
“हम शिवाजी की कहानी कहने के लिए आए हैं, मगर उनके बारे में जो बातें अब तक लोगों को नहीं पता थीं, उन्हें बताए जाने की ज़रूरत आन पड़ी है।”
“माँ, अच्छी किताब और बुरी किताब के बीच क्या पहचान होती है?”
“जिस किताब के विचार हमें अच्छे लगते हैं, सही लगते हैं, वह सच्ची किताब है और जिसके विचार हमें नहीं भाते…”
“वे बुरे विचार? यह सवाल तो तलवार की धार पर चलने जैसा है।”
“किताब को परखने की दृष्टि जब वस्तुनिष्ठ होती है, तभी उसके सही और ग़लत होने को पहचाना जा सकता है।”
“इंसान को इंसान से जोड़ने वाली किताब अच्छी और सच्ची होती है, इंसान को इंसान से तोड़ने वाली किताब ग़लत और बुरी होती है।”
“आज का संघर्ष है अविवेक से, भूख से, बेरोज़गारी से, जल-जंगल-ज़मीन के लिए, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए और साथ ही ग़ायब होती जा रही इंसानियत के लिए भी… अगर हम इसी तरह नफ़रत फैलाते रहें तो हमें वापस जानवर बनने में समय नहीं लगेगा।”
(मराठी नाटक ‘शिवाजी अंडर ग्राउंड इन भीमनगर मोहल्ला’ के संवादों की झलक)

काफ़ी लंबी प्रतीक्षा के बाद अंततः पिछले हफ़्ते ‘शिवाजी अंडरग्राउंड इन भीमनगर मोहल्ला’ दूसरी बार देखा। 2012 से लगातार मंचित होने वाले इस मराठी नाटक का यह 945 वाँ मंचन था। यह नाटक एक दीर्घ विचार और अभ्यास-प्रक्रिया के बाद महाराष्ट्र के जालना ज़िले के एक गाँव के कलाकारों और कुछ अन्य प्रशिक्षित कलाकारों के साथ तैयार किया गया था। ‘रंगमळा’ (रंगों/रंगमंच की खेती) नाट्य संस्था के बैनर पर मंचित, लोकप्रिय शाहिर संभाजी भगत की संकल्पना और गीत-संगीत पर केंद्रित यह नाटक लिखा है राजकुमार तांगडे ने। मंचन के बारे में बाद में बताती हूँ, पहले इसकी पृष्ठभूमि बयाँ कर दूँ।


कॉम. गोविंद पानसरे की लिखी किताब ‘शिवाजी कौन था?’ अनेक भाषाओं में लोकप्रिय है। महाराष्ट्र में शिवाजी की एक गढ़ी गई छद्म छवि प्रचलित है, जिसके अनुसार शिवाजी को ‘छत्रपति शिवाजी महाराज’ कहना अनिवार्य है। इस छवि के अनुसार उन्हें ‘गो-ब्राह्मण-प्रतिपालक’ कहा जाता है। उन्होंने मुस्लिमों के अत्याचार के ख़िलाफ़ मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी आदि आदि बातें एक वर्ग द्वारा बहुत श्रद्धा और कट्टर भावुकता के साथ कही जाती हैं। शिवाजी की दूसरी छवि है ‘रैयत के राजा’ की। अर्थात् उनके लिए अपनी प्रजा का हित ही सर्वोपरि था। उनकी जन-कल्याणकारी योजनाओं और नीतियों के बारे में कई दस्तावेज़ और किताबें उपलब्ध हैं। जिन लोगों ने आज से 15-20 साल पहले का पाठ्यपुस्तकीय इतिहास भी पढ़ा होगा और जो इतिहास में ‘वस्तुगत तथ्यों’ पर ध्यान देते रहे हैं, उन्हें शिवाजी की पहली छवि पर तुरंत संदेह हो सकता है। क्योंकि इतिहास की किताबों में मराठा-मुग़ल दोनों तरफ़ की सेनाओं और दरबारों में हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्मों के नामों की एक लंबी मिश्रित फ़ेहरिस्त हमें मिलती है। साथ ही यह उल्लेख भी निर्विवाद दर्ज़ है कि शिवाजी के राज्याभिषेक का सभी स्थानीय ब्राह्मणों ने निषेध किया था और बनारस से पंडित बुलाकर तमाम कर्मकांड संपन्न किए गए थे। इसी तरह, शिवाजी द्वारा स्त्रियों के प्रति