(pwaindia नामक यूट्यूब चैनल पर 01 मई 2026 को संयोजक-लेखक साथी प्रेमचंद गांधी ने उपर्युक्त शीर्षक से एक परिसंवाद प्रसारित किया था (प्रसारण अवधि 1 घंटा 28 मिनट 50 सेकंड) इच्छुक पाठक प्रस्तुत लिंक पर इसे देख/सुन सकते हैं – (https://www.youtube.com/watch?v=KEoMOaZP7sw&t=2s)। इसका केंद्रीय उद्देश्य दिसंबर 2025 में दिल्ली में आयोजित एक अनूठी कार्यशाला के अनुभवों और निचोड़ को अनेक लोगों तक संप्रेषित करना है। तेज़ी से बदलती राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय वर्तमान अर्थ-व्यवस्था और मानव-मूल्यों के अवमूल्यन के कई पहलू इस परिसंवाद में सामने आए हैं। न केवल साहित्यकारों को, बल्कि तमाम संस्कृतिकर्मियों को अपने संस्कृतिकर्म के कथ्य को अद्यतन करने के लिए इसमें चर्चित जानकारियों, विचारों और विश्लेषण से मदद मिलेगी, इसी इच्छा से इसका लिप्यन्तरण एवं प्रकाशन के लिए आवश्यक संपादन किया गया है। मगर इसका ‘बतरस’ बनाए रखने के लिए मूल वक्ताओं की भाषा-शैली को बरकरार रखने की कोशिश की गई है।)

प्रेमचंद गांधी : सबको मज़दूर दिवस और बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएँ। इस कार्यक्रम की रूपरेखा 27-28 दिसंबर 2025 को दिल्ली में आयोजित एक अन्य कार्यक्रम के परिप्रेक्ष्य में हुई थी, जिसमें कुछ लेखकों और श्रमिकों के साथ एक कार्यशाला हुई थी। इसमें लेखकों ने अपने अनुभव बाँटे और श्रमिक साथियों ने भी अपने अनुभव लेखकों के साथ साझा किए। उससे एक रास्ता खुला कि आज जब हमारा साहित्य लगभग मध्यवर्गीय जीवन तक सिमटकर रह गया है, तब मज़दूर वर्ग की आवाज़ें बुलंद की जाएँ और उनके हालात साहित्य के माध्यम से सामने आ सकें। पहले अख़बारों में कारख़ानों की ज़िंदगी के बारे में बहुत-सी तथ्यात्मक रिपोर्ट्स छपा करती थीं कि किस जगह क्या सुविधाएँ नहीं हैं आदि, मगर अब तो इस तरह की पत्रकारिता भी नहीं हो रही है। हमारे मध्यवर्गीय लेखकों के पास उतना समय नहीं है और न ही कोई उनके कार्यस्थलों पर जाता है और न मज़दूरों की जीवन-स्थितियों को देखने की कोशिश करता है, जिसमें उनके संघर्षों को, उनके दुखों को जाना जाए और उस पर लिखा जाए। यह बात सच है कि जिन्होंने इक्कीसवीं सदी में लिखना शुरू किया है, या जो इस सदी में बड़े हुए हैं, उनको उस सदी के हमारे सरोकारों के बारे में पता नहीं है, जिसमें मज़दूर-किसानों के हितों की बात उस पीढ़ी के लेखक किया करते थे। आज हम इन्हीं बातों पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए हैं। हमारे साथ हैं वरिष्ठ कथाकार रणेन्द्र जी, पंकज मित्र जी और साथी के. संतोष, जो मज़दूरों के साथ काम करते हैं, उनके अधिकारों के लिए लड़ते हैं और अभी भी नोएडा आंदोलन में सक्रिय हैं।
रणेन्द्र जी, सबसे पहले आप उस कार्यशाला और लेखकीय अनुभव के बारे में बताइए कि किस तरह लेखक और श्रमिकों की दुनिया को देखा जा सकता है?
रणेन्द्र : संतोष जी सांख्यिकीविद् हैं और मंत्रालय से लेकर प्राइवेट सेक्टर में उन्होंने बहुत जगह काम किया है। किसान आंदोलन के समय उन्होंने नौकरी छोड़ी। हालाँकि काम करते हुए भी मज़दूरों, ख़ासकर मारुति उद्योग और एनसीआर वग़ैरह में जो मज़दूर आंदोलन शुरू हुए थे, उनसे वे जुड़े हुए थे। मेरा जब भी दिल्ली जाना होता था तो कुछ साथियों के साथ अक्सर उनके यहाँ बैठक होती थी। उनकी शिकायत थी, साथ ही जिन्होंने ‘ग्लोबल गाँव का देवता’ पढ़ी थी, उन्हें भी शिकायत होती थी कि हिन्दी साहित्य में किसान तो कहीं-कहीं आ जाता है, मगर पिछले 30-40 सालों से मज़दूर नहीं आ रहा है। उनकी शिकायत बहुत वाजिब थी। प्रेमचंद के ‘गोदान’ में गोबर, जो एक किसान है, मज़दूर के रूप में शहर जा रहा है। पहले यशपाल के यहाँ औद्योगिक मज़दूर दिखाई पड़ते थे। भैरवप्रसाद गुप्त का 1957 का एक उपन्यास है ‘मशाल’, जो कानपुर के औद्योगिक मज़दूरों पर है। जगदीश चंद्र का उपन्यास ‘धरती धन न अपना’ सत्तर के दशक के पंजाब का है, संजीव जी के कुछ उपन्यास कोयला मज़दूरों और खनन मज़दूरों पर हैं, वे भी नब्बे के दशक के आसपास के हैं। चाहे वह ‘पाँव तले की दूब’ हो, ‘धार’ हो, ‘सावधान नीचे आग है’ जो चासनाला कांड हुआ था, उस पर है। इसी तरह महाश्वेता देवी का भूमिहीन कृषि मज़दूरों की लड़ाई पर ‘अग्निगर्भ’ उपन्यास है। दक्षिण में भी कुछ महत्त्वपूर्ण उपन्यास आए। इधर 2008 में मलयालम में बेन्यामिन लिखित एक बड़ी प्रसिद्ध रचना आई – ‘आदुजीविथम’, जिस पर अंग्रेज़ी फ़िल्म है – ‘द गोट लाइफ’, केरल के एक स्किल्ड सड़क-मज़दूर नजीब मुहम्मद, जो स्किल्ड वर्क के लिए सऊदी अरब में ले जाए गए, मगर उन्हें काम दिया गया बकरी चराने का। उनका पासपोर्ट छीन लिया गया। उनकी यह लगभग जीवनी जैसी लिखी गई है। तो इधर मलयालम में कुछ ऐसी चीज़ें लिखी जा रही हैं, लेकिन हिन्दी में मज़दूरों की कोई कथा दिखाई नहीं पड़ रही है।
अभी मैं रानीगंज गया था, वहाँ नई उमर का एक नया कथाकार है विक्रम सिंह, उनका ‘आवारा अदाकार’ लोकभारती ने छापा है। उनकी दो-तीन कहानियाँ भी हैं। वे चूँकि ख़ुद ही डिप्लोमा होल्डर हैं, और प्राइवेट कारख़ानों में काम करते हैं, उनकी जो सैलरी है या उनकी जो हालत है, वह वही है, जो कारख़ाना मज़दूरों की होती है। न काम का समय आठ घंटों का है और न ही कोई छुट्टी है। उनकी कहानियों में कुछ चीज़ें इसी तरह की आई हैं, जैसे –‘खोटा सिक्का’ या ‘काफ़िल का कुत्ता’ या ‘बद्दू’। हमारे यहाँ के जो लोग सऊदी अरब गए थे, उनके बचपन की, उनकी मज़दूरी और उनकी हालत पर ये कहानियाँ लिखी गई हैं। दरअसल तथ्य यह है कि 1991 के बाद से वे चीज़ें, जो पहले ‘दादा कॉमरेड’ वग़ैरह में दिखती थीं, संगठित मज़दूर थे, मज़दूर आंदोलन थे, वे चीज़ें ख़त्म हो गई हैं। एलपीजी – उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण जो आया, उसकी पहली चोट ही संगठित मज़दूरों के संगठन पर हुई थी। प्राइवेट सेक्टर को पब्लिक सेक्टर के बिक्री-बेचान की जो बात थी, उसके लिए अलग से मंत्रालय बनाया गया था, यह इसलिए नहीं बना था कि पब्लिक सेक्टर घाटे में चल रहा था, बल्कि इसलिए था क्योंकि अगर संगठित मज़दूर बड़ी संख्या में रहेंगे तो एलपीजी लागू ही नहीं कर पाएँगे। आईएमएफ़ जैसी वैश्विक संस्थाओं के अंतरराष्ट्रीय दबाव के अन्तर्गत यह मंत्रालय बनाया गया और उसके माध्यम से हमारे पब्लिक सेक्टर को बेचा गया। इसका एकमात्र उद्देश्य था संगठित मज़दूरों की कमर तोड़ देना। उसके बाद जो मज़दूरों में हायरार्की (पदों में असमानता) बनी, उसमें 5-10 % मज़दूर ही स्थाई बचे थे, उनका वेतन और जो दिहाड़ी मज़दूर हैं या कॉंट्रैक्ट पर या जो आउटसोर्सिंग करके लाया गया है, उसमें इतना गैप है कि उसके कारण मज़दूर संगठन या मज़दूर एकता नाम की कोई चीज़ ही नहीं रह गई है। इस हायरार्की के कारण यहाँ वह स्लोगन चल ही नहीं सकता कि ‘दुनिया के मज़दूरों एक हो’। जो स्थाई या स्किल्ड मज़दूर हैं, वह क्यों किसी दिहाड़ी या कंट्रैक्चुअल मज़दूर के साथ एकता क़ायम करना चाहेगा? वह तो सीधे-सीधे प्रबंधन के साथ शामिल है। 1991 के बाद यह जो नया यथार्थ सामने आया है, उसमें मज़दूरों के बीच में असमानता और अंतर इतना बड़ा हो गया है कि उस गैप को भर पाना बहुत कठिन है। हालाँकि हमारे जैसे कई साथियों ने इसके बीच भी रास्ता निकाला है। अभी अंग्रेज़ी में एक बहुत अच्छा उपन्यास आया है ‘मैनी लाइव्स ऑफ़ सईदा एक्स’, नेहा दीक्षित, जो एक पत्रकार हैं, उन्होंने लगभग 10-15 वर्षों तक स्त्री मज़दूरों की हालत का निरीक्षण कर, लगभग 15000 मज़दूरों के साक्षात्कार के बाद इस किताब को लिखा है। अब सोचिए, बादाम छिलने वाली महिलाओं का आंदोलन, हालाँकि वे अपने को मज़दूर भी नहीं कह रही हैं, मगर 2019 में वह आंदोलन खड़ा हुआ और लंबे समय तक चला। 32 किलो सफ़ाई करने के जो 50 रुपये मिलते थे, उसे बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ा। तो सत्ता, व्यवस्था, कॉर्पोरेट और पूँजी जो है, वह कुछ भी कर ले, पर भूख जो है, भूख की आग जो है, वह जोड़ने का काम कर रही है। मगर हिन्दी कथा-साहित्य में, कविता में यह अनुपस्थित है। यह कटु सत्य, जो वे श्रमिकों के बारे में कार्यशाला के दौरान कह रहे थे, वह हम सब लोगों को पिंच कर रहा था।


