इप्टा के दस्तावेज़ीकरण के अन्तर्गत हम इप्टा की स्थापना के प्रारंभिक दौर में जुड़े संस्कृतिकर्मियों और तत्कालीन घटनाओं की अधिक से अधिक तथ्यात्मक जानकारी यहाँ संकलित कर रहे हैं। यह आश्चर्यजनक है कि चालीस के दशक के पूर्व अनेक लड़कियाँ और महिलाएँ वामपंथी राजनीति और संस्कृतिकर्म के क्षेत्र में उल्लेखनीय रूप में सक्रिय दिखाई देती रही हैं। शांता गांधी (जन्म 20 दिसंबर 1917, मृत्यु 06 मई 2002) उनमें से एक हैं। उनके छात्र-जीवन से लेकर अंत तक वे विविध क्षेत्रों में नए-नए प्रकार का काम करती रहीं। इप्टा की स्थापना से पूर्व और उसके बाद के आठ-दस वर्षों के बीच शांता गांधी के क्रियाकलापों के बारे में कुसुम त्रिपाठी द्वारा लिए गए उनके दीर्घ साक्षात्कार के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं, जो उन्होंने अपने नोट्स के आधार पर साझा किए हैं।


कुसुम त्रिपाठी न केवल साहित्यकार हैं, बल्कि एक सक्रिय और प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी भी रही हैं। उन्होंने 1987 में अपने एम.फिल. के लघु शोध प्रबंध के लिए ‘नुक्कड़ नाटक : उद्भव और विकास’ विषय चुना। उनके पास इस विषय पर कोई ख़ास लिखित सामग्री नहीं थी। मुंबई में नव निर्माण सांस्कृतिक मंच नामक संस्था थी, जो प्रति वर्ष ‘नाट्य जात्रा’ नामक आयोजन करती थी। इसमें इप्टा के लोग भी शामिल थे। सरदार ज़ाफ़री, ए. के. हंगल, कैफ़ी आज़मी, जब्बार पटेल आदि कलाकार इसकी आयोजन समिति में थे। उन्होंने कुसुम को आश्वासन दिया कि वे उन्हें गाइड करेंगे। गाइड करना तो ठीक, मगर अकादमिक शोध में लिखित एवं अन्य संदर्भ-सामग्री आवश्यक थी, इसी सिलसिले में एनसीपीए मुंबई के ग्रंथालय में अध्ययन के दौरान उन्हें इप्टा के संदर्भ में शांता गांधी के बारे में जानकारी मिली। हालाँकि उस समय उन्हें यह पता नहीं था कि शांता गांधी से कभी मुलाक़ात भी हो पाएगी। चूँकि कुसुम त्रिपाठी ‘आव्हान कला मंच’ की सदस्य और सक्रिय सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी थीं, अतः उन्हें सीमांतनी ध्रुव ने, जो डाक्यूमेंट्री निर्माता थीं, ‘अबाकस’ (ABACUS) के अनुवाद के लिए बुलाया। कुसुम बताती हैं – ‘उस पर निदेशक का नाम था शांता गांधी। मैं उछल पड़ी। मैंने सीमांतनी से पूछा कि क्या यह वही शांता गांधी हैं, जो कम्युनिस्ट पार्टी में थीं। उनके द्वारा हामी भरे जाने पर मैं बहुत रोमांचित हुई कि मुझे तो आधार मिल गया।’ सीमांतनी से शांता गांधी का फ़ोन नंबर और पता लेकर कुसुम ने शांता जी से संपर्क किया। उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी घर आने का न्यौता दे दिया। 1988 में ग्रीष्मकालीन अवकाश में 20 अप्रैल से 20 जून के बीच सप्ताह में तीन-चार दिन रोज़ लगभग तीन घंटे तक उनसे बातचीत होती रही। उन्होंने जो जानकारी दी, शायद वह किसी पुस्तक में दर्ज़ नहीं है। उन्हें भी बहुत ख़ुशी मिली कि कोई इसे दर्ज़ कर रहा है। हालाँकि उन दिनों उनकी तबियत ठीक नहीं थी, मगर अपनी तबियत की परवाह न करते हुए, बहुत बेबाक़ तरीक़े से वे जिस तरह बताती थीं, वह अचरज की बात थी। उनकी बोल्डनेस उनके व्यक्तित्व में दिखाई देती थी। आश्चर्य की बात यह भी थी कि वे घरेलू लिबास वग़ैरह में नहीं, बल्कि बाक़ायदा साड़ी पहनकर तैयार होकर बैठती थीं। (जबकि वह ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग का ज़माना नहीं था) उनके हाथ में हमेशा एक सिगरेट बनी रहती थी। उनके उस अक्स में एक इतिहास नज़र आता था। उनके व्यक्तित्व में जो जोश दिखाई देता था, वह बाद की पीढ़ियों में नहीं दिखाई देता। उन्हें देखना बहुत आकर्षक था।