सम्मान प्रकट किए जाने के भी कई क़िस्से मशहूर हैं। उनकी सेना के किसी भी व्यक्ति द्वारा विजित पक्ष की किसी स्त्री का असम्मान उन्होंने कभी बर्दाश्त नहीं किया था। तो, इस तरह की कई बातें शिवाजी के प्रगतिशील चरित्र के बारे में इतिहास के पन्नों पर दर्ज़ रही हैं। मगर इन दिनों शिवाजी की छद्म छवि पर न जाने कितनी ही फ़िल्में बनी हैं और न जाने कितने ही विवाद (शायद जानबूझकर) रचे गए हैं। ‘शिवाजी अंडरग्राउंड इन भीमनगर मोहल्ला’ की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह नाटक इन दोनों छवियों के बरक्स तथ्यों की पड़ताल करता है और असहमतियों के बीच भी खुले संवाद की वकालत करता है।

तो, पहले मैं इस नाटक की रचना-प्रक्रिया या इसकी संकल्पना से लेकर, लिखने और निर्देशन-प्रक्रिया के परिवर्तनशील चरणों के बारे में बता दूँ। 2015 में हुई बातचीत के बाद अभी जब मैंने नाटक देखा, उस बीच इस नाटक पर केंद्रित अनेक रिपोर्ट्स, साक्षात्कार और वीडियोज़ का अध्ययन किया। कुछ बातें बिंदुओं के रूप में अंकित करना चाहती हूँ :
- इस नाटक की तैयारी में एक उद्देश्य से प्रेरित, मगर अलग-अलग नाट्यसंस्थाओं और जन-आंदोलनों में सक्रिय लोग इकट्ठा हुए थे। संभाजी भगत की संकल्पना (जो आंबेडकरी आंदोलन में सक्रिय रहे हैं), नंदू भगत (जिन्होंने उस समय इस नाटक के निर्देशन का जिम्मा लिया), मुख्य पात्रों में से एक संभाजी तांगड़े (पेशे से प्राध्यापक) कैलाश वाघमारे, जो मुंबई विश्वविद्यालय के नाट्य विभाग से प्रशिक्षित अभिनेता हैं जैसे कई लोग एक साथ जुटे थे। यह नाटक इस बात का साक्षी है कि पृथक-पृथक व्यक्तियों के विचार, गुण या प्रतिभा जब सामुदायिक रूप में एक जगह पर एक लक्ष्य के लिए समर्पित होकर कुछ नया रचते हैं, तब किसी शक्तिशाली रचना का सृजन होता है। इसलिए इस नाटक की सफलता का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता।
- नाटक तैयार करने के लिए योजना बनाई गई थी कि हरेक महीने की 1 से 10 तारीख़ तक सभी कलाकार अपने-अपने काम से छुट्टी लेकर समर्पित भाव से एक साथ बस्ती से दूरस्थ स्थान पर रहकर काम करेंगे। यहाँ सभी कलाकार शिवाजी से संबंधित अनेक किताबें लेकर आते थे। हरेक व्यक्ति अपनी बात साझा करता था। इस प्रक्रिया में अनेक लेखक, पत्रकार, विचारक, कलाकारों का योगदान रहा है।
- कॉम. गोविंद पानसरे की किताब ‘शिवाजी कौन था’ से शिवाजी के मूल विचार और कामों के बारे में पढ़ा। कॉम. शरद पाटील की किताब ‘शिवाजी के शत्रु’ और अनेक लेखकों और इतिहासकारों की किताबों के माध्यम से इतिहास जाना गया। नाटक में इतिहास को छोटे-छोटे हिस्सों में पिरोया गया है। इसे सिर्फ़ इतिहास के रूप में न रखते हुए उसे नाटक में कैसे बदला जाए, इस पर लंबी बात हुई। हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी भूमिका तय करते हुए ज़िम्मेदारी से काम किया। संभाजी तांगड़े और कैलाश वाघमारे दो प्रमुख शाहिर की भूमिका में हैं और बाद में निर्देशन भी करते हैं, तो उन्होंने इन दोनों पहलुओं पर सूक्ष्म अध्ययन और विचार किया। यह प्रस्तुति गहन अध्ययन और गहरी समझ के साथ भरपूर मेहनत कर संयुक्त रूप से गढ़ी गई है। इसलिए यह बहुत परिपक्व है। राजकुमार तांगड़े को इसका नाट्यालेख तैयार करने में डेढ़ साल लगा।
