(कुणाल कामरा और सुधा भारद्वाज, दोनों से देश के सजग नागरिक अपरिचित नहीं हैं। सुधा जी ने छत्तीसगढ़ के मज़दूरों के लिए, उनके साथ जो संघर्ष किया है, वह छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए प्रशंसा और उत्सुकता का विषय भी रहा है। वे उन सोलह विचारकों, विद्वानों, कार्यकर्ताओं में थीं, जिन्हें यूएपीए के तहत जेल में डाला गया था। कुणाल कामरा के स्टैंडअप