पहले लेखकों का यह वर्कशॉप राँची में होने वाला था। सारी तैयारी हो गई थी, मगर कोविड आ गया और किसान आंदोलन शुरू हो गया। सभी साथी किसान आंदोलन में लग गए। संतोष जी जैसे साथी नौकरी छोड़कर लग गए। बाद में जब फिर ताना कसा गया, तब हमने सोचा कि अब देर नहीं करनी चाहिए और इस दिसंबर की थरथराती हुई ठंड में हमने दो दिनों का वर्कशॉप किया तथा जानबूझकर युवा कथाकारों और कवियों को ही बुलाया। दिल्ली के बाहर से कम लोग आए, जो आए अपने खर्च पर आए। हमने रहने-खाने की व्यवस्था की थी। जो युवा पीढ़ी थी, उसका मज़दूरों के बारे में, उनके कार्यस्थल के बारे में, यहाँ तक की कॉलोनी के बारे में कोई अनुभव ही नहीं था। क्योंकि अब कॉलोनियाँ ही बेज़ार, जर्जर और उचाट हो गईं हैं। जब हमारा या युवा पीढ़ी का इसके बारे में अनुभव ही नहीं है तब हमने तय किया कि हमें बोलना ही नहीं है। जो मज़दूर साथी अलग-अलग सेक्टर से आएँगे, वे ही बोलेंगे। जब हम एक बार संतोष जी के साथ मज़दूर साथियों के घर नोएडा गए, उनके साथ रुके, ख़ाना खाया और उनकी बातचीत सुनी, तो यह विश्वास हो गया था कि आपस में कम्युनिकेशन में, बतकही में कहीं कोई दिक़्क़त नहीं होगी। 15 साल से जो आदमी संघर्ष कर रहा है, आजीवन कारावास झेल लिया है, उसे अपने दुखों को बताने के लिए किसी नैरेटर की या किसी ट्रांसलेटर की ज़रूरत नहीं थी। और वही हुआ भी। ख़ुशीराम या उनके जो साथी आजीवन कारावास झेलकर आए थे, बेल पर, वे दुख की कहानी को भी इतना हँसकर सुना रहे थे कि पंकज मित्र की कहानी में जो ट्रेजेडी होती है या ब्लैक ह्यूमर, उसे भी बहुत हँसकर या व्यंग्य की शैली में बता रहे थे। इतनी चुटीली शैली में वे सुना रहे थे कि लोग वहाँ डिमांड कर-करके उन्हें सुन रहे थे। उनमें सिर्फ़ औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूर ही नहीं थे, बल्कि गिग वर्कर्स के प्रतिनिधि भी थे। घरेलू काम करने वाली महिलाएँ थीं, कृषि में काम करने वाले दलित मज़दूरों के प्रतिनिधि थे, ईंट भट्ठे पर काम करने वाले मज़दूरों के प्रतिनिधि भी थे। ये सब प्रतिनिधि जो बात कह रहे थे, उसे हम सिर्फ़ मुँह फाड़कर सुन रहे थे। जब हमसे टिप्पणी करने के लिए कहा जाता था तो हम लोग टिप्पणी करने की स्थिति में भी नहीं होते थे क्योंकि हमें इसका कोई अनुभव ही नहीं था। पहले दिन बड़ी अर्थशास्त्री जया मेहता हमारे बीच थीं, वहाँ जो कहा जा रहा था, उन्होंने उसकी सैद्धांतिकी समझाने की कोशिश की, वो एक बड़ी उपलब्धि थी। दिगंबर जी ने इसमें कुछ और बातें जोड़ीं। दूसरे दिन पंकज मित्र जैसे कुछ साथियों ने बहुत कम शब्दों में टिप्पणियाँ कीं। दो दिन पिन ड्रॉप साइलेंस के साथ हम उनकी बात सुन रहे थे और अपने को समृद्ध कर रहे थे। एक नई दुनिया से, एक नए जीवन से, जहाँ सिर्फ़ संघर्ष है, दुख है, पीड़ा है और 12000-14000 न्यूनतम मज़दूरी जो तय है, उसका एक तिहाई भी नहीं देना … एक बड़े शहर में 12000-15000 में कैसे जीवन गुजारेगा कोई आदमी? इसकी कल्पना वो लोग तो कर ही नहीं सकते, जो किसी फाइव स्टार होटल में एक समय का बिल ही इससे ज़्यादा दे देते हैं। तो इस तरह एक अजीब तरह की भयावह काली दुनिया थी वह, इससे हमारा कोई परिचय नहीं था। संतोष जी, दिगंबर जी और उन सभी साथियों का आभार, जो अभी भी जेल में हैं। अगर कलावादी संगठन हर साल बड़े कार्यक्रम कर सकते हैं तो हम लोग अलग-अलग जगह जाकर वहाँ के मज़दूरों की कहानियाँ क्यों नहीं सुन सकते? अपने को समृद्ध क्यों नहीं कर सकते? क्योंकि कविता और कहानी कोई रिपोर्टिंग तो होती नहीं! इसलिए जो चीज़ें अचेतन में जाकर बैठ जाएँगी, वे कब किस रूप में निकलेंगी, किस पात्र, किन पंक्तियों में आएँगी, हमें भी नहीं मालूम होता है। कई चीज़ें हमारे अवचेतन से, हमारी स्मृति से आती हैं तो हम अपनी स्मृति को, अपने अवचेतन को समृद्ध करने के लिए हर साल ये करेंगे।
प्रेमचंद गांधी : यहाँ जयपुर में 10-12 साल पहले एक एनजीओ ने पत्थर की ख़ान में काम करने वाले मज़दूरों के साथ एक वर्कशॉप किया था, उसमें उनका कंसर्न था उनके स्वास्थ्य के बारे में जानने का, मगर उसमें हमें ये पता चला कि किन बुरी स्थितियों में उन्हें काम करना पड़ता है। उन्हें न पीने का साफ़ पानी मिलता है, न शेल्टर है उनके पास, न ही रोज़गार की किसी तरह की कोई सुरक्षा है! हमारी पीढ़ी ने कम से कम कुछ तो देखा-सुना है, मगर अभी जो लेखक मध्यवर्गीय जीवन से आए हैं, जो किसी सेवा-क्षेत्र या सरकारी या प्राइवेट नौकरी वाले घरों से आए हैं तो उनके पास इस तरह का कोई अनुभव नहीं है। प्रगतिशील लेखक संघ के बहुत पुराने साथी हैं शकील सिद्दीक़ी साहब, जो लखनऊ के हैं, उन्होंने दो बड़ी महत्त्वपूर्ण किताबें संपादित की हैं – एक, ‘कारख़ानों में ज़िंदगी’ और दूसरी है – ‘लड़ते हुए लोग’ । ये दोनों मज़दूरों के जीवन पर लिखी कहानियों के संग्रह हैं। इस तरह का काम हिन्दी में इधर कम हुआ है। किसानों पर फिर भी किताबें निकली हैं, मगर मज़दूरों के जीवन पर उस तरह से काम नहीं हुआ है।
पंकज मित्र : लेखक, प्रबुद्ध लोग और मज़दूर साथी – सबके जीवन का यही उद्देश्य रहा है कि न्याय पर आधारित, समानता पर आधारित एक समाज का निर्माण हो और इस लिहाज़ से जिस वर्कशॉप की चर्चा यहाँ हो रही है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण रहा है। जिन्होंने 1990 के बाद के दशक में लिखना शुरू किया है, उनके लिए मज़दूरों के जीवन की सच्चाइयों से रूबरू होना बहुत मुश्किल है। उन लोगों ने मज़दूरों के संघर्ष को देखा नहीं है। जैसे केदारनाथ अग्रवाल अपनी कविता में कहते हैं कि ‘जो जीवन की धूल चाटकर बड़ा हुआ है’, यह जो ‘धूल चाटना’ मुहावरा है, वह अभी के जो डिजिटल मज़दूर हैं, उन्हें समझ में ही नहीं आएगा कि धूल चाटकर कैसे बड़ा हुआ जाता है! क्योंकि उनके एसी शीत-ताप नियंत्रित कक्ष में धूल का तो प्रवेश ही निषेध है। इसलिए वो तो धूल चाटकर बड़े नहीं हो सकते। वो एसी की हवा खाकर बड़े होते हैं, लेकिन वो कहीं न कहीं बुरी तरह से उस शोषण के शिकार भी हैं, जिसका अनुभव उनको नहीं हो पाता। जैसा रणेन्द्र जी ने कहा कि एलपीजी के दौर में मज़दूर-किसान सब परिदृश्य से ग़ायब हो गए। साहित्य से ग़ायब हो गए। पिछले कई-कई वर्षों में शायद ही किसी पत्रिका के मुखपृष्ठ पर किसी किसान या मज़दूर की तस्वीर प्रकाशित हुई हो! या किसी टीवी न्यूज़ चैनल में कोई थंबनेल लगाया गया होगा कि मज़दूर-किसान का कोई कार्यक्रम हो। भले ही किसान आंदोलन के समय ज़रूर थोड़ी खबरें चलाई गई थीं, वह भी कुछ ही चैनल्स ने, ख़ासकर यूट्यूबर्स ने चलाई थीं, परंतु मुख्य धारा के चैनल्स ने तो ज़्यादातर नोटिस भी नहीं लिया था। नोटिस लिया भी तो बहुत निगेटिव तरीक़े से लिया गया था। आतंकवादी वग़ैरह कहकर उन्हें बहुत छोटा करने, उनका अपराधीकरण करने की कोशिश की गई थी।

ये सब चीज़ें तो हमारे ज़ेहन में आती रहीं हैं, मगर मज़दूरों के संघर्ष का ताप हम लोग महसूस नहीं कर पा रहे थे। लेकिन इस कार्यशाला ने बहुत सारी धारणाएँ बदल दीं। इस कार्यशाला में जो लोग शामिल हुए, उन लोगों ने अपने जीवन की ऐसी सच्चाइयों को इस तरह हमारे सामने रखा, कि हमें लगा कि इसमें तो लेखन वग़ैरह की कोई गुंजाइश ही नहीं है। हर आदमी एक-एक ज़िंदा कहानी था। और जो कहानियाँ उनके पास थीं, उन कहानियों का कोई मुक़ाबला शायद हमारी कहानियाँ नहीं कर सकती, क्योंकि उनमें वह जीवन नहीं धड़कता है। वे जिस तरह से चीज़ों को महसूस कर रहे थे, उसमें कुछ ऐसी अद्भुत कहानियाँ थीं… जैसे, आदमी बरसों से जेल में रह रहा है, फिर भी उसमें इतना ‘सेंस ऑफ़ ह्यूमर’ है, इतनी ऊर्जा बची हुई है, कि वह वहाँ पर नुक्कड़ नाटक खेल रहा है। उनमें से एक जो हरियाणा के बहुत ही परंपरागत परिवार का लड़का है, जेल में होने के कारण वैसे ही उसकी इज़्ज़त ख़राब हो गई, और ऊपर से वह नुक्कड़ नाटक भी कर रहा है। तो इस तरह एक पूरा सामाजिक परिदृश्य है, उसके ख़िलाफ़ भी कैसे लड़ रहे हैं वो, साथ ही इतने ह्यूमर के साथ उन्होंने सुनाईं वे कहानियाँ, कि हम लोग ऊर्जा से बिलकुल भर गए। मारुति के साथी, जो लोग वहाँ आंदोलन में जेल गए थे, उन लोगों ने अपनी ऐसी-ऐसी कहानियाँ सुनाईं कि जिनमें एडिटिंग की या लिखने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। वो तो अपने-आप में एक कहानी थीं। अगर उनका ऑडियो रिकॉर्ड कर लिया जाता तो वो कहानी के रूप में सीधे-सीधे सामने आ जातीं। ये जो अनुभव था, वह एकदम ही शानदार और अलग क़िस्म का अनुभव था। और इनमें सिर्फ़ आंदोलनकारी मज़दूर ही नहीं थे, बल्कि ईंट-भट्ठे पर काम करने वाली छोटी-छोटी उम्र की लड़कियाँ भी थीं, उन लोगों ने जिस तरह से अपनी कहानियाँ बताईं, जो गिग वर्कर्स ने अपनी कहानियाँ सुनाईं, अपने जीवन के संघर्ष बताए, उससे हम लोगों को लगने लगा कि हम लोग तो बहुत छोटे हैं इन लोगों के सामने। हम लोग, जो रचनात्मकता का इतना ढोल पीटते हैं, तो उनके सामने हमारी रचनात्मकता कुछ भी नहीं है। वह एक तरह का सिंथेटिक क़िस्म का माहौल लगता है। जो जीवन से भरी हुई कहानियाँ उनके पास थीं, जिनको साझा करने का एक उपक्रम उन लोगों ने किया, उसके लिए साथी संतोष और वे तमाम साथी, जो मज़दूर आंदोलन से जुड़े हुए हैं, और जो उनका साथ दे रहे हैं, वे सब बधाई के पात्र हैं। वे कहानियाँ जिस तरह हम तक पहुँच रही हैं और उन कहानियों के ज़रिए हम एक तरह से पुनर्नवा होते हैं, एक बार फिर से अपने को नए सिरे से पुनराविष्कृत करने की कोशिश करते हैं कि कैसे अपनी रचनात्मकता को बचाए रखने के लिए, अपनी रचनात्मकता में धार लाने के लिए, उस संघर्ष का ताप लाने के लिए किस तरह से हम लोग कोशिश कर सकते हैं! उनके जीवन की कहानियों से हम लोगों को बहुत कुछ लेने का मौक़ा मिला, उनके अनुभवों को सुनकर दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड में भी हमारे पसीने छूट जा रहे थे। इस कार्यशाला के आयोजकों के अलावा राजस्थान से आए हुए डॉक्टर्स, कवि, लेखक भी थे। अगर हम इन ऊर्जाभरी कहानियों का उपयोग कुछ प्रतिशत भी अपने लेखन में कर पाते हैं तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।