शांता गांधी ने कुसुम त्रिपाठी से बातचीत करते हुए बताया कि 1938-39 में वे विद्यार्थी आंदोलन में आईं। उस समय फ़ीस को लेकर आंदोलन खड़ा हुआ था। ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन की स्थापना हो चुकी थी। वे इसकी सदस्य बनीं। उन्होंने बताया था कि वह सिर्फ़ विद्यार्थी आंदोलन नहीं था, बल्कि वहाँ कुछ लोगों को शस्त्र चलाना भी सिखाया जाता था। जो लोग उस समय जेलों में बंद थे, उनके लिए भी ये लोग जुलूस वग़ैरह निकाला करते थे। उन्होंने तत्कालीन विद्यार्थी आंदोलन का खाका पेश करते हुए बताया कि पंजाब, बंगाल, मुंबई और लखनऊ में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन की स्थापना के बाद ही बड़ी संख्या में विद्यार्थी जुड़े थे। एक लाख से ज़्यादा सदस्यता थी। उस समय काफ़ी छात्राएँ भी पढ़ रही थीं इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर सोचा गया कि क्यों न छात्राओं को एकत्रित किया जाए! परिणामस्वरूप 1940 में लखनऊ में सिर्फ़ छात्राओं की देशव्यापी परिषद बुलाई गई, जिसका उद्घाटन सरोजिनी नायडू ने किया था और अध्यक्ष बनी थीं रेनु रॉय चक्रवर्ती। वे बंगाल के मुख्यमंत्री बिधान चंद्र राय की बेटी थीं, जो ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़कर लौटी थीं। लगभग 250 छात्राओं ने इसमें भाग लिया था, जिसमें शांता गांधी भी शामिल थीं। उषा चौधरी, पेरिल भरुचा, कमल बापट, सुशीला, शांति सरकार, कल्याणी मुखर्जी, गीता चौधरी आदि उसमें सक्रिय रूप से सम्मिलित हुई थीं। शांता जी आगे बताती हैं कि उसके अगले साल 1941 में कलकत्ता में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का अधिवेशन आयोजित किया गया, जिसकी वे अध्यक्ष बनीं। इसमें लगभग 50000 विद्यार्थियों ने भाग लिया था। उसके बाद ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भी बहुत बड़ी संख्या में स्त्रियों ने भाग लिया था। चूँकि इस आंदोलन के दौरान देश के अधिकांश बड़े नेता जेल में बंद हो गए थे इसलिए छात्र आंदोलन से उभरी महिलाओं ने नेतृत्व सम्हाला और ‘महिला आत्म रक्षा समिति’ का गठन किया। शांता गांधी बंगाल में स्थापित ‘महिला आत्म रक्षा समिति’ में भी सक्रिय थीं। इसके अंतर्गत ‘नारी सेवा संस्था’ और पंजाब में ‘वीमेन ऑफ़ सेल्फ डिफेंस’ नामक संस्थाएँ काम करती थीं। उन्होंने बताया कि यहीं से इप्टा का जन्म हुआ था। इनका उद्देश्य था – देश की सुरक्षा (क्योंकि तब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था) और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की रिहाई करवाने का प्रयत्न करना। साथ ही आदिवासी क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर पर समानांतर सरकारें बनाना।
हम सभी जानते हैं कि मिदनापुर में, जो बांग्ला देश में चला गया है, एक समानांतर सरकार बनी थी, जो लगभग दो साल तक चली। उस दौरान ब्रिटिश सरकार से बाक़ायदा सशस्त्र संघर्ष चला था। कुसुम त्रिपाठी ने इस पर अन्यत्र शोध करते हुए पाया कि उस समय अनेक जगहों पर इस तरह की समानांतर सरकारें बनी थीं। महाराष्ट्र के सातारा में भी बनी थी। मगर छह महीने से ज़्यादा कोई नहीं चल पाई और उन्हें सरेंडर करना पड़ा था। शांता जी ने बताया कि हमने अपने सिक्के भी बना लिए थे। उन्होंने बताया कि लाल बाग परेल मुंबई के भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालय में शायद ये सिक्के रखे हुए हों! (हालाँकि कुसुम त्रिपाठी ने कॉमरेड प्रकाश रेड्डी और तारा रेड्डी से इस बाबत चर्चा की तो उन्होंने बताया कि वे सिक्के महाराष्ट्र में तो नहीं, शायद बंगाल में सुरक्षित हों) इसके बाद शांता गांधी ज़िक्र करती हैं बंगाल के अकाल पीड़ित लोगों के बीच काम करने की बात का।