- आश्चर्य की बात है कि आज के ‘भावनाएँ आहत होने वाले’ काल में भी इस नाटक के किसी भी मंचन में कभी हंगामा नहीं हुआ। (हालाँकि कुछ शो हंगामा होने के डर से आयोजकों ने रद्द किए। पुणे विश्वविद्यालय का एक मंचन रद्द होने की बात समाचारों में भी छाई थी) कैलाश वाघमारे ने इसका कारण बताते हुए एक साक्षात्कार में कहा कि इस नाटक में एक-एक तथ्य को इस तरह जाँच-परखकर नाटक में शामिल किया गया है कि कोई इन पर ऑब्जेक्शन नहीं उठा पाता है। कोई इसका विरोध नहीं कर पाता है। यह नाटक महज़ नाटक लिखने के लिए नहीं लिखा गया था, बल्कि शिवाजी के बहुआयामी व्यक्तित्व, कृतित्व और विचारधारा से लोगों को रूबरू करने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इसकी कथा और गीत रचे गए।
- नाटक राजनीतिक है, मगर इसका किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं है। यह नाटक उन तथ्यों पर आधारित है कि शिवाजी महाराज ने हर तरह के जाति-धर्म के लोगों को लेकर ‘स्वराज्य’ की स्थापना की थी और उनके विचार और नीतियाँ भी बहुत प्रगतिशील और उदार थीं। यह नाटक भी सामाजिक एकता का नाटक है। इस नाटक में शिवाजी का दो प्रकार का चित्रण आमने-सामने रखा गया है – पहला, महात्मा फुले, डॉ आंबेडकर द्वारा चित्रित जनता का भला करने वाले शिवाजी का जीवन और दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों द्वारा गढ़ा गया शिवाजी का चमत्कारपूर्ण जीवन – ये दोनों समानांतर रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। इसे दो शाहिरों की ‘जुगलबंदी’ के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इसलिए दर्शक इसका अंतर स्वयं समझ लेते हैं।
- नाटक के इस 945 वें मंचन की विशेषता यह थी कि पहली बार नाटक के संकल्पक संभाजी भगत ख़ुद यम की प्रारंभिक भूमिका में थे। उनके अलावा मंच पर थे – कैलाश वाघमारे, संभाजी तांगड़े, मीनाक्षी राठौर, राजकुमार तांगड़े, प्रवीण डालिंबकर, गजेंद्र तांगड़े, संघराज वाघमारे, डॉ. अश्विनी भालेकर, मधुकर बिड़वे, अशोक देवकर, किशोर उढ़ान, रागिनी वाघमारे और राजू सावंत। सितंबर 2025 से इस नाटक के नए सिरे से प्रदर्शन आयोजित करने वाले निर्माता राहुल भंडारे हैं, जिनके कारण नई मंच-सज्जा और वस्त्र-सज्जा के साथ नाटक के लगातार मंचन हो रहे हैं।
- कलाकारों का मानना है कि अगर हम नई पीढ़ी को सरल तरीक़े से कुछ समझाकर बता सकें, तो हम सफल कहला सकते हैं। यह नाटक यह काम पर्फेक्ट्ली करता है।

कथा इस प्रकार है – स्वर्ग में इंद्र यमराज को बुलाकर आदेश देता है कि पृथ्वी पर जाकर छत्रपति शिवाजी महाराज को उनके विचारों सहित लेकर आओ। यमराज आदेशानुसार शिवाजी को लेकर मर्त्यलोक से स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान करता है। रास्ते में इंद्र का फ़ोन आता है, जो याद दिलाता है कि शिवाजी को उनके विचारों के साथ लाना है। यमराज हड़बड़ाकर शिवाजी से पूछता है कि “महाराज! आपका मस्तिष्क और आपके विचार भी आपने लिए हैं न?” शिवाजी चतुर व्यक्तित्व के स्वामी रहे हैं। वे कहते हैं कि उन्हें अगर पहले ही बताया जाता तो वे अपना मस्तिष्क और विचारों को साथ लेकर आते! यमराज को सख़्त आदेश मिला था सो वह शिवाजी से विनती करता है कि वे जल्दी से जाकर अपना मस्तिष्क और विचार लेकर आवें। शिवाजी अपनी विशिष्ट पगड़ी ‘शिरटोप’ उतारकर यमराज को रेहन के रूप में थमा देता है और अपने ‘मस्तिष्क और विचारों’ को लाने चला जाता है। यमराज इंतज़ार करता रहता है मगर शिवाजी लौटकर नहीं आते।