हमें लगता है कि मज़दूरों का जो वर्गीकरण किया गया है, उन्हें आपस में अलगाया गया है जानबूझकर, ये चीज़ एलपीजी के बाद, कि जब जत्थे में होंगे मज़दूर, एक साथ होंगे मज़दूर, और अगर मिलकर आंदोलन करेंगे तो ये एक बड़ा संकट पैदा कर सकते हैं। उसी के फलस्वरूप ये तमाम श्रम क़ानून लाए गए हैं, उसके पीछे सारी मंशा साफ़ दिखती है कि कैसे मज़दूरों की एकता को तोड़ा जाए, और उसे तोड़ने में ये क़ानून और न्यायालय तक इसमें शामिल हो गए हैं। ये तमाम लोग पाप कर रहे हैं, मज़दूरों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, इन चीज़ों को जितनी जल्दी हम पहचान लेंगे और रचनाओं में ले आएँगे, और इस तरह से लाएँगे कि बहुत ज़्यादा वाग्जाल न फैलाते हुए, बहुत भाषा-शिल्प का आग्रह न रखते हुए, अगर सिर्फ़ वो कहानियाँ कही जाएँगी, तो उनका कथ्य ही इतना मज़बूत है कि उसके लिए शिल्प का तामझाम करने की ज़रूरत ही नहीं है। वह कथ्य ही अपने-आप में इतनी चोट पहुँचाने वाला है, पीड़ा पहुँचाने वाला है कि सीधे-सीधे पाठकों पर वो असर करेगा। हम लोग चाहेंगे कि इस तरह के आयोजन अलग-अलग हिस्सों में, अलग-अलग मज़दूरों के बीच हों, ताकि उनसे जुड़कर हमें समझ में आ सके कि हम कहाँ खड़े हैं, और हमारा लेखन सचमुच किसी काम का है या नहीं! संतोष जी और इस तरह के संगठनों के प्रति इस मई दिवस के दिन आभार प्रकट करते हुए मैं यही कहना चाहता हूँ कि उनके माध्यम से हमें यह अवसर मिलता रहे कि हम मध्यवर्गीय लेखक मज़दूरों की ज़िंदगी को नज़दीक से जानकर, जुड़कर उनके जीवन को अगर सही स्तर पर अपने लेखन में व्यक्त कर सकें तो यह बड़ी उपलब्धि होगी।

प्रेमचंद गांधी : अभी जब रणेन्द्र जी बात कर रहे थे तो उन्होंने श्रम क़ानूनों का ज़िक्र किया। मुझे याद है कि 1991 में जब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे और नई आर्थिक नीति आई, उसी समय से श्रम क़ानूनों में बदलावों की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। उस समय मज़दूर संगठनों ने बहुत विरोध किया। उस समय दो-तीन बड़ी राष्ट्रीय हड़तालें हुई थीं, जो इधर कम हो गई हैं। हालाँकि साल में एकाध बार हो जाती है, मगर उनका वैसा असर नहीं दिखता। 1991 में वह दौर था, जब इस तरह की हड़तालों को लेकर अख़बार में विशेष लेख छापे जाते थे कि देश का कैसा नुक़सान कर रहे हैं ये लोग। दिल्ली की सड़कें जाम कर रहे हैं। एक दिन में हड़ताल से देश का हज़ारों-करोड़ों का नुक़सान कर रहे हैं। उनको वो हज़ारों-करोड़ों का नुक़सान दिखाई देता था, मगर मज़दूरों की हालत दिखाई नहीं देती थी। आज मीडिया से मज़दूरों का जीवन बिलकुल ग़ायब हो गया है। अब तो मई दिवस के अवसर पर भी कहीं कोई समाचार नहीं दिखाई देता। यह भयावह स्थिति है। ख़ासकर जब से ये नई श्रम-संहिता लागू हुई है, लेबर कोड्स आ गए हैं, तब से तो और भी बुरी स्थिति हो गई है क्योंकि उसमें यूनियन बनाने का अधिकार तक छीन लिया गया है या इतना सीमित कर दिया गया है कि लोग यूनियन तक नहीं बना सकते। उसी का परिणाम है कि ये जो पानीपत से लेकर हरियाणा और दिल्ली तक के मज़दूरों के भीतर एक ख़ास तरह की अशांति या अनरेस्ट, जिसे विद्रोह या विक्षोभ भी कह सकते हैं, वो हमें सड़कों पर दिखाई पड़ता है। इन आंदोलनों में हमारे साथी संतोष जी रहे हैं, तो उनसे आग्रह है कि वे बताएँ कि नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुनिया भर के मज़दूरों का किस तरह हाल बेहाल किया गया है।
संतोष : 1 मई 1886 को हेमार्केट, शिकागो में मज़दूरों ने 8 घंटे की सम्मानजनक जीवन की लड़ाई लड़ी। अगले सौ सालों में अनेक लड़ाइयाँ लड़कर कई प्रकार के अधिकार प्राप्त किए। उसके बाद दुनिया में 1980 और भारत में 1990-91 में नवउदारवाद का दौर आता है, जिसमें कई बातें स्ट्रक्चरली बदलनी शुरू होती हैं, मैं इस पर बात करूँगा। रणेन्द्र जी और पंकज जी जैसे जिन लेखकों के लेखन में मज़दूर या आदिवासी के जीवन का जो ताप और उनकी ज़िंदगी के जो डिटेल्स हैं, वो इसलिए आते रहे है क्योंकि उन्होंने उनके साथ काम किया है। उनके साथ लेखकों का एक जीवंत रिश्ता रहा है। इसलिए वे अपनी कहानियों में उन्हें एक ‘अदर’ की तरह नहीं ट्रीट करते। अभी के कथाकारों के साथ दो लेवल की दिक़्क़तें रही हैं। एक तो यह कि, जिस तरह से मज़दूरों के सवालों को नज़रअंदाज़ किया गया है, जानबूझकर उनकी समस्याओं को अदृश्य कर दिया गया है, ये एक बहुत ही सोची-समझी गई साज़िश रही है। जो श्रमिक ज़िंदगी है, औद्योगिक ज़िंदगी है, जो कामगारों की दुनिया है, उसमें बहुत पढ़े-लिखे लोगों का, संवेदनशील लोगों तक का ऐक्सेस नहीं है। 1980-90 तक जो पुराने औद्योगिक शहर थे, फ़रीदाबाद, कानपुर, इंदौर, मुंबई – उसमें जो श्रमजीवी लोगों का जीवन था और मध्यवर्गीय लोगों का जीवन था, उसमें कोई अलगाव नहीं था। वहीं पर मिल है, वहीं वर्कर्स निकल रहे हैं, वहीं पर बॉलीवुड में मज़दूरों के लिए गाना गाया जा रहा है, हमारे जो बड़े हीरो हैं दिलीप कुमार, वो मज़दूरों का रोल कर रहे हैं, अमिताभ बच्चन कुली का रोल कर रहे हैं, हमारे सबसे बड़े आइकॉन गीतकार शैलेंद्र हैं, जो मज़दूरों के बारे में लिख रहे हैं। तो ये कोई अलहदा सोसाइटी नहीं थी। मज़दूर और मध्यवर्ग उस सोसाइटी के हिस्से हुआ करते थे। उनकी ज़िंदगी में आना-जाना – बस में, ट्राम में, रेलवे में, दुकानों में, रास्तों पर – वे समाज का एक हिस्सा थे।
पिछले 20-30 सालों से दिल्ली, न केवल भारत की बल्कि समूचे विश्व की सबसे बड़ी वर्किंग क्लास सिटी है, दिल्ली और एनसीआर मिलाकर। मगर दिल्ली को लेकर कोई वर्किंग क्लास सिटी का इमेजिनेशन नहीं है। सबको लगता है कि दिल्ली साहित्य की राजधानी है, पॉवर की राजधानी है। राजनीति की राजधानी है, कल्चर की राजधानी है। लेकिन दुनिया के इतिहास में मैनचेस्टर जब अपने पीक पर था, तब भी वहाँ इतने वर्कर्स नहीं थे। मगर यहाँ के मज़दूरों को इतना अदृश्य कर दिया गया है कि दिल्ली के जो बहुत संवेदनशील लोग हैं, उन्हें अपनी निजी ज़िंदगी में कभी मज़दूरों से वास्ता ही नहीं पड़ता; क्योंकि मज़दूरों के जो कार्यस्थल हैं, उनकी रिहाइश है, वो शहर से इतनी बाहर ठेल दी गई है, मानेसर, गुड़गाँव, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, और जो हमारा मध्यवर्ग है वह सोसायटीज़ और गेटेड कम्युनिटीज़ में बंद हो गया है। उनका जो आने-जाने का साधन हैं, वो कार है या मेट्रो है। तो ये बिलकुल अलग-अलग दो ज़िंदगियाँ हो गई हैं। वह जो बोलते हैं न कि ‘सक्सेशन ऑफ़ द सक्सेसिस्ट’, जिसको अरुंधती रॉय कहती हैं कि भारत का जो अपर क्लास है, उसने भारत से अपने-आप को अलग कर लिया है और यह भारत का सबसे बड़ा बँटवारा है। तो उसकी वजह से चाहते हुए भी जो नए कथाकार आ रहे हैं, सोशल साइंटिस्ट आ रहे हैं, जो नए इतिहासकार आ रहे हैं, उनका वर्कर्स की ज़िंदगी और उनकी रिहाइश से वास्तविक संबंध (रियल एक्सपोज़र) नहीं है। तो हम लोगों ने बहुत ईमानदारी से इस बात को समझा है कि यह एक सोची-समझी गई साज़िश है।
कुछ लोग ज़रूर जान-बूझकर आँख मूँदे हुए हैं और नहीं जानना चाहते हैं – हम उनकी बात नहीं कर रहे हैं। हम उनकी बात करते हैं, जो इस मामले में संवेदनशील हैं। प्रगतिशील धारा से आते हैं, मज़दूर-किसान की बात करते हैं। लेकिन उनका मज़दूर आंदोलन से, ट्रेड यूनियन मूवमेंट से, मज़दूरी से कोई वास्ता नहीं रह गया है। उन लोगों के लिए हम लोग क्या कर सकते हैं? हम तभी शिकायत करेंगे न, जब हम उन लोगों को एक्सपोज़र देंगे। हम बताएँगे कि वर्किंग क्लास लाइफ क्या होती है, सेक्टर्स क्या होते हैं? गिग वर्कर्स की क्या दिक़्क़तें हैं? घरेलू महिला कामगारों की क्या स्थिति है? जब तक हम उस परिस्थिति को उनके सामने नहीं रखेंगे, उनसे शिकायत कैसे कर सकते हैं? जैसे होता है कि किसी विषय पर किसी कथाकार या शोधार्थी के सामने जब तक कोई कच्ची सामग्री नहीं रखेंगे, उन्हें उपलब्ध नहीं कराएँगे, तब तक वे कैसे काम करेंगे? उनके साथ केवल शिकायत और तंज़ में ही बात करेंगे तो कैसे काम चलेगा? तो इसी सोच के साथ इस कार्यशाला का आयोजन किया गया था कि कम से कम जो युवा लेखक और उपन्यासकार हैं, कम से कम उनके बीच एक पुल बनाया जाए। जो साथी वहाँ अलग-अलग सेक्टर्स में, मज़दूर संगठनों में काम कर रहे हैं, उनके साथ परस्पर संवाद स्थापित हो सके। केवल शिकायत करने से क्या होगा? अगर हमें कुछ चीज़ों को बदलना है, और हमें बोलना है कि आप उनकी कहानियाँ लिखें तो इस पुल को बनाने की ज़रूरत पड़ेगी। इस कार्यशाला में जो तीन अगुआ साथी थे, जिन्होंने इसमें बहुत बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था – साथी श्यामवीर, साथी अजीत और साथी पिंटू, जो आज जेल में हैं, 9 अप्रैल को गुड़गाँव में जो मज़दूर आंदोलन हुआ था, 1 अप्रैल से जो मानेसर में चल रहा था, उसमें उनको दो बार डिटेन किया गया था और फाइनली 12 अप्रैल को छह एक्टिविस्ट मज़दूर साथी, जिनमें साथी श्यामवीर को 109 के अन्तर्गत, जो पहले 307 होता था, अटेम्प्ट टू मर्डर में और बम बनाने में और अलग-अलग धाराओं के अन्तर्गत छह मज़दूर कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया। अख़बारों से भी आपको पता चला ही होगा कि अन्य 55 वर्कर्स भी गुड़गाँव से अरेस्ट हुए हैं। नोएडा में बिगुल मज़दूर दस्ता के सात ऐक्टिविस्ट्स हैं, जिसमें बहुत वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा की भी गिरफ़्तारी हुई है, उनको मिलाकर 1000 से ज़्यादा वर्कर्स की नोएडा में गिरफ़्तारी हुई है। तो ‘साहित्य और श्रम’ की इस कार्यशाला का यही उद्देश्य था कि मज़दूर संगठन के साथियों और लेखकों के बीच पुल बनाया जाए कि वे मिलें और उनके साथ रहकर, उनकी ज़िंदगी के बारे में रिसर्च कर लिखें। उनसे संपर्क बनाएँ। एक अवधारणा बनाएँ, प्रस्तुत करें। जहाँ तक हम लोगों की सोच थी, हमें लगता है कि इसके माध्यम से हम क्रियान्वयन की एक दिशा में एक कदम आगे बढ़ पाए हैं।