1943-44 में जापान ने बंगाल की सरहद पर जो बम-वर्षा की थी, बंगाल में स्थापित महिला आत्म रक्षा समिति ने उस दौरान भरपूर काम किया। जैसा कि हम जानते हैं कि बंगाल का अकाल मानव-निर्मित अकाल था। उस समय अन्य देशों से जहाज़ों और नावों में जो खाने-पीने का सामान आता था, उसे ब्रिटिश सरकार ने रोक दिया था। चूँकि उस समय बंगाल का विभाजन नहीं हुआ था तो लगभग चालीस लाख लोग मौत के गाल में समा गए थे। उन दिनों गाँव में चावल का एक दाना भी मिलना मुश्किल हो गया था। लोग पलायन करने लगे थे। शहर की तरफ़ जाने लगे थे। दाने-दाने के लिए तरसकर मरने वालों में बड़ी संख्या में औरतें और बच्चे थे।
शांता जी बताती हैं कि उस समय उनके साथ प्रमुख रूप से शामिल थीं कमला चटर्जी, रेनू चक्रवर्ती, मणिकुंतला सेन और इला। महिला आत्म रक्षा समिति का उद्देश्य क्या था? तो पहला, विदेशी आक्रमण से बचाव, दूसरा, आत्मरक्षा के लिए स्त्रियों और लड़कियों को लाठी चलाना सिखाना, तीसरा, राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की रिहाई के लिए आवाज़ उठाना, चौथा, विभिन्न स्थानों पर समानांतर सरकार बनाने में मदद पहुँचाना और पाँचवाँ, भूखे लोगों को मौत के मुँह से बचाना। 17 मार्च 1943 को विधानसभा तक मार्च करते हुए नारा लगाया गया था – अंधकार में मरने से अच्छा रोशनी में मरा जाए। फटे-पुराने कपड़े पहनी स्त्रियों ने गोद में नंगे-अधनंगे बच्चों के साथ विधानसभा का घेराव किया था और दूसरा नारा लगाया था – गरीब बस्तियों में राशन की दुकानें अधिक से अधिक खोली जाएँ। चावल की क़ीमतें कम की जाएँ। अनाज को वक्त पर भेजा जाए। इस घेराव का ऐसा प्रभाव हुआ कि तत्कालीन मुख्यमंत्री को तुरंत सौ बोरे चावल मँगवाना पड़ा और स्त्रियों के जर्जर वस्त्रों को देखते हुए एक-एक साड़ी भी देनी पड़ी थी। इस घेराव से प्रभावित होकर बहुत से ज़िलों में ‘हंगर मार्च’ निकाला गया क्योंकि सबने देखा कि कलकत्ते में इसके कारण मुख्यमंत्री को तुरंत चावल और साड़ी देनी पड़ी थी। व्यापारियों ने अनाज की जमाख़ोरी कर ली थी, जिसके विरोध में हरेक कचहरी पर ‘हंगर मार्च’ निकाले गए। महिला आत्म रक्षा समिति ने उस समय क्या किया? उसने जमाख़ोरों के गोदामों पर धावे बोलकर उन्हें लूटा और लाकर उसका वितरण शुरू किया। अगर वे नहीं लूटतीं, तो असहाय स्त्रियाँ और बच्चे मर जाते! सरकार पूरी तरह लापरवाह बनी हुई थी। इसके बाद आसाम और मणिपुर में भी महिला आत्मरक्षा समिति की शाखाएँ खोल दी गईं। अकाल का असर इन दोनों स्थानों पर भी अच्छा-ख़ासा पड़ा था। साथ ही ये प्रदेश सीमा-क्षेत्र थे, जहाँ बम-वर्षा हो रही थी। बाद में जब सरकार ने राशन-वितरण का काम शुरू किया तब लोग राशन लेने इस कदर टूट पड़ते थे कि उन्हें कोई नियंत्रित नहीं कर पाता था।

इसके पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तहत 1940 में कलकत्ते में यूथ कल्चरल इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई थी, उसमें भी शांता गांधी शामिल थीं। यह इंस्टीट्यूट तीन स्तरों पर काम करता था – विचार गोष्ठी, नाट्य दल और नृत्य-गायन दल। शांता गांधी नृत्य-गायन दल के साथ काम करती थीं। इसमें छात्र थे, मज़दूर और किसान भी थे। जापान द्वारा की गई बमबारी के बाद यह दल फ़ासिस्ट विरोधी सांस्कृतिक मंच में बदला। 