कृत्रिम अकाल की स्थिति पैदा कर दी थी। इनके अलावा कुछ अन्य घटनाओं के संदर्भ भी नाटक में आते हैं, जिनके बारे में सामान्य लोगों में कम जानकारी है।


उजान जैसे किशोरों से लेकर हरनाम सिंह जैसे उम्रदराज़ साथियों की लगभग 20 कलाकारों की सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से निर्देशक द्वय गुलरेज़ ख़ान एवं सारिका श्रीवास्तव ने इतिहास के पन्नों को मंच पर एक आकर्षक वृत्तचित्र की तरह प्रस्तुत किया। आज़ादी के आंदोलन में स्त्रियों की बड़ी संख्या थी, इसे नाटक में भी स्त्री कलाकारों की भरपूर उपस्थिति और मंचीय गतिविधियों में उनकी सक्रिय भागीदारी व्यक्त करती थी। रेडियो की खबरें, आंदोलन के फ्लेक्स पर दर्शाए गए चित्र, अख़बार बेचने वाले की पुकार आदि बातें विशेष काल को अभिव्यक्त करने में सफल रहीं। 15 अगस्त 1947 को मिली आज़ादी का जश्न और आज भी आज़ादी के मीठे फल सब तक नहीं पहुँचने का संदेश चिंतनीय है। अंत में जोड़ा गया ‘इप्टा और ख़्वाजा अहमद अब्बास’ का अंश एक क्षेपक की तरह मालूम हुआ। फिर भी इतनी बड़ी टीम को लगातार मंच पर अनेक ऐतिहासिक घटनाओं में संलग्न दिखाना सराहनीय है।

मंच पर थे – आयुष अहीरवार, भास्कर मिश्रा, देवराज सिंह, गीतांजलि साँवरिया, गुलरेज़ ख़ान, हरनाम सिंह, ईशिका शर्मा, मधु वेद, नीपा पंड्या, नीता जैन, निर्मल जैन, राशि मालवीय, सत्यभामा, शब्बीर हुसैन, शाहरुख़, उजान बनर्जी, विनीत तिवारी, विशाल यादव, अभित तथा राजवीर। विशेष मार्गदर्शन था फ्लोरा बोस का, प्रकाश और संगीत परिकल्पना जया मेहता और सारिका श्रीवास्तव की थी।
इप्टा द्वारा आयोजित जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय नाट्य समारोह के सातवें दिन २६ मई २०२६ को मैसूर एसोसिएशन माटुंगा में इप्टा ओड़िशा का ओडिया नाटक ‘EKA NUA SAKALARA APEKHYARE’ (लेखक : डॉ बिधुभूषण पण्डा, निर्देशक : बिक्रम केशरी जेना) शाम 6 बजे तथा रात 8 बजे इप्टा जोधपुर का हिन्दी नाटक ‘थाली का बैंगन’ (क्रिशन चंदर की कहानी पर आधारित, रूपांतरण, परिकल्पना एवं निर्देशन : डॉ विकास कपूर) प्रस्तुत किया जाएगा। टिकट प्रेक्षागृह में सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक उपलब्ध होंगे।