बीएचयू के मेरे दोस्त चंदन हैं, अनिल मिश्रा हैं राजस्थान के, जो प्रोफेसर थे बीएचयू में, और भी बहुत सारे साथी हैं यंग जनरेशन के, जो कहानियाँ लिखते हैं। इनमें से कई साथी तो सचेत हैं, वे बहुत सी चीज़ें पढ़ते रहते हैं, मगर उसके बाद का जो दायरा है, उसमें एक चीज़ बहुत महसूस हुई कि 1980 का जो ट्रांसफॉर्मेशन है और आप देखिए कि ‘लेबर ऐज़ ए पोलिटिकल केटेगरी’ का जो डिक्लाइन है, उसका जान-बूझकर अदृश्यीकरण किया गया है। इसके जो तीन पहलू हैं, उस पर बात किए बिना इस प्रोसेस को नहीं समझा जा सकता कि क्यों मज़दूर साहित्य की दुनिया से, न केवल हिन्दी साहित्य से, बल्कि बाक़ी दुनिया भर के अलग-अलग साहित्य से भी लगभग एक साथ ग़ायब होता गया है? अंग्रेज़ी में थोड़ा बहुत काम हुआ है। मलयालम में बात हुई है मगर जो उसका मैग्नीट्यूड 1970-80 तक था कि हमारे सबसे बड़े हीरो दिलीप कुमार, जो मज़दूर का रोल कर रहे हैं, शकील बदायूँनी या शैलेंद्र हैं, वे लिख रहे हैं। मतलब जो लेबर एक मेन स्ट्रीम का विषय था, उस लेबर को एक ‘अदर थिंग’ मान लिया गया। मगर लेबर जितनी बड़ी केटेगरी है, न केवल भारत में, बल्कि पूरी दुनिया की सबसे बड़ी मेजोरिटी है। इसमें 90 प्रतिशत से ज़्यादा लोग मज़दूर के रूप में काम करते हैं।

1980-81 में दुनिया भर की सरकारों ने यह तय किया था। अमेरिका में पैटको नाम का एक अमेरिकन सिग्नल है, जो एयरपोर्ट के सिग्नल्स कर्मचारी हैं, उनकी हड़ताल हुई, उसके एक साल के भीतर ही ब्रिटिश माइनर्स की हड़ताल होती है और 1982-83 में दत्ता सामंत के नेतृत्व में बॉम्बे मिल की हड़ताल हुई, वो पहला टर्न था, जहाँ सरकार ने यह तय किया कि अब जो हड़तालें होंगी, उनमें हम भाग नहीं लेंगे। उन्हें हम कोई सुविधा नहीं देंगे। उसके पहले जो हड़तालें होती थीं, उसमें त्रिपक्षीय समझौता होता था, मज़दूर यूनियन के लोग आते थे, सरकार के लोग आते थे और पूँजीपति के लोग आते थे, उनके बीच जो भी बातचीत होती थी, उसे सरकार आयोजित करती थी। यह पहली बार हुआ कि 1981 के दशक में, उन-उन देशों की सरकारों ने इन तीनों स्ट्राइक्स से अपने-आप को पीछे खींच लिया और कह दिया कि जैसे आप लोगों को ‘डील’ करनी है, कर लें। तो मज़दूरों के जो सवाल होते थे, जो उनके श्रम के सवाल थे, उन श्रम के सवालों को एक रात में ही झटके के साथ क़ानून-व्यवस्था के सवाल या अपराध के सवाल में बदल दिया गया। यह जो रूपांतरण था, यह उस समय हमको पकड़ में नहीं आया था।
दूसरा हमला इसी दशक में पहचान की राजनीति ने किया। पूरी दुनिया में अस्मिता की राजनीति (आइडेंटिटी पॉलिटिक्स) के नाम पर लोग बँटने लगे। विजय छब्बर नामक एक विचारक ने कहा है कि यहाँ से ‘डिक्लाइन ऑफ़ ए लेबर’ की जो शुरुआत हुई, उसे कॉम्पन्सेट करने के लिए कल्चरल टर्न दिया गया। उसके बाद जो उत्तर औपनिवेशिक सिद्धांत आया, जाति की बात आई, पर्यावरण की बात आई, महिला राजनीति की जो बात शुरू हुई कि हरेक की जो पहचान है, जाति, जेंडर, आदिवासी सारी चीज़ों पर जो बात होने लगी, उसे समग्रता में नहीं जोड़ा जा रहा है। इनमें जो वर्कर्स के सवाल हैं, उनको जोड़ने वाले जो सवाल हैं, उसको अलग हटकर देखा जा रहा है। इसी के साथ तीसरा तत्व है, जो हम सब जानते हैं कि नवउदारवाद का जो सिद्धांत है, उसमें जो फ़्रेडेरिक हायक और मिल्टन फ़्रेडमैन की थ्योरी है, उसे थैचर और रीगन ने अमली जामा पहनाते हुए कहा कि अब पूरी दुनिया को बाज़ार निर्धारित करेगा। यह माँग और आपूर्ति पर निर्भर रहेगा। ये जो तीन बड़े ट्रेंड थे 1980 के दशक में, उससे जो संरचनात्मक रूपांतरण हो रहा था, शायद उसको पहचानने में हम लोग चूक रहे थे। एक समाज के तौर पर, एक बुद्धिजीवी के तौर पर इस बड़े हमले को हम समझ नहीं पाए।

अब मैं इस सवाल पर आता हूँ कि ये सारा आंदोलन जो अभी चल रहा है, उसका क्या घटना-क्रम है? आप देखिए कि लगभग फ़रवरी के आख़री सप्ताह में आईओ रिफ़ाइनरी के जो मज़दूर हैं, वे अपने कम वेतन को लेकर और जो अलग-अलग समस्याओं – आठ घंटे के काम को लेकर, ओवर टाइम का पेमेंट न होने को लेकर, सुरक्षा मानकों को लेकर, ग्रेच्युटी, पीएफ़ को लेकर 3-4 फ़रवरी के आसपास हड़ताल करते हैं। इन वर्कर्स को आजकल यह अंदेशा अच्छी तरह हो गया है कि जो मुख्य धारा का मीडिया है, जो मुख्य धारा के तथाकथित एंकर्स हैं, जो गोदी मीडिया कहलाते हैं, वे हमारी बातें लोगों तक नहीं पहुँचाएँगे। तो उन्होंने ख़ुद से अपना रील बनाना शुरू कर दिया। एक रील से दूसरा रील और दूसरे से तीसरा रील – ये रील फैलते-फैलते फ़रवरी के अंत में 23 तारीख़ के आसपास, पानीपत की जो आईओसी की रिफ़ाइनरी है, वहाँ के मज़दूरों ने देखा। इन वर्कर्स के बीच का कनेक्शन यह है कि वहाँ भी बिहार के वर्कर्स काम कर रहे थे और बिहार के अन्य बहुत सारे माइग्रेंट वर्कर्स आईओएल की रिफ़ाइनरी में भी काम कर रहे थे। जब उन्होंने देखा कि इसी तरह की वर्क कंडीशन में तो हम भी काम कर रहे हैं। तो 23 फ़रवरी 2026 के आसपास उन्होंने भी बात करना शुरू किया।
अब इसका दूसरा पहलू यह भी है कि 2025 के नवम्बर महीने में सरकार ने लेबर कोड को लेकर बहुत ही ज़्यादा प्रचार किया था कि लेबर कोड अब लागू होने वाला है, अब आठ घंटे का क़ानून लागू होने वाला है और सबको न्यूनतम मज़दूरी मिलेगी। इस बार लेबर कोड को लेकर सरकार की तरफ़ से बहुत ज़्यादा हल्ला किया गया था, तो वर्कर्स को भी लगा कि एक अप्रैल आएगा, हमारा न्यूनतम वेतन लागू हो जाएगा, आठ घंटे काम करने का जो नियम है, वह भी लागू हो जाएगा। जो वैसे तो संवैधानिक रूप से पहले से ही कार्यान्वित था, मगर कहीं भी लागू नहीं था। हर वर्कर की यही शिकायत है कि 13-14 घंटे काम करना पड़ता है। तो सरकार के प्रचार के बाद वर्कर्स को लगा कि वे जो ओवरटाइम करेंगे, उसका डबल भुगतान होगा ईएसआई, पीएफ़, ग्रेच्युटी, इन्श्योरेंस और जो भी लेबर कोड को लेकर खूब विज्ञापन, खूब होर्डिंग सरकार ने चलाए, वह सब उन्हें हासिल होगा। जब एक अप्रैल का दिन आया तो उन्होंने देखा कि इसमें से कुछ भी लागू नहीं हुआ, वो तो उनको लग रहा था कि सरकार बीस हज़ार रुपये मिनिमम वेज करने वाली है, आठ घंटे का काम करने वाली है। आठ घंटे के बाद जो काम करेंगे, उसका डबल ओवरटाइम मिलने वाला है, तो एक अप्रैल को फिर से अलग-अलग रिफाइनरीज़ के वर्कर्स ने माँग उठाई कि आज तो एक अप्रैल हो गया, अब तो जो रिवाइज़्ड वेज है, उसे आप बोर्ड पर लगा दीजिए। तो वहाँ पर पता चला कि न तो वेज बढ़ा है और न आठ घंटे का क़ानून लागू हुआ है। इसी बात को लेकर 2 अप्रैल 2026 को मानेसर होंडा के जो वर्कर्स थे, जो 10 से 11000 पर काम करते थे, वे सड़क पर आए। अब इसकी पृष्ठभूमि ये है कि जो मिनिमम वेज है, वो हरियाणा में पिछले 12 सालों से और उत्तर प्रदेश में पिछले 14 सालों से नहीं बढ़ा है। नियमतः हर पाँच साल में मिनिमम वेज का रिवीजन होना चाहिए। और दूसरा जो डीए है, जिसको डियरनेस अलाउंस कहते हैं, हर छह महीने में घोषित या अपडेट होना चाहिए। मगर पिछले 12 या 14 साल से वर्कर्स 12 से 13 घंटे के काम के लिए 10 से 11000 में काम कर रहे हैं। तो बात ये हुई कि 2 अप्रैल को मानेसर में होंडा के वर्कर्स पहुँचे और उन्होंने मैनेजमेंट के लोगों से बात की तो उन्होंने कहा कि अभी लिखित रूप में नहीं देंगे पर हम आपकी बात स्वीकार करते हैं। इस आश्वासन के बाद हड़ताल समाप्त कर दी गई। अब यह बात जैसे ही बाक़ी वर्कर्स तक पहुँची कि होंडा के वर्कर्स ने अपने लिए 15 से 16000 की माँग की है और उनकी बात शायद मान ली गई है, भले ही लिखित समझौता नहीं हुआ है… तो उसके बाद देखिए कि चैन रिएक्शन होता है। 