1942 में अकाल को देखते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘पीपल्स रिलीफ़ कमिटी’ और ‘कल्चरल स्क्वाड’ बनाए। इसके द्वारा ‘भूखा है बंगाल’ नाटक अनेक शहरों में किया गया। इसकी पृष्ठभूमि बताते हुए शांता जी कहती हैं कि जब राशन दुकानें लूटी जाने लगीं, तब सरकार को दिखाई देने लगा कि वह भीड़ को नियंत्रित नहीं कर पाएगी और उसने राशन-वितरण शुरू कर दिया। मगर जब वहाँ लोगों की भीड़ टूट पड़ी और भगदड़ मचने लगी, तब महिला आत्मरक्षा समिति के लोगों ने स्वतःस्फूर्त होकर ताली बजाकर गाना शुरू किया। इसके कारण लोग थोड़े शांत हुए। तालियाँ, नृत्य और गाने के कारण लोग उनकी ओर देखने लगते थे और धीरे-धीरे अनुशासित होकर लाइन लगाने लगते थे। इसके बाद यह रोज़ का सिलसिला बन गया कि हम राशन की दुकान के सामने गा-गाकर लाइन बनवाने लगे। धीरे-धीरे इसमें अलग-अलग ट्रूप बन गए। तय होने लगा कि यह मंडली एक स्थान पर जाएगी, दूसरी मंडली दूसरे स्थान पर जाएगी। इस कल्चरल स्क्वाड में किसान-मज़दूर, छात्र, कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता सभी शामिल थे। ताली बजाकर गाना गाने, भाषण देने से लोग अनुशासित होने लगे थे और वहीं से इप्टा की शुरुआत हुई। उनका मानना था कि इप्टा का जन्म उसी समय हो गया था। यह काम अनजाने में हुआ था। जो काम पुलिस या सरकार नहीं कर पाई थी वह कल्चरल स्क्वाड के युवाओं ने कर दिखाया था। उस समय इसका उद्देश्य यह नहीं था कि आगे चलकर कोई संगठन बनाया जाएगा।

देश के कई शहरों में ‘भूखा है बंगाल’ नाटक फण्ड इकट्ठा करने के लिए खेला गया। यह वर्तमान अर्थों में सड़क नाटक नहीं था। जिस भी शहर में कलाकार जाते, वहाँ किसी भी जगह पर अस्थाई स्टेज बनाकर यह नाटक खेला जाता था। इसके लिए कोई भी लाइट या मंच-सामग्री नहीं होती थी। सिर्फ़ कलाकार होते थे। अपने अभिनय के बल पर कलाकार काफ़ी पैसे इकट्ठे कर लेते थे। इससे अनाज बाँटने का काम किया जाता था। शांता गांधी ने उस समय की एक बहुत कटु स्मृति को भी रेखांकित किया कि तब बहुत सी छोटी बच्चियाँ और लड़कियाँ बेची जाती थीं। उसे भी रोकना था। यह चलन इतनी तेज़ी से फैला कि दो-चार महीने में ही हज़ारों लड़कियाँ बिक गईं। महिला आत्मरक्षा समिति, नारी सेवा संघ और अखिल भारतीय महिला परिषद ने मिलकर इसे रोकने के लिए एक ‘विजिलेंस कमिटी’ स्थापित की, जिसने यह कोशिश की कि लड़कियाँ न बेची जाएँ। चूँकि इनकी सदस्य-संख्या बहुत ज़्यादा थी, लगभग पचास हज़ार, साथ में अन्य लोग भी थे, इसलिए सभी लोग मिलकर इस पर रोक लगाने में कामयाब हुए। आज कल्पना करना मुश्किल है कि दो किलो चावल के लिए लोग अपनी लड़कियों को देह-व्यापार के लिए दे देते थे। उस समय एक ओर व्यापारियों का नंगा नाच चल रहा था, दूसरी ओर सरकार को इससे कोई मतलब नहीं था, वह द्वितीय विश्वयुद्ध में व्यस्त थी। सड़क पर भूख से मरकर लोगों के मुर्दे पड़े रहते थे। सरकार इन मुर्दों का बंदोबस्त तक नहीं करती थी। यह काम भी इन संस्थाओं ने किया। ऐसे समय में समाज को सम्हालने में इन संस्थाओं ने बहुत योगदान दिया। जब शांता गांधी से कुसुम त्रिपाठी ने पूछा कि तब तो आप पढ़ रही थीं, कम उम्र की थीं, ये मुर्दे देखकर आपको डर नहीं लगता था? उन्होंने इनकार करते हुए कहा कि नहीं, हम भी मुर्दे उठाने में बराबरी से मदद करते थे।
इस तरह 1942 में कल्चरल स्क्वाड में महिलाओं के तीन संगठन, छात्र, मज़दूर, किसान सभी के लोग मिलकर काम कर रहे थे। इस इतिहास की तुलना की जाए तो 2021-22 में कोरोना काल में भी लोगों ने इस तरह मिलजुलकर इतने बड़े पैमाने पर काम नहीं किया है। उस समय प्रदर्शनकारी कलाओं पर जनता के बीच जाने का दबाव इस बात का था कि वे दमन, शोषण, अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाएँ। कुसुम त्रिपाठी ने शांता जी से पूछा कि प्रेक्षागृह से निकलकर उन्हें सड़कों पर आख़िर क्यों जाना पड़ा? ऐसे नाटक क्यों करने पड़े? तब उन्होंने बताया कि ‘जानकर आश्चर्य होगा कि उस भीषण काल में बंगाल के या कलकत्ते के थिएटर्स में रंगरेलियाँ चल रही थीं। इस परिप्रेक्ष्य में लोगों में जागरूकता पैदा करने, साहस पैदा करने, परिस्थितियों से लड़ने के लिए इन महिलाओं ने नेतृत्व किया था। अक्सर कहा जाता है कि महिलाएँ कुछ कर नहीं सकतीं, मगर यहाँ महिलाओं ने ही सब कुछ किया। इनमें से अधिकांश महिलाएँ पढ़ी-लिखी थीं और विषम परिस्थिति में वे लीड भी कर रही थीं।’

महिला आत्म रक्षा समिति ने निर्वासित महिलाओं को आसरा देने के लिए नारी सेवा संघ की स्थापना की थी। वहाँ इन महिलाओं को बंगाल में प्रसिद्ध जूट का समान बनाने, काग़ज़ और अन्य हस्तकलाओं से संबंधित चीज़ें बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता था ताकि वे आत्मनिर्भर होकर अपना जीवनयापन कर सकें। कल्चरल स्क्वाड में नाटक वग़ैरह के माध्यम से जो पैसा इकट्ठा होता था, उससे सामग्री ख़रीदी जाती थी। कभी-कभी कोई जूट वग़ैरह का दान भी दे देता था, जिसे वे बेचा करती थीं। इन महिला संगठनों ने सरकार पर भी दबाव डाला था कि महिलाओं का देह-व्यापार रोका जाए और वे सम्मान के साथ आत्मनिर्भर होकर जी सकें।
शांता गांधी के पिता सरकारी इंजीनियर थे, जिनके हमेशा तबादले होते रहते थे। उनका तबादला बंबई हो गया और उनका परिवार बंबई आ गया। 25 मई 1943 को बंबई में इप्टा की स्थापना हुई। बंगाल में जो पीपल्स रिलीफ़ कमिटी और कल्चरल स्क्वाड ने काम किया था, उसके कारण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इप्टा की स्थापना करने का विचार किया। इसका उद्देश्य तय किया गया – संस्कृति, साहित्य और अन्य कलाओं को जनता तक पहुँचाना। नृत्य, संगीत, नाटक के परंपरागत उपकरणों को नकारते हुए इप्टा खड़ी हुई। गीत-संगीत में तमाम वाद्य-यंत्रों के बिना गीत गाए जाने लगे। लोक-संगीत, लोक-नृत्य, लोक-संपदा के माध्यमों को चुना गया। (हमेशा से ही शास्त्रीय कला और लोककला दो प्रकार की कला रही है। लोककला चूँकि ग्रामीण अभिव्यक्ति का माध्यम थी, उसमें मंच या साज-सज्जा होती नहीं थी। इसलिए इसी कलारूप को अपनाया गया) शांता गांधी ने बताया कि ‘लोककलाओं को जानने के लिए हम पूरे देश में घूमे थे। हमने देखा कि कहाँ की कौन-सी लोक-परंपरा है! स्वतंत्रता आंदोलन तो सभी का मुख्य मुद्दा था, साथ में लोगों में जागृति लाना भी इसका उद्देश्य था। ‘एजिट-प्रॉप’ याने जन-जागरण करना इप्टा का प्रमुख उद्देश्य था। लोगों में जागृति लाने के लिए उनके बीच जाना पड़ेगा। हमारा कोई एक हीरो नहीं है, बल्कि जन-समुदाय ही हमारा हीरो है।’ शांता गांधी का कहना था कि बंगाल में त्राहि-त्राहि कर रही जनता को अनुशासित करने के लिए हमने जो सिर्फ़ ताली बजाकर, नाच-कूदकर गीत-नृत्य प्रस्तुत कर उन्हें जागृत करने का काम किया था, उसका निचोड़ यह था कि बिलकुल अनपढ़, निर्धन लोगों को भी इस माध्यम से कही गई बातें आसानी से समझ में आ जाती थीं। इनमें किसी राजनीतिक दृष्टि का उदय नहीं हुआ था, उनमें जन-जागरण लाने के लिए इन प्राकृतिक और स्वाभाविक माध्यमों का प्रभाव कामयाब रहा था। इसीलिए वे ज़ोर देकर कहती थीं कि ‘सच कहा जाए तो इप्टा का जन्म यहीं से हो चुका था।’
शांता गांधी ने इप्टा के प्रारंभिक दिनों को याद करते हुए बताया, ‘बंबई में उस समय कॉमरेड एस. ए. डांगे का प्रभाव था। मज़दूर-किसानों की बात कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा और कोई पार्टी नहीं करती थी। हम बस्तियों में जाते थे। स्टेशन पर, रिक्शावालों के बीच लोकगीतों के माध्यम से जाते थे, हमारे पास एकाध ढोलकी जैसे बजाने वाले इंस्ट्रूमेंट के अतिरिक्त कुछ नहीं होता था। हम और किसी का उपयोग भी नहीं करते थे। उसी समय नुक्कड़ नाटक की तरह के नाटक करने लगे। यह पूरी तरह नुक्कड़ नाटक के फॉर्म में तो नहीं होता था, उसमें सादा मंच बनाया जाता था। पर इसे नुक्कड़ नाटक की शुरुआत माना जा सकता है।’
कुसुम त्रिपाठी ने अपनी जिज्ञासा के तहत शांता गांधी से पूछा कि ‘तब चालीस के दशक में आप लोगों के सामने कोई ख़ास फ़ार्म्स नहीं थे, जैसे अस्सी के दशक में हम नाटक करने वालों के सामने ब्रेख़्त थे, उनके और अन्य लोगों के भी फ़ार्म्स थे; तो आप लोग किन चीज़ों का इस्तेमाल करते थे? आपके सामने क्या बातें थीं? आप लोग कैसे समझते थे कि कोई कैरेक्टर कैसा है! क्या करना है!’ इस पर शांता जी ने बताया कि, ‘पूछो मत! उस समय तो हम डंडा भी हाथ में नहीं रख सकते थे। क्योंकि अगर पुलिसवालों ने डंडे सहित पकड़ लिया तो तुरंत इल्ज़ाम लगा देते कि हथियार रखा है और धुलाई कर देते थे। उन दिनों इप्टा इतनी पॉपुलर हो गई थी, उसका प्रभाव जनता पर इतना ज़्यादा हो गया था कि सरकार को उस पर पाबंदी लगानी पड़ी। हम सब जानते हैं कि पाबंदियाँ कब लगाई जाती हैं! समूचे देश में, यहाँ तक कि पाकिस्तान के पेशावर से लेकर हरेक राज्य में इप्टा बहुत लोकप्रिय हो गई थी। हालाँकि उस समय विभाजन नहीं हुआ था। ऐसे समय में हम किसी कैरेक्टर को निभाने के लिए ज़्यादातर कपड़े का ही इस्तेमाल करते थे, जिसे अपनी जेब में या कंधे पर लटकाए गए झोले में डाल लिया जाता था। जैसे टोपी से कैरेक्टर पता चल जाता था, यूनियन जैक या अपनी पार्टी का लाल झंडा रखने से, हिटलर का प्रतीक चिह्न स्वस्तिक से पता चल जाता था। उसे एप्रन जैसा डाल लेते थे। उस समय तो प्रिंटेड चीज़ें थीं नहीं, तो हम कलर करके या पेंट करके उसे रंग लेते थे। कैंची से काटकर आकृतियाँ बना लेते थे।’ कुसुम त्रिपाठी ने बताया कि साक्षात्कार के दौरान यह सब बताते हुए वे इतनी उत्साहित और रोमांचित थीं कि उन्होंने अपनी सहायिका से एक काला काग़ज़ और कैंची मँगवाई। उनके हाथ काँप रहे थे, इसके बावजूद वे काग़ज़ काट रही थीं और उससे उन्होंने सेल्यूलर जेल की कटिंग तैयार की। वाक़ई हम जिस तरह सेल्यूलर जेल के फोटो देखते हैं, ठीक वैसा ही डिज़ाइन दिख रहा था। उन्होंने कहा कि ‘अभी मैं इसे काग़ज़ पर बना रही हूँ पर हम उस वक्त इसे कपड़े पर बनाते थे। वह कई दिन काम आता था।’ उन्होंने इस उम्र में जिस तरह की सामग्री बनाकर दिखाई, उसे देखकर मैं सोचने लगी कि उस उम्र और परिस्थितियों में इप्टा ने न जाने क्या-क्या और किस-किस तरह का काम किया होगा! ‘हम यह देखते थे कि कैसे 10-15 मिनट में नाटक खेल लें, क्योंकि पुलिस को उतनी देर में पता चल जाता था कि कहाँ नाटक हो रहा है और वे घोड़े पर सवार होकर तुरंत आ पहुँचते थे। हम सब तुरंत भीड़ में फैल जाते थे। अगर कोई स्टेशन पास हो तो हम वहाँ ऐसे जाकर खड़े हो जाते, मानों हमें भी यात्रा करनी हो। हमारे पास कोई सामान नहीं होता था, न ही कोई मेकअप होता था कि पता चले कि हम आर्टिस्ट हैं। जो जिस भेस में होता था, वैसे ही नाटक खेलता था। हम सीधे जनता से संवाद करते थे। हरेक जगह देखने के लिए 200-300 की भीड़ जमा हो जाती थी। आवाज़ तेज रखनी पड़ती थी। हम अपनी आवाज़ को बहुत महत्त्व देते थे। नियमित एक्सरसाइज़ करते थे। माहौल ऐसा था कि एक साथ अभ्यास करना तो संभव नहीं होता था तो हम अपने-अपने घरों में अभ्यास कर लेते थे। आवाज़ की एक्सरसाइज़, शरीर की अलग-अलग भंगिमाओं की एक्सरसाइज़, भाव-भंगिमा पर ही पूरा नाटक खेल जाता था इसलिए यह एक्सरसाइज़ बहुत महत्त्वपूर्ण होती थी। हमारे शरीर और छोटे-छोटे प्रतीकों के माध्यम से, हमें हाथों से ताल देते हुए ही नाटक करना होता था। हम ढोलकी भी नहीं बजा सकते थे, वरना पुलिस को जल्दी पता चल जाता। प्रायः किसी गाने से नाटक शुरू किया जाता था। गाने का कोरस ग्रुप साथ ही रहता था।’ उन्होंने बताया कि अभी जैसी काग़ज़ से सेल्यूलर जेल बनाकर आपको दिखाई थी, वैसी कपड़े से बनी जेल की आकृति को चार कलाकार लेकर और फैलाकर खड़े होते थे तो जेल का सीन बन जाता था। इसी तरह कोर्ट-कचहरी का सीन भी बनाते थे। इन्हें देखकर लोग समझ जाते थे कि हम क्या दिखाना चाहते हैं। आवाज़ महत्वपूर्ण होती थी। मुँह से ही ट्रेन की आवाज़ ‘छुक छुक छुक छुक’ निकालते थे, पुलिस घोड़े पर आती थी, तो उनकी एंट्री में घोड़े की टापों की आवाज़ मुँह से निकालते थे। बाक़ी कलाकार यह काम करते थे। इस तरह आसान नहीं था तब नाटक खेलना! उस दौरान जो आर्टिस्ट गिरफ़्तार हुए थे, वे स्वतंत्रता के बाद ही छूटे थे। चूँकि वे गांधीयन लोग नहीं थे, तो उनके साथ पिटाई भी बहुत होती थी। भगत सिंह पर 23 मार्च को लाहौर जाकर नाटक खेला गया था। उस समय भी हम ‘इंक़लाब’ का नारा लगाते थे, जो धीरे-धीरे प्रसिद्ध हुआ। कम्युनिस्ट पार्टी ने ही यह नारा जनता के बीच पहुँचाया और प्रचलित किया। हम जानते हैं कि अभी भी लाहौर पाकिस्तान में 23 मार्च को छुट्टी होती है। 26 जनवरी की तरह वहाँ परेड होती है और इस दिन को काफ़ी अच्छी तरह मनाया जाता है।’ (जैसा 1988 में शांता गांधी ने कुसुम त्रिपाठी को बताया।)

शांता गांधी ने स्वयं के बारे में बताते हुए कहा कि चूँकि वे शुरू से छात्र संगठन आदि में किसी न किसी पद पर रहीं तो पुलिस की उन पर धर-पकड़ के लिए पैनी नज़र होती थी। इसलिए बाद में तो 1947 में उन्हें भी अंडरग्राउंड होना पड़ा था। तब वे गुजरात के गाँव में रहीं, जहाँ उन्हें कोई पहचानता नहीं था। जब वे गुजरात के गाँव में रहीं, तब वहाँ के प्रसिद्ध लोक-रूप ‘भवई’ की ओर उनका ध्यान गया। उन्होंने उसका गहरा अध्ययन कर उस कला-रूप को बारीकी से समझा।
कुसुम त्रिपाठी ने उनसे जानना चाहा कि एक अजनबी गाँव में जब वे इस तरह रहीं, तो वे दिन भर क्या करती थीं? उनका रूप-रंग-आदतें तो शहरी रही होंगी? वे अलग से दिखाई देती होंगी। इस पर उन्होंने बताया कि वहाँ पार्टी के कुछ लोग थे, जिनकी मदद से वे रहती थीं। साथ ही उन दिनों गांधी का बहुत प्रभाव था और वे लोग भी गांधी की रिहाई की माँग करते थे, कॉंग्रेस के साथ मिलजुलकर भी काम किया करते थे, इसलिए कॉंग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच छिपकर रहने में उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं हुई। अब इसे टाइमपास कहें या और कुछ, वे वहाँ गाँव के बच्चों को पढ़ाने लगीं। उस समय पढ़ाने के लिए ब्लैक बोर्ड या चॉक होने का तो सवाल ही नहीं था, इसलिए ज़मीन पर धूल-मिट्टी में ही अक्षर-ज्ञान और गणित भी वे पढ़ाती थीं। उस समय उन्होंने आसपास के कई बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखा दिया था।

शांता गांधी के राजनैतिक और सांस्कृतिक कार्य के अतिरिक्त उनका एक अन्य परिचय भी उल्लेखनीय है। 1932 में इंदिरा गांधी के साथ पुणे की एक स्कूल ‘प्यूपिल’स ओन स्कूल में वे पढ़ी थीं। वहीं उनसे उनका परिचय हुआ था। वे उनके इतने क़रीब हो गई थीं कि इंदिरा गांधी की माँ को जब अल्सर हुआ और वे इंग्लैंड में थीं, उस समय इंदिरा और फ़िरोज़ गांधी की सगाई के बारे में उनके अलावा और कोई नहीं जानता था। उन्होंने भी कभी इस बात को उजागर नहीं किया। इंदिरा गांधी शांता जी के बच्चों के बीच किए गए काम को जानती थीं, इसलिए बाद में उन्होंने 1970 में दिल्ली में ‘बाल-भवन’ की स्थापना के लिए उन्हें बुलाया। आगे चलकर ‘आवेही’ और फिर ‘एबेकस’ संस्था के निर्माण की नींव वहीं पड़ी थी। बच्चों को पढ़ाने का कंसेप्ट जो हमारे देश में कभी था ही नहीं कि इस तरह भी बच्चों को पढ़ाया जा सकता है! तो ‘आवेही’ हो, ‘एबेकस’ हो, ‘बालभवन’, ‘बालवाड़ी’ हो या ‘आंगनबाड़ी’, उसके बेस में वही चीज़ें हैं। कुसुम त्रिपाठी का मत है कि ‘मुझे लगता है कि व्यक्ति के रूप में इस प्रकार की शिक्षा का क्रेडिट शांता गांधी को जाना चाहिए।’ जहाँ गिनती के लिए पत्थर नहीं थे, वहाँ खपरैल के टुकड़ों को लेकर उन्हें तोड़-तोड़कर वे गिनती सिखाती थीं। चूँकि गुजरात में उन्हें जगह बदल-बदलकर रहना पड़ा था, कठियावाड़ जैसे इलाक़ों में कंकड़-पत्थर भी नहीं होते थे, पूरा गाँव, वहाँ की सड़कें सपाट थीं, वहाँ सिर्फ़ खपरैल उपलब्ध थे। बाद में उन्होंने थापकर सुखाए गए गोबर के उपलों से गिनती सिखाना शुरू किया। वहाँ वे लगातार सोचती रहती थीं कि बच्चों को पढ़ाने के क्या तरीक़े अपनाए जाएँ। उन्होंने वहाँ बड़ी संख्या में लड़कियों को इसी तरह पढ़ाया। उन दिनों लड़कियों को पढ़ाने की ज़रूरत ही नहीं समझी जाती थी। शांता गांधी ने बताया कि जब वे लड़कियों को पढ़ाती थीं तो लोग हँसते थे। उन्हें लगता था कि ये कोई बच्चों के साथ खेल चल रहा है! गाँव के लोग ख़ुद पढ़े-लिखे नहीं थे तो उन्हें यह कभी नहीं समझ आया कि वे वास्तव में पढ़ा रही थीं। चूँकि शांता जी ख़ुद गुजराती थीं, तो वे बच्चों को गुजराती में ही पढ़ाया करती थीं। यह बात काफ़ी महत्त्व रखती है कि उन्होंने अपना दिमाग़ लगाया कि अंडरग्राउंड रहते हुए बच्चों को कैसे पढ़ाया जाए!
यहाँ यह जानना ज़रूरी है कि 1938 में बर्मा-यात्रा के दौरान उनकी मुलाक़ात विक्टर किरनन (Victor Kiernan) से हुई और उनकी शादी हो गई। वे मार्क्सवादी इतिहासकार थे। कुसुम त्रिपाठी से साक्षात्कार के दौरान वे बार-बार उनकी पर्सनालिटी को याद करती रहीं। वे ऑस्ट्रेलिया मूल के थे और 1946 में तलाक़ के बाद वे भारत छोड़कर चले गए। बाद में भी उनकी मुलाक़ातें होती रहीं और वे अच्छे दोस्त बने रहे।
शांता गांधी इप्टा के सेंट्रल कल्चरल स्क्वाड का सक्रिय हिस्सा थीं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी तथा इप्टा की पहल पर प्रसिद्ध नृत्य निर्देशक शांतिवर्धन के नेतृत्व में ‘सेंट्रल कल्चरल स्क्वाड (द सेंट्रल बैले ट्रूप)’ का गठन किया गया। देश भर के अनेक कलाकारों को इसमें दीर्घ प्रशिक्षण दिया गया था। 1945-46 में इस स्क्वाड ने ‘स्पिरिट ऑफ़ इंडिया’, ‘इंडिया इममॉर्टल’, ‘बॉम्बे नेवल म्यूटिनी’, ‘आज़ाद कश्मीर’ जैसे अनूठे बैले तैयार कर देश भर में शृंखलाबद्ध प्रदर्शन किए थे। (इस स्क्वाड के बारे में इस लिंक पर विस्तृत जानकारी उपलब्ध है – https://sahayatri.in/2025/06/central-cultural-squad-vistrit-vivran/)
जब 1950-51 में सेंसरशिप हुई तो इप्टा के कई लोगों को अंडरग्राउंड होना पड़ा था। शायद कैफ़ी आज़मी भी उस समय अंडरग्राउंड हो गए थे। (संभवतः शबाना आज़मी का जन्म उनके अंडरग्राउंड होते हुए ही हुआ था) उस समय सरकार उन्हें न तो नाटक करने देती थी, न गाना गाने देती थी। 1952 के आसपास शांता गांधी का इप्टा से सीधा संपर्क कट गया।
कुसुम त्रिपाठी का कथन है, ‘इस तरह मुझे शांता गांधी की पूरी यात्रा दिखाई देती है कि उन्होंने बहुत नई-नई चीज़ें कीं। एक महिला की युवावस्था से लेकर आगामी जीवन की कितनी ही अवस्थाएँ उनमें देखीं जा सकती हैं! वे कभी निराश नहीं हुईं कि वे नाटक नहीं कर पा रहीं, क्रांति नहीं कर पा रहीं, बल्कि वे दूसरे प्रकार की क्रांति करने में जुट जाती थीं। उनका व्यक्तित्त्व और कार्यक्षेत्र बहुआयामी और नवोन्मेषी रहा।
क्रांतिकारी और निरंतर सृजनरत रहने वाली शांता गांधी को सलाम!!
(यह लेख कुसुम त्रिपाठी के ऑनलाइन साक्षात्कार का संपादित लिप्यन्तरण है। फोटो रेखा जैन की किताब ‘यादघर : एक संस्मरण-वृत्त’ तथा गूगल से साभार लिए गए हैं ।)