इंद्र को इस बात का पता चलते ही वह यमराज को सस्पेंड कर देता है और कहता है कि जब तक वह शिवाजी को उनके मस्तिष्क और विचारों के साथ नहीं लाएगा, उसे पृथ्वी पर ही रहना होगा। तब से लेकर आज तक यमराज शिवाजी की खोज में उनकी पगड़ी किसके सिर पर फिट हो सकती है, उसे खोजते हुए भटकने लगता है। खोजते-खोजते वह भीमनगर मोहल्ले में पहुँचता है, जहाँ शेष नाटक घटित होता है। यमराज एक ऐसे परिवार में पहुँचता है, जहाँ तीन पीढ़ियों में शिवाजी के मूल चरित्र, उनके कार्यों और उनकी राज्य-नीतियों से संबंधित इतिहास पर बातचीत चल रही है। बच्ची वैशाली अपनी पाठ्य पुस्तक में शिवाजी के बारे में पढ़ते हुए सवाल करती है कि शिवाजी के बारे में संक्षेप में क्या लिखे? जब उसे जवाब मिलता है कि इसके लिए उसे अच्छी किताबें पढ़नी होंगी तब वह पूछती है कि अच्छी-बुरी किताब की पहचान क्या है? इसे कैसे पहचानें? बच्ची के इस मासूम सवाल पर उसकी माँ बताती है कि जो मनुष्य को मनुष्य की तरह समझे, दिखाए, वही अच्छी किताब होगी और जो किताब मनुष्य को आपस में बाँटें वह बुरी किताब है।
इसी बीच एक धार्मिक राजनीतिक दल एक लोकशाहीरी जलसे को शिवाजी जयंती के दिन गाने के लिए आमंत्रित करना चाहता है। वह जब बड़े शाहीर के पास निमंत्रित करने आता है, तब वह अपनी मजबूरी बताते हैं कि उनका मुख्य गायक अभी उनके दल में नहीं है, उसने गाने से मना कर दिया है। तय होता है कि मुख्य गायक को मनाने के लिए सभी लोग उसके घर भीमनगर मोहल्ला जाएँगे। वे युवा शाहिर मिलिंद से मिलते हैं। मिलिंद उनसे कहता है कि वह पुरानी और झूठी बातें अब पोवाड़ों में नहीं कहना चाहता। उसे आश्वस्त कर ले जाया जाता है, मगर शिव जयंती के दिन मंच पर ही जब वह वरिष्ठ शाहिर द्वारा प्रस्तुत की जा रही मिथकीय बातों को फिर से सुनता है तो तुरंत उनका विरोध करता है। बात-बात में झगड़ा बढ़ता है और अंततः यह तय किया जाता है कि दोनों शाहिरों के पोवाड़ों की जुगलबंदी करवाई जाए। निर्धारित दिन जुगलबंदी होती है, जिसमें शिवाजी द्वारा किए गए कृषि व सिंचाई संबंधी काम, उनकी आर्थिक नीति, राजनीति, महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण, सर्वधर्म समभाव आदि पहलुओं पर तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं।

इसमें एक मुस्लिम चरित्र है – पाशा, वह भी शाहिरी जलसे का एक सदस्य है। मगर जब धार्मिक दृष्टिकोण और प्रगतिशील दृष्टिकोण के दो शाहिरों में जुगलबंदी होती है तो उसे महसूस होता है कि उसके मुस्लिम होने के कारण किस प्रकार उसके साथ अब तक व्यवहार होता रहा है, तब वह प्रगतिशील मिलिंद के साथ आ जाता है। इसी तरह यमराज का चरित्र और उसका पूरे नाटक की कथा और मंचीय गतिविधियों के साथ संलग्न होना बहुत दिलचस्प है। यमराज एक ऑब्ज़र्वर के रूप में दिखाई देता है और कहीं-कहीं आवश्यक हस्तक्षेप भी करता है। कम संवाद होने के बावजूद वह हरेक गौण व्यक्ति के साथ अपनी देह-भाषा या छोटे संवादों के माध्यम से जुड़ता है, उसकी गतिविधियों में एक भिन्न भाव झलकता है। बच्ची वैशाली के साथ उसका व्यवहार, उसका बस्ता सम्हालना, उससे सहज संवाद, वैशाली की माँ द्वारा उसे ख़ाना परोसना और उसका उस परिवार के साथ रहकर शिवाजी के विचारों के साथ की यात्रा करना बहुत रोचक है। राजनीतिक-धार्मिक दल के दो अंधभक्त ‘कार्यकर्ता’, जिन्हें तलवार और फरसा सम्हालने की ज़िम्मेदारी उनके नेता दे देते हैं, वे ब्रेख़्तीय शैली में कई दृश्यों के अंत में उन हथियारों को दिखाते हुए पूछते हैं – “इनका क्या करें?” (यह दृश्य धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध नाटक ‘अंधा युग’ के प्रहरियों की याद दिलाता है। उन दिनों वे प्रहरी कम से कम प्रश्नों को लेकर संशयित तो रहते थे, मगर आज के अनुयायी अंधानुकरण के लिए अनुकूलित किए गए हैं) नाटक के अंतिम दृश्य में यम वैशाली के साथ स्कूल जाते हुए उससे एक कॉपी और पेन माँगता है और उन दोनों के हाथ से हथियार लेकर उनके हाथ में कॉपी-पेन थमाता है और उन्हें ‘शिक्षित बनने’ के लिए भेज देता है। इस तरह उन्हें राजनीतिक दलों द्वारा ‘उपयोग’ किए जाने से छुटकारा दिलाकर उनके व्यक्तिगत विकास के लिए प्रेरित करता है। नाटक के अंत में शिवाजी द्वारा रेहन रखा हुआ ‘जिरेटोप’ (विशेष प्रकार की पगड़ी) मंच के बीचोंबीच रखकर यम उसे और उसके मध्यम से शिवाजी के जन-प्रतिबद्ध विचारों को दर्शकरूपी जनता को समर्पित करता है और कामना करता है कि शिवाजी के विचारों को सभी दर्शक समझेंगे और उन पर अमल करेंगे।

पोवाड़ों का वीर रस, ऊर्जा, उत्साह संचारित करने वाली और आव्हान करने वाली दमदार गायक आवाज़ें, पारंपरिक धुनें, शाहिरी शैली में गद्य में भी प्रबोधन करने वाले लययुक्त संवाद और सामुदायिक गतियाँ दर्शकों को बाँधे रखती हैं। नाटक की कथा और प्रस्तुति इसे समसामयिक बनाने के साथ-साथ इतिहास-दृष्टि और इतिहास-बोध के प्रति भी दर्शकों को सजग करती है। तथ्यपरक और तार्किक इतिहास को किस तरह मिथकीय इतिहास में बदला जा रहा है, इसका चित्रण तो नाटक में है ही, मगर वास्तविक इतिहास को रोचक और वस्तुपरकता के साथ किस तरह सांस्कृतिक धरातल पर प्रस्तुत किया जा सकता है, इसका कलात्मक उदाहरण भी यह नाटक प्रस्तुत करता है।

सितंबर 2025 से यह नाटक दोबारा महाराष्ट्र के व्यावसायिक रंगमंच पर शुरू किया गया है। इस पर इस नाटक की परिकल्पना और गीत-संगीत रचने वाले संभाजी भगत का कथन है कि “शिवाजी के जीवन-काल में उनके विचारों की जितनी आवश्यकता थी, उससे कई गुना ज़्यादा आवश्यकता आज है। वर्तमान में समाज में विभाजन का दौर चल रहा है। किसी एक धार्मिक राष्ट्र के निर्माण की ओर ले जाने का काम चल रहा है, जो इस युग के लिए बहुत नुक़सानदेह है। साथ ही इस अभियान में शिवाजी महाराज का जिस तरह उपयोग किया जा रहा है, इतिहास का जो ‘डिस्टॉर्शन’ किया जा रहा है, वह भयानक है। इसलिए इस नाटक की आज ज़्यादा ज़रूरत है।” (बीबीसी मराठी प्रतिनिधि 20 अप्रैल 2026, श्रीकान्त बंगाले से उद्धृत)