3 अप्रैल को मुंजालसवा ऑटो कम्पोनेंट के वर्कर्स, 4 अप्रैल को सत्यम ऑटो कम्पोनेंट के वर्कर्स, 5 को रूपा पॉलिमर्स के वर्कर्स … और ये सब मानेसर में काम करने वाले ऑटोमोबाइल वर्कर्स हैं… हड़ताल पर चले गए। जब यह हड़ताल चल ही रही थी और वे मानेसर तहसील में आकर धरना दे रहे थे, तभी 6, 7 और 8 अप्रैल को गारमेंट सेक्टर के जो वर्कर्स हैं, जिनकी स्थिति ऑटोमोबाइल सेक्टर के वर्कर्स से और भी ज़्यादा ख़राब है, उन्हें और ज़्यादा घंटे काम करना पड़ता है, उसमें महिलाएँ ज़्यादा काम करती हैं, उनके हर तरह के शोषण के अलावा यौन शोषण की भी लगातार शिकायतें होती हैं, जब उनको पीरियड्स होते हैं, तब उनको छुट्टी नहीं दी जाती है, उनके कपड़े चेक किए जाते हैं कि ब्लड आ रहा है या नहीं और भी बहुत तरह की बातें …! तो 6-7 अप्रैल को लगभग 20 अलग-अलग फ़ैक्टरीज़ के वर्कर्स मानेसर तहसील में जमा हो जाते हैं। अब जब स्थिति इस तरह की होती है तो 8 अप्रैल को रातों-रात हरियाणा सरकार मिनिमम वेज में 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी की घोषणा कर देती है। जो वेतन 12000 था, वह बढ़कर 15320 हो जाता है। 8 अप्रैल के नोटिफिकेशन के बाद नियमतः 9 अप्रैल को सारे फ़ैक्टरियों के गेट पर यह नोटिफिकेशन लग जाना चाहिए था कि अब आज से आपका अपडेटेड वेज मिलेगा क्योंकि ये नोटिफिकेशन 1 अप्रैल 2026 से लागू था। वर्कर्स गए नोएडा में, तो उन्होंने देखा कि उन्हें तो यह नहीं मिल रहा है, उन्होंने जाकर बात की तो कंपनी के मैनेजमेंट की तरफ़ से कुछ बाउंसर आ गए। लड़ाई-झगड़ा हुआ, पत्थरबाज़ी हुई, कुछ गाड़ियों में आग लगा दी गई। और 9 अप्रैल को छोटे-मोटे दंगे जैसी स्थिति हो गई और 55 वर्कर्स को अरेस्ट कर लिया गया।
उसके बाद ऋचा ग्लोबल और मेडलामा दो कंपनियों की ओर से एफ़आईआर दर्ज़ की जाती है, जिसमें से एक एफ़आईआर में काफ़ी गंभीर चार्जेस हैं, इसमें हमारे छह साथी, जिसमें श्यामवीर, अजित, पिंटू, राजू, आकाश और हरीश पर अटेम्प्ट टू मर्डर जैसे चार्ज लगाए गए हैं, गिरफ़्तार किया जाता है। यह घटना 9 अप्रैल की है। अब जैसे ही पता चला कि 8 अप्रैल को हरियाणा सरकार ने 35 प्रतिशत मिनिमम वेज बढ़ा दिया है, तो वहीं से कुछ किलोमीटर दूर दिल्ली एनसीआर के इलाक़े में – नोएडा में जो गारमेंट वर्कर्स हैं, उनको भी लगा कि अरे! जब उनको 15000 मिल रहा है तो हमें ही क्यों 11000 मिलेगा?

इसके पहले का परिप्रेक्ष्य आप जानते ही हैं कि फ़रवरी महीने में जब से ईरान-इज़राइल युद्ध शुरू हुआ, गैस की सप्लाई कम हो गई थी। वर्कर्स को जो छोटे सिलेंडर्स पहले 150 से 200 रुपये किलो मिलते थे, वो सीधे 400 से 450 हो गए। मतलब रातों-रात उनके पास जो ईंधन का, सिलेंडर का जो खर्च 1000 रुपये आता था, वो सीधे 4000 हो गया। इसके अलावा जो दूसरी मुश्किल सामने आई कि हरेक वर्कर जो 14-15 घंटे फैक्ट्री में काम कर रहा है, उसको आने के बाद एक घंटा ख़ाना बनाना पड़ता है और जाने से पहले एक घंटा ख़ाना बनाना पड़ता है। ये हो गए कुल 15-16 घंटे। उसके बाद हर दिन एक घंटे उसे चक्कर लगाने पड़ते हैं कि कहाँ गैस भराएगा, कहाँ नहीं। इसी में कालाबाज़ारी हो रही है, पुलिस पकड़ रही है वग़ैरह वग़ैरह। तो उनके पास टाइम का शॉर्टेज हो गया। हर एक दिन की इस जद्दोजहद में उनका सब्र का बाँध एकदम फूट गया कि इस तरह तो हम काम नहीं करेंगे। और जब उन्होंने देखा कि लड़ाई लड़ने से वेज इम्प्रूव भी हो जाता है। हरियाणा में हुआ तो 9, 10, 11, 12 अप्रैल को नोएडा के वर्कर्स भी लगातार शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने लगे। सरकार ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया। वहीं से दो किलोमीटर की दूरी पर गोदी मीडिया के सारे चैनल्स के ऑफिसेस हैं, नोएडा में किसी ने उनकी सुध नहीं ली, रिपोर्टिंग नहीं की। अंततः 13 अप्रैल को यह प्रदर्शन हिंसक हो जाता है, कुछ गाड़ियाँ जलती हैं और फिर सारे मीडिया में हल्ला हो जाता है कि कैसे ये लोग उपद्रवी हैं, नक्सल हैं, पाकिस्तानी कनेक्शन हैं, उसके बाद 13, 14, 15, 16 को लगातार 1000 मज़दूरों की गिरफ़्तारियाँ होती जाती हैं, और जो सात वर्कर्स एक्टिविस्ट्स हैं, उनकी भी गिरफ़्तारी होती है।

… तो यह पूरा सिनेरियो है। आप देखेंगे कि मुख्य धारा के जो अर्थशास्त्री हैं, जो बिज़नेस अख़बारों के अर्थशास्त्री हैं, वे भी कह रहे हैं कि 12-13000 में 12 घंटे काम करना जायज़ नहीं है, सस्टेनेबल नहीं है। भारत सरकार ने 1957 में न्यूनतम मज़दूरी को निर्धारित करने का एक वैज्ञानिक पाँच पॉइंट का फार्मूला दे दिया था। पहला, एक मज़दूर को तीन लोगों के लिए कमाने का उत्तरदायी माना जाता है। एक वर्कर को एक दिन में 2700 कैलोरी की ज़रूरत होती है। इसलिए 3 x 2700 कैलोरी का ख़ाना उसे चाहिए। दूसरा, एक साल में उन्हें 7.2 गज कपड़ा या 5 मीटर कपड़े की ज़रूरत होती है। उसकी क़ीमत की गणना होती है। तीसरा मकान का किराया है, जो पे कमीशन के हिसाब से सुनिश्चित होता है और जो आज के हिसाब से लगभग 4000 रुपये होता है। चौथा है, ईंधन, बिजली, ऊर्जा और अन्य चीज़ों का कंपोनेंट, और जो पाँचवाँ कंपोनेंट है, वह 1993 में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय है कि स्वास्थ्य, शिक्षा और मनोरंजन को भी एक कंपोनेंट माना जाए। आज जब आप कॉपी-पेन लेकर बैठेंगे और न्यूनतम चीज़ों की गणना करेंगे तो यह 32320 रुपये होगा। मगर ये सरकार पिछले 12-14 साल से 11000-12000 पर अटकी हुई है। 4000 रुपये का सिलेंडर भरा रहे हैं, 4000 रुपये किराया दे रहे हैं, 2000 रुपये का ख़ाना खा रहे हैं, तो क्या बचेगा उनके पास? इन सभी बातों का अनेक लोगों ने विश्लेषण किया और कहा भी कि ये सस्टेनेबल नहीं है। जब इन सारी परिस्थितियों में वर्कर जागता है और अपने अधिकारों के लिए लड़ाई करता है तो इतनी सारी गिरफ़्तारियों के बावजूद ये आंदोलन पंजाब के भटिंडा पहुँच गया, उत्तराखण्ड पहुँच गया है … टप्पूकेड़ा, कुसकेड़ा, रूद्रपुर में पहुँच गया। इससे पहले भी दिहाड़ी मज़दूर, असंगठित मज़दूर या इनसे निचली श्रेणी के जो मज़दूर थे, वे सामूहिक पलायन कर चुके हैं। आपने बहुत सारी रिपोर्ट्स देखी होंगी। पहली फेज़ में ही कुछ लोग दिल्ली छोड़कर गए क्योंकि वे सोसाइटीज़ में रहते हुए लकड़ी पर ख़ाना नहीं बना सकते थे।
मैं इस बात को रेखांकित करना चाहता हूँ कि इस आंदोलन की पृष्ठभूमि पिछले कुछ दिनों से बनती चली आ रही थी। जनवरी-फ़रवरी में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी कि घरेलू महिला कामगार को एक साप्ताहिक छुट्टी का अधिकार मिलना चाहिए और जो न्यूनतम वेज है, वह भी उनको मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश सूर्यकांत जी का वक्तव्य है कि जो पिछले 20-30 सालों में औद्योगिक प्रगति नहीं हुई है उसकी सारी ज़िम्मेदारी ट्रेड यूनियन की है। अगर हम घरेलू मज़दूर को भी न्यूनतम वेज देने लगेंगे तो किसी भी मध्यवर्गीय के घर ख़ाना भी नहीं बन पाएगा!! पिछले दिसंबर महीने में मारुति सुज़ुकी के मज़दूर आंदोलन कर रहे थे, उसमें 576 कर्मचारियों को गैरकानूनी तरीक़े से बर्ख़ास्त कर दिया गया था। चूँकि आपको स्थायी कर्मचारियों को बर्खास्त करने के लिए एक नोटिस देना पड़ता है, इसलिए इसे एक लेबर ट्रिब्यूनल में चुनौती दी गई थी, मगर उसका फ़ैसला 12 साल बाद आया। उसमें ये कहा गया है कि ये ‘ट्रम्पियन’ दुनिया है और भारत जैसा कोई भी देश इस ट्रम्पियन दुनिया में तब तक विकास नहीं कर सकता, जब तक लेबर अनुशासन में नहीं होगा। उनकी याचिका ख़ारिज कर दी गई और कहा गया कि उनको नौकरी में बहाल नहीं किया जाएगा। इस टिप्पणी के साथ कि राष्ट्र-निर्माण में वर्कर्स का अनुशासित होना ज़रूरी है। ये पूरी भूमिका बन रही है – ज्यूडीशरी की, लेबर कोड के ज़रिए, एडमिनिस्ट्रेशन की तरफ़ से। इस सबके साथ-साथ बहुत सारे साथियों पर झूठे केस लगाए गए हैं। लेकिन यह महत्त्वपूर्ण भी है कि पिछले 20-30 सालों में मज़दूर आंदोलन की यह सबसे बड़ी लहर है। एक आशादायक घटना है कि बिना संगठन के भी, बहुत जगह पर यूनियन नहीं है, फिर भी वर्कर्स अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं तो यह एक पॉजिटिव बदलाव है।
प्रेमचंद गांधी : मध्यवर्ग में ये एक परसेप्शन बना दिया गया है कि जो भी मज़दूर यूनियन है, श्रमिक संगठन हैं, उनके कारण कारख़ाने घाटे में जाते हैं और उनको बंद करना पड़ता है। इसलिए ये यूनियन वग़ैरह नहीं होनी चाहिए। हालाँकि मैंने आज तक किसी पूँजीपति को या सेठ को कारख़ाना बंद होने पर सड़क पर आते नहीं देखा। मज़दूर बेचारा सड़क पर आ जाता है। मालिक तो एक कारख़ाना बंद कर दूसरा खोल लेता है। मगर यूनियन ने उत्पादन बंद करवा दिया – ये परसेप्शन कैसे बनता है? दूसरी बात है कि जो श्रमिक संगठन हैं, वे प्रायः वामपंथी हैं; तो क्या वामपन्थ को बदनाम करने के लिए इस तरह का परसेप्शन बना दिया गया? इनके नेताओं ने सेठों को बहुत परेशान किया और उत्पादन बंद करवा दिया। ये परसेप्शन कैसे बनता है?
संतोष : देखिए, आपको एक दिलचस्प बात बताता हूँ। अभी बहुत सारे लोग बोल रहे हैं कि 11000-12000 वेतन बहुत कम है और ये जीने के लिए भी पर्याप्त नहीं है। कैसे इसमें किसी का गुज़ारा हो सकता है? इसके लिए हम यह देखते हैं कि भारत में जो लिबरल इकोनॉमिस्ट या जो प्रो-मार्केट इकोनॉमिस्ट हैं, उनका न्यूनतम मज़दूरी को लेकर क्या परसेप्शन है? कैसे उनकी राय बनती है? वे बोलते है कि न्यूनतम मज़दूरी तय नहीं होनी चाहिए। न्यूनतम मज़दूरी तय हो जाने से जो मज़दूर कम रेट में काम करना चाहते हैं … जैसे डिमांड और सप्लाई के अनुसार … अगर कोई मज़दूर 5000 की न्यूनतम मज़दूरी पर काम करना चाहता है और आप के पास 10000 की ही नौकरी है तो 5000 वाले की नौकरी आप खा रहे हैं और आपका जो बेरोज़गार है वह वियतनाम, बांग्लादेश आदि जगहों पर चला जाता है। तो यहाँ इस तरह का भी कैलकुलेशन होता है। अब आप देखिए, उनका मानना है कि 5000 रुपये डिमांड और सप्लाई के हिसाब से हो सकता है!! हो सकता है कि भारत में आज भी लाखों-करोड़ों लोग हैं जो 5000 में काम कर लेंगे। लेकिन 5000 के पीछे एक वर्कर होता है, हाडमांस का एक इंसान होता है। उसको खाने की ज़रूरत पड़ती है, किराए की ज़रूरत पड़ती है। एक मशीन की ज़रूरत भी पड़ती है। तो ये जो फ्री मार्केट इकोनॉमिक्स होता है, वह इस तरह की लॉजिक गढ़ता है कि डिमांड और सप्लाई का संतुलन ही सब तय करेगा। मगर उसके कारण क्या हो रहा है? मानवीय क्राइसिस हो गई है। कामगार आत्महत्या कर रहे हैं, किसान आत्महत्या कर रहे हैं, मगर इससे क्या? यह उनका अपना प्रॉब्लम है! मार्केट का जो लॉजिक है, वो बस बरकरार रहना चाहिए, उसे धक्का नहीं लगना चाहिए।
रणेन्द्र : मैं यहाँ संतोष जी की बात में एक बात जोड़ना चाहता हूँ। कलकत्ता को देखियेगा, जहाँ 20-30 साल पहले जूट मिल इंडस्ट्री हुआ करती थी, जहाँ पूर्वांचल से लोग काम करने जाते थे। मुंबई में कपड़े की फ़ैक्टरीज़ होती थीं। तो जिनके पास पूँजी हुआ करती थी, उन्हें लगा कि अब हमें दूसरे सेक्टर्स में जाना है, शिफ्ट करना है। यहाँ की बजाय वहाँ ज़्यादा फ़ायदा है, तो उन्होंने अपनी फैक्ट्री बंद कर दी। जैसे मुंबई में कपड़ा मिलें बंद कर उन्हें रियल इस्टेट में बदला गया, जिससे अरबों रुपया उन ज़मीनों के मालिकों ने कमाया। वहाँ के मज़दूर कहाँ गए? किस चूल्हे में धँस गए? उसकी चिंता किसी ने नहीं की मगर रियल इस्टेट से उन्होंने कमाई कर ली। जूट इंडस्ट्री में जो पूँजीपति थे, वे दूसरे सेक्टर में चले गए। शिफ्ट हो गए। तो फैक्ट्री बंद हुई दूसरे कारणों से, मगर ये जो अंदरूनी बातें हैं, मीडिया हमें नहीं बताता है। ठीक है कि पब्लिक सेक्टर में कुछ स्थानों पर ट्रेड यूनियन के लोगों ने दिहाड़ी मज़दूरी पर अपने-अपने गाँव के लोगों को ज़्यादा घुसाया था। उन्हें छोड़ दीजिए और सीधे गवर्नेंस में आइये – सीधे सरकारी व्यवस्था में। पिछले 20 वर्षों से चतुर्थ वर्ग कर्मचारियों की भर्ती बंद कर दी गई है। आप आउटसोर्सिंग कीजिए। अब चतुर्थ वर्ग कर्मियों की भर्ती में क्या होता था, यह हमारी जानकारी में नहीं है, मगर मेरा जो ग्रास रूट लेवल का अनुभव है कि बिसुनपुर में जो प्यून थे हमारे, अधिकांश असुर और ब्रिजिया, जो सबसे पिछड़े, कमज़ोर जनजाति के हैं, जिनकी आबादी 8 से 9000 है, उनके दसवीं और मेट्रिक पास व्यक्ति प्यून लगे थे। 1990 में एक डीसी वर्मा साहब आए थे बाक्साइट माइन्स में, वहाँ जितने भी दसवीं-मेट्रिक पास असुर और ब्रिजिया युवा थे, उन्हें लाकर उन्होंने नौकरी दे दी थी। उन दिनों कलेक्टर को यह अधिकार हुआ करता था। अब नियमित भर्ती बंद करने से क्या हुआ कि जो बिलकुल ग़रीबी रेखा के नीचे के लोग इस तरह प्यून वग़ैरह की नौकरी में आते थे, वे अपने बच्चों को भी पढ़ाते थे। एक तरह से वे लोग ग़रीबी रेखा को तोड़ पाते थे, उससे निकल पाते थे। अब चतुर्थ वर्ग कर्मचारियों की पूरी बहाली आपने बंद कर आउटसोर्सिंग कर दी है, उसका नतीजा यह है कि काम तो कर रहा है वह 12 घंटा, 14 घंटा, मगर पेमेंट आप वही पुराना कर रहे हैं 12000-14000, और उसे हाथ में मिल रहा है 8000 ही। हमारे यहाँ जो स्टेनोग्राफर की पोस्ट हुआ करती थी, वह स्थाई हुआ करती थी। उस पोस्ट को ख़त्म कर दिया गया। कंप्यूटर ऑपरेटर को अब आउटसोर्सिंग किया जाता है। किसी भी शहर में एक परिवार चलाने के लिए जो पढ़ा-लिखा आदमी है, वह 10 बजे के पहले आता है और सबसे बाद में जाता है, उसको आप 12-14000 दे रहे हैं। हमारे दो कंप्यूटर ऑपरेटर्स ने अलग-अलग कारणों से आत्महत्या कर ली। परिवार के दबाव थे, बच्चियाँ बड़ी हो रही थीं। उनको पढ़ाई करवानी थी। आप कह सकते हैं कि वह दुर्घटना हुई है कि वह साइकिल चलाते हुए खोया हुआ था और दुर्घटना हो गई। या फिर अन्य ने दूसरे शहर में जाकर फाँसी लगा ली। तो ये केवल पेट का मामला नहीं है, किसी का जीवन ले लेने का मामला है।
दूसरी बात, हमारे मज़दूर साथियों ने अपनी जो बातें साझा की थीं, उनकी बाक़ायदा रिकॉर्डिंग हुई है। हमारी साथी प्रज्ञा उसको ट्रांस्क्राइब करवा रही हैं। उसकी किताब बनकर दिगंबर जी की ओर से प्रकाशित होगी। तीसरी बात जो मैं बताना चाह रहा था कि जो नया ट्रेंड है पूँजीवादी संस्कृति का, कि अब कोई भी अभियान है या कोई भी चीज़ हो रही है, वह व्यक्तिकेंद्रित हो गई है। भोपाल में एक व्यक्ति ‘सब कुछ’ करवा रहा है। कहीं से पूँजी आ गई तो दिल्ली या कलकत्ते में एक व्यक्ति ‘कुछ’ करवा रहा है। इसलिए हमने इस कार्यक्रम को बिलकुल व्यक्तिकेंद्रित नहीं रखा था क्योंकि यह व्यक्तिकेंद्रीयता पूँजीवादी संस्कृति की थोपी हुई बात है। यहाँ श्रमिक संगठनों के साथियों के साथ प्रलेस के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी वहाँ थे, जया मेहता थीं, दिगंबर जी जैसे साथी थे, जसम के साथी अनुपम सिंह और जनार्दन जी थे, साथ ही अनेक नए रचनाकार थे।

मैं इधर अंतरराष्ट्रीय बातों का अध्ययन कर रहा था। अमेरिका की एक एजेंसी है पेलेंटिर कंपनी, जिसे 1991 के बाद सीआईए ने अपनी पूँजी से खड़ा किया था। यह एक आईटी की कंपनी है जिसे इसलिए बनाया गया था कि वह डेटा संग्रह करेगी । एक तरह से सर्विलेंस में रखेगी लोगों को और उस डेटा का एनालिसिस वग़ैरह करेगी। उसके जो ओनर हैं या सबसे बड़े सीईओ हैं एलेक्जेंडर सी कार्प, उन्होंने एक नई किताब लिखी है ‘द टेक्नोलॉजी रिपब्लिक’, उनका मानना है (या फिर हम जो ऑपरेशन सिंदूर में भी देख रहे हैं, यूक्रेन-रशिया के युद्ध में और अभी ईरान वाले युद्ध में भी देख रहे हैं) कि अब एआई पर आधारित युद्ध की सामग्री मुख्य भूमिका निभा रही है। इसमें उन्होंने २२ पॉइंट दिए हैं, जिनसे अब जियो-पॉलिटिक्स तय होगी। उनका मानना है कि अब न्यूक्लियर पॉवर केंद्र में नहीं है। न्यूक्लियर पॉवर की अब कोई औक़ात नहीं रह गई है, जो बीसवीं या इक्कीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक थी। अब इक्कीसवीं सदी की इस दहाई में एआई न्यूक्लियर पॉवर की जगह ले रहा है। एआई और डेटा, इन दो चीज़ों पर जिसकी पकड़ होगी, उसका ही वर्चस्व स्थापित होगा। वह पूँजी से बड़ी चीज़ हो गया है। अब पूंजीवाद, इंडस्ट्री के प्रोडक्शन वाला पूंजीवाद नहीं है, अब वह डेटा कैपिटलिज़्म, सर्विलेंस कैपिटलिज़्म के तौर पर हमारे सामने है। वे कह रहे हैं कि जब इतनी चीज़ें बदल गई हैं तो यूरोप और अमेरिका की सुप्रीमेसी तभी तक बनी रहेगी, जब तक जो टेक्नोक्रेट्स हैं, जो सिलिकॉन वैली में बैठे हुए लोग हैं, वे केवल अपनी ड्यूटी नहीं कर रहे हैं, बल्कि वो नेशन के लिए, अमेरिका के लिए और अमेरिका की सैन्य आवश्यकताओं के लिए भी उत्पादन करते रहें। यानी कि सेना, टेक्नोलॉजी और ब्यूरोक्रेसी को किनारे किया जा रहा है और अब पूँजी भी डेटा आधारित पूँजी है। अब यह एक बहुत नई चीज़ है। मज़दूरों को इग्नोर करने के पीछे यह तथ्य भी है। अब डेटा कैपिटलिज्म और एआई ही सब कुछ का केंद्र बन गया है। उनका कहना है कि बराबरी कोई चीज़ नहीं होती। सांस्कृतिक बराबरी या सांस्कृतिक एकता नाम की कोई चीज़ नहीं होती। एक विशेष समुदाय, सिर्फ़ उत्पादक समुदाय होता है। (वे हमारी ओर इशारा कर रहे हैं।) वे कहते हैं कि व्हाइट रेस शासन करने के लिए पैदा हुई है, यह बात पुरानी पड़ गई है। अब तो टेक्नोलॉजी जिनके पास है, वे हम पश्चिम के लोग, जो सुपीरियर हैं और कल्चरली उनसे बेहतर हैं, जो हमारे पीछे हैं। तो इस तरह ये सारी चीज़ें बदल गई हैं। अब डेटा कैपिटलिज़्म में बेस और सुपरस्ट्रक्चर वाली चीज़ ही बदल गई है। क्योंकि आप जो फ़ेसबुक में जा रहे हैं, आप जो मेटा या गूगल पर जा रहे हैं, आप जो लाइक और डिसलाइक कर रहे हैं, आप जिन चीजों को छू रहे हैं, वही आँकड़े उनकी पूँजी के रूप में काम कर रहे हैं। यहाँ जो लेबर है वह उपभोक्ता है और वही लेबर भी है। मतलब इन लोगों ने इस तरह आधार और अधिरचना को ही बदल दिया है। उसके आधार पर वह तय कर रहा है कि आपको कौनसी चीज़ें देखनी हैं, पढ़नी हैं, क्या सुननी है। मतलब आपकी संस्कृति को, आपकी अधिरचना को वह डेटा एनालिसिस के आधार पर तय कर रहा है और लेबर के रूप में आप ही काम कर रहे हैं, आप ही उपभोक्ता भी हैं। तो ये जो सारी चीज़ें बदल गई हैं, मार्क्स जिसे बेस और सुपरस्ट्रक्चर का संबंध कह रहे थे, उसको ही बदल दिया गया है। पूँजी की अवधारणा ही बदल दी। यहाँ श्रमिक उस तरह से है ही नहीं। आप ही श्रमिक है, आप ही उपभोक्ता हैं। आप से ही वह मोनेटाइज़ करवा रहा है और आप से ही स्क्रॉल करवाया जा रहा है। आपकी लाइक और डिसलाइक को, आपकी कौनसी चीज़ें कहाँ-कहाँ जा रहीं हैं, आप किन चीज़ों को पसंद कर रहे हैं, वहीं से वह आँकड़ा ले रहा है और आप ही को बेच रहा है। और आपको मालूम ही नहीं है कि हमारे ही श्रम से वह सारी चीज़ें क्रिएट कर रहा है। एक पूँजी क्रिएट कर रहा है। एक नई दुनिया में ले जाकर फँसा रहा है हमको। चूँकि इसमें हमें वह रोटी तो देगा नहीं, भूख के लिए तो हमें खेतों पर ही निर्भर करना होगा, कपड़े के लिए भी हमको निर्भर होना पड़ेगा। ठीक है कि मकान के लिए थ्री-डी प्रिंटिंग हो रही है, लेकिन अभी वह समय दूर है। हमारा जो ट्रिलियन का ग्राफ दिख रहा है, वह जहाँ से दिख रहा है, जिन चीज़ों से दिख रहा है, हमारा पूरा शासक वर्ग उसी ग्राफ में लगा हुआ है। उसके लिए हम और हमारे मज़दूर कोई काम की चीज़ नहीं है। वह कीड़े-मकोड़े की तरह की चीज़ है उनके लिए। इनकी न्यूनतम आवश्यकता की कोई परवाह नहीं है उनको, लेकिन उसमें कितनी बड़ी संख्या में सुसाइड हो रहा है? कितनी तरह की बीमारियों से गुज़र रहे होंगे वे लोग? हमने अपने जीवन में दो कंप्यूटर ऑपरेटर्स को मरते देखा है। अगर इस तरह का सर्वेक्षण किया जाए, तो 11000-12000 में ग़रीबी से, कुपोषण से और भूख से कितने लोगों ने प्राण त्यागे होंगे? ये आँकड़े भयावह होंगे! इस पर बात होना ज़रूरी है।
प्रेमचंद गांधी : संतोष जी, पिछले 10-12 सालों से एक चलन चल रहा है कि काम आउटसोर्स कर दीजिए और बचे हुए काम को संविदा पर, कॉट्रेक्चुअल बेसिस पर करवा लीजिए। मतलब सरकार ख़ुद अपने कर्मचारियों की भरती करने की बजाय कॉंट्रैक्ट पर रखती है। जैसे सफ़ाई वाला काम है, गार्ड का काम है या चपरासी वाले काम है, उसके लिए किसी कंपनी को आउटसोर्स कर दिया जाता है। मेरा एक अनुभव साझा करता हूँ कि आउटसोर्स करने वाली कंपनी आपसे कहेगी कि हम आपसे 30000 रुपये प्रति व्यक्ति लेंगे, और वे 30000 लेकर अगले बंदे को मात्र 12000 या 13000 ही देते हैं। तो इसका कोई मैकेनिज़्म नहीं है कि उसको कैसे कंट्रोल किया जाए? भई, 30000 मिल रहे हैं तो आप 3000 रख लो, 10% तुम्हारा हो सकता है एक व्यक्ति के लिए, मगर उसको 27000 तो दे दो! इसमें एक और बात कि, जिसको हम पहले श्रम-शक्ति माना करते थे, उसे अब मानव संसाधन या ह्यूमन रिसोर्स में बदल दिया गया है। तो मनुष्य को एक संसाधन में बदलने की जो प्रवृत्ति बनी है, वह बहुत ही ख़तरनाक है। इस पर बताइए।
संतोष : मैं इस पर यह कहना चाहता हूँ कि जो किया जा रहा है, वह बहुत सोच-समझकर किया जा रहा है। वर्कर्स का जो संविदाकरण किया जा रहा है, वह सरकार की बहुत स्पष्ट नीति है। आप कांट्रेक्टर को छोड़िए, जो ठेके वाले मज़दूरों को पैसा नहीं देते हैं, उन्हें छोड़िए; सरकार ख़ुद अपने बहुत सारे वर्कर्स को सही पैसे नहीं देती है। आँगनबाड़ी वर्कर्स, आशा वर्कर्स को मज़दूर ही नहीं मान रही है। जो रसोइयाँ हैं, मिड डे मील चलाती हैं, उनको न्यूनतम मज़दूरी नहीं देती है। उनको स्टायपेंड के रूप में देती है। जो गिग वर्कर्स हैं, उनको मज़दूर का दर्ज़ा हासिल नहीं है। ये तो स्ट्रक्चरली मज़दूर को पूरा मज़दूर भी न मानना, और उसमें कभी प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में ट्रेनी आ गए हैं, एफ़टीई, फिक्स टर्म एम्प्लॉयमेंट आ गया है, तो ये पूरा एक स्ट्रक्चरल सुपर प्रॉफिट एक्सट्रैक्ट करने का सिस्टम बन गया है। इसमें सरकार ख़ुद कुछ नहीं बोलती, क्योंकि सरकार ख़ुद अपनी परियोजनाओं में आशा वर्कर्स, आँगनबाड़ी वर्कर्स को 2000 से 5000 देती है।


रणेन्द्र : इसमें एक बात को जोड़ता हूँ कि निर्लज्जता यह है कि अमेरिकी या अन्य विदेशी कन्सल्टेंसी कंपनी के एडवाइज़र्स को हरेक विभाग में लाख-डेढ़ लाख रुपये के वेतन पर, सचिवालय और मंत्रालय में आउटसोर्सिंग किया जा रहा है, जबरन, जहाँ उनकी क़तई आवश्यकता नहीं है … मतलब मैं स्पोर्ट्स यूथ अफ़ेयर्स में था, वहाँ भी अमेरिकन कंपनी के चार लोगों को डाला हुआ था। अब बताइए कि यूथ स्पोर्ट्स में उनकी क्या ज़रूरत है? हमारे सारे स्टाफ के कुल भुगतान से उनका भुगतान हम ज़्यादा करते थे। चार लोगों का भुगतान लगभग 15 लाख रुपये प्रति माह होता था। लेकिन हम अपने ही वर्कर को, चाहे वह आशा वर्कर हो, जल-सेविका हो या आँगनबाड़ी सेविका हो, उसे नज़रअंदाज़ करते हैं। आख़िर सरकारी सिस्टम में चतुर्थ वर्गीय कर्मी क्यों नहीं होना चाहिए? या जब वह स्टेनोग्राफर था, तो कंप्यूटर ऑपरेटर स्थायी क्यों नहीं हो सकता? लेकिन ये बातें बहुत संवेदनशील सेक्रेटरी या चीफ़ सेक्रेटरी के भी समझ में नहीं आतीं। ये बहुत अजीब तरह की बात है। सोचने और मानने के लिए कोई तैयार ही नहीं है। पता नहीं इन्हें कौन नचा रहा है? जिन्हें फ़ील्ड में बहुत वामपंथी माना जाता था, वे जेएनयू के लोग, जो बहुत अच्छे प्रोग्रेसिव आईएएस हैं, वे भी सचिवालय पहुँचते-पहुँचते इन चीज़ों पर बात ही नहीं करना चाहते। बहुत ही अद्भुत और अमानवीय परिवर्तन है ये! समझ में नहीं आ रहा है कि डेढ़ लाख हम दे रहे हैं एक एडवाइज़र को, जो आउटसोर्सिंग से आया है और 12000 रुपये दे रहे हैं अपने कंप्यूटर ऑपरेटर को, जो सबसे ज़्यादा काम कर रहा है! इसके बावजूद हर महीने उसको यह राशि भी नहीं मिल पाती। इसके विपरीत आउटसोर्सिंग वाला क्या करता है? सफ़ाईकर्मी के तौर पर किसी चौबेजी या मिश्राजी को रख लेगा, जो उनके लोग होंगे! वे लोग फिर अलग से खटवाएँगे दलित लोगों को! उनको वे भुगतान करेंगे। आपने आउटसोर्सिंग वाले को दिया 25000, उसने मिश्राजी को दिया 20000 और मिश्राजी सिर्फ़ 8000 देंगे उस दलित को, जो शौचालय वग़ैरह की वाक़ई सफ़ाई कर रहा है या झाड़ू दे रहा है। अजीब तरह का वर्ग-चरित्र और अजीब तरह की अमानवीयता आपको दिखाई पड़ेगी इस बदलते हुए समय में। और हमारा ध्यान नहीं जाता इन सारी चीज़ों पर।
प्रेमचंद गांधी : पंकज जी, हमने और आपने सर्विस सेक्टर में लंबे अरसे तक काम किया है, तो सर्विस सेक्टर में एक तयशुदा टाइम होता है 8 घंटे का, उसकी जगह अब 10-12 घंटे सामान्य चीज़ हो गया है। एक बात और, यदि आप अध्यापक हैं तो आपका मूल काम अध्यापन करना है, दूसरे कामों के लिए पहले अलग स्टाफ होता था। अब अध्यापक के ज़िम्मे ही उसकी सैलरी बनाने से लेकर सारी ख़रीददारी करना, रजिस्टर तैयार करने जैसा सारा काम उसे ही दे दिया गया है। राजस्थान में एक और बात हुई है कि कॉलेज के शिक्षक आएँगे कॉंट्रैक्ट पर 5 साल के लिए, और उनकी फिक्स्ड सैलरी होगी 28500 रुपये, क्या किसी प्रोफेसर या लेक्चरर के लिए ये स्थितियाँ न्यायपूर्ण हैं?
पंकज मित्र : इस नई पूँजी की व्यवस्था में काम के घंटों के निर्धारण की अवधारणा पूरी तरह ख़त्म कर दी गई है। अभी बहुत सारी बातें हुई ठेके के बारे में, ठेका और डेटा हमारे देश के सामने बहुत बड़ी समस्या के रूप में सामने आए हैं। ठेका और डेटा हमारे समूचे सांस्कृतिक परिदृश्य को बदल रहा है। जिस देश में ठेके पर बड़े-बड़े नेता और प्रधानमंत्री तक तय किए जा रहे हों, और जिनसे 18-18 घंटे अमानवीय श्रम करवाया जा रहा हो। विहाग वैभव ने कभी इस पर एक कविता भी लिखी थी कि क्यों भई, प्रधानमंत्री 18 घंटे काम करते हैं तो ये तो शोषण है उनका! तो इस तरह निर्धारित काम के घंटे ख़त्म हो गए हैं। जो लोग डिजिटल कंपनियों में काम करते है, आईटी सेक्टर में काम करते हैं, उनके लिए समय की कोई सीमा नहीं है। कोई अमेरिकन कंपनी है तो वो 11 बजे रात को ऑनलाइन मीटिंग करेगी तो यह भी उनके काम के घंटे में ही गिना जाता है इसलिए उसकी अवधारणा ही ख़त्म हो गई। और फिर ठेके पर देने की जो बातें की गईं, वह एक बहुत बड़ी साज़िश के रूप में सामने आया है कि कोई भी मज़दूर एक साथ एका न बना सकें, इसीलिए ठेके के मज़दूर सात-आठ प्रकारों में बाँटे गए हैं। उसमें तरह-तरह के मज़दूर हैं – कौन बिना वर्दी वाले ठेका मज़दूर हैं, कौन वर्दीवाले ठेके मज़दूर हैं। ये जो विभाजनकारी नीतियाँ हैं ये पूरे आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए एक बहुत बड़ी साज़िश के रूप में सामने आई हैं। हमें इन तमाम तरह की स्थितियों को पहचानना होगा। ख़ास तौर पर लेखकों को तो ज़रूर कि, इन महीन चीज़ों को कैसे पकड़ें और उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा अपनी रचनाओं में कैसे ला सकें, ये बहुत बड़ा चैलेंज है हमारे सामने।
प्रेमचंद गांधी : मेरा एक और अनुभव है कि एक कंपनी में आउटसोर्स किए हुए कर्मचारी थे, जिनका वेतन 15000-16000 था, हर वर्ष 10% की बढ़ोतरी होती थी। तो वहाँ एक नया सीईओ आया और उसने कहा कि बहुत ज़्यादा पैसा दे रहे हैं हम लोग इन्हें, तो उन्होंने कंपनी से कहा कि ये सब अनस्किल्ड वर्कर्स हैं तो हम इन्हें अनस्किल्ड वर्कर्स के हिसाब से पेमेंट करेंगे। इनका कॉंट्रैक्ट दोबारा करेंगे। सोचिए, जो आदमी 5 साल से आपके यहाँ काम कर रहा है, वह ग्रेजुएट है, पीजी है, उसको अनस्किल्ड बताकर उसकी तनख़्वाह घटाकर 11000-12000 करवा दी!
रणेन्द्र : 2023 में दिल्ली की बैठक में हमारे जनजातीय कार्य मंत्रालय के मंत्री और सचिव महोदय हम लोगों को समझा रहे थे, अगर ग़रीबी-वरिबी दूर हो जाती तो हम ‘एनार्को कैपिटलिज्म’ ले आते यहाँ ! एनार्को कैपिटलिज्म मतलब पुलिसिंग और अन्य कामों को भी हम निजी हाथों में दे सकते हैं। अब वे लोग सरकारी महकमे से पुलिसिंग को भी हटाने की कल्पना कर रहे हैं!
प्रेमचंद गांधी : जयपुर में शुरू हो गया है यातायात मित्र। ट्रैफ़िक पुलिस का काम उन्हें सौंप दिया गया है। वे आउटसोर्सिंग ही कर रहे हैं।
रणेन्द्र : जितनी भी सोसायटीज़ या अपार्टमेंट्स में जो निजी गार्ड्स हैं, वे आउटसोर्सिंग में ही हैं। तो हम पुलिसिंग के प्राइवेटाइज़ेशन का काम शुरू कर ही चुके हैं। लेकिन बाक़ायदा घोषणा करके कि अब हम करेंगे, यह तो अद्भुत है। नेहा दीक्षित की एक किताब है – The many lives of Syeda X’, हिन्दी में आ गई है, ‘कोई एक सईदा’ शीर्षक से, तो जो वर्णन है इसमें, वो अद्भुत है। एक महिला बाबरी मस्जिद-विध्वंस के बाद बनारस के गाँव से निकलकर दिल्ली आती है, अलग-अलग सेक्टर्स में काम करती है। और 20-30 साल के बाद दिल्ली दंगे के बाद फिर लौट जाती है। बीच में वह जो काम कर रही है, कुकर बनाने से लेकर कपड़ा सिलने से लेकर कितने ही सेक्टर्स में वह काम करती है और किस तरह से जीवन गुज़ारती है, अद्भुत वर्णन है इस किताब में! दूसरी किताब है ‘द टेक्नोलॉजिकल रिपब्लिक’। इसको देखना चाहिए कि अगले 4-5 साल के बाद जिस पूँजीवाद से हमारी भेंट होनी है, हम कहाँ जाने वाले हैं। ये दो किताबें हैं, जो हमें पूँजीवाद के नए रूप से रूबरू कराती हैं। पुराना प्रोडक्शन से जुड़ा रूप और नया एआई और डेटा कैपिटलिज्म का नया रूप! किस ढंग से पूरी दुनिया के जियोपॉलिटिक्स को चेंज करने वाला है या चेंज कर रहा है। ये किताबें ज़रूर पढ़नी चाहिए हम लोगों को।


प्रेमचंद गांधी : पंकज जी, आप जो काम के घंटों वाली बात कर रहे थे, तो कोविड के समय से जो वर्क फ्रॉम होम की अवधारणा आई है न, उसने तो और भी बेड़ा गर्क कर दिया है। आदमी घर में बैठकर 24 घंटे का नौकर हो गया है। उसे पूरे समय मेल चेक करना है, मेसेज चेक करना है, और जो भी ऑर्डर आए, उसके अनुसार काम करके भेजना है।
पंकज मित्र : कंपनियों ने अपने खर्चे घटा दिये हैं।
प्रेमचंद गांधी : संतोष जी, ये दिल्ली वाले, हरियाणा वाले जो सारे आंदोलन हुए हैं, उस दौरान श्रम विभाग नाम की जो संस्था होती है, वह क्या कर रही थी? कई जगहों पर बहुत बुरे हालात हैं। अभी एक जगह बॉयलर फट गया! मज़दूर इस तरह की ख़तरनाक स्थितियों में काम करने के लिए बाध्य हैं, क्या श्रम विभाग वहाँ जाकर चेक नहीं करता कि किस तरह से इनका पे आउट होता है? किन स्थितियों में ये लोग काम करते हैं? ज़िम्मेदारी तो उनकी भी बनती है न अगर सरकार है तो?

संतोष : देखिए, इसमें दो चीज़ें है, एक तो यह कि श्रम विभाग में यह कोई करप्शन का मामला नहीं है। ये डेलिबरेटली बाय डिज़ाइन नए लेबर कोड में सरकार ने तय किया है कि जो पहले ‘लेबर इंस्पेक्टर’ हुआ करते थे, वे नए लेबर कोड में ‘लेबर फ़ेसिलिटेटर’ हैं। तो अब लेबर इंस्पेक्टर आकस्मिक रूप से जाकर कोई जाँच-पड़ताल नहीं कर सकते। पहले इनका काम था कि जाकर जाँच करें कि कहाँ 8 घंटे का क़ानून लागू नहीं हो रहा है। कहाँ ओवरटाइम का पेमेंट नहीं हो रहा है। पीएफ़ काटा जाता है पर मज़दूरों के खाते में जमा नहीं होता। ईएसआई की सुविधा नहीं मिल रही है। इसकी जाँच के लिए लेबर डिपार्टमेंट है, लेबर कमिश्नर है, असिस्टेंट लेबर कमिश्नर का पूरा स्ट्रक्चर है। मगर अभी जो आंदोलन हुआ, उसमें तुरंत एक पोस्ट का गठन कर दिया गया – डीसीपी लेबर!! तो ये लेबर प्रॉब्लम्स को हमेशा लॉ एण्ड ऑर्डर में या क्रिमिनल तरीक़े से डील करने की एक सुनियोजित रणनीति है। आप देखेंगे, जो आठ घंटे का क़ानून लागू हुआ, उसके बारे में लेबर कमिश्नर चैनल पर आकर नहीं बोलते … नोएडा के जो डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर हैं, वे आकर बोलते हैं, जबकि यह उनका कार्यक्षेत्र नहीं है। आठ घंटे का क़ानून लागू हो गया है या वेतन में बढ़ोत्तरी हो गई है, या ओवरटाइम का पैसा मिलेगा, ये बताना एसपी या डीएम का काम नहीं है, ये लेबर कमिश्नर का काम है लेकिन ये सारी घोषणाएँ उन्होंने कीं। तो ये एक बहुत सोचे-समझे तरीक़े से लेबर क्वेश्चंस को उलझाना है। एक और बहुत दिलचस्प बात है कि मीडिया में कोई लेबर बीट नहीं है इसलिए जैसे ही आंदोलन शुरू हुए, तो पता चला कि मीडिया में किसी की भी ट्रेनिंग नहीं है लेबर स्ट्राइक्स को कवर करने की, मज़दूरों की समस्याओं को समझने की। जो लोग थोड़े सेंसिटिव हैं, वे गरीब बेचारे की तरह आकर कवर करते हैं। पहले एक लेबर बीट हुआ करती थी। जब मैंने मीडिया वालों से पूछा तो उन्होंने बताया कि वे क्राइम बीट से आए हैं। तो जो क्राइम पर रिपोर्टिंग करता है, वह अब लेबर की रिपोर्टिंग करता है क्योंकि अब उन्हें लेबर उपद्रवी लगते हैं, दंगाई लगते हैं। प्रशासन भी यही मानता है कि इसे पुलिस प्रशासन से ही हैंडल करवाना चाहिए। मीडिया को क्या कहा जाए? उन पर तो बेचारों पर ख़ुद वेज बोर्ड लागू नहीं है। वे ख़ुद कॉंट्रैक्चुअल लोग हैं। वे पत्रकार नहीं न्यूज़ बॉयज़ हैं।
रणेन्द्र : मैं अगले कार्यक्रम की सूचना देना चाहूँगा। 16-17-18 अक्तूबर को हमने तय किया है, दशहरे के तीन-चार दिन पहले, सारनाथ में बनारस के साड़ी बुनकर या फिर भदोही और मिर्ज़ापुर के क़ालीन बुनकर, मऊ के पॉवरलूम के वर्कर्स और कानपुर से कुछ वर्कर्स आएँगे, घरेलू कामगार वर्कर्स भी आएँगी। इस तरह फिर से अलग-अलग सेक्टर्स के लोगों को हम सुनेंगे। इसमें हमारे पास कोई फण्ड नहीं है, हम साथी लोग ही मिल-जुलकर इसे कर रहे हैं। अपनी समृद्धि के लिए इसे कर रहे हैं कि हम कुछ सीखें, कुछ जानें।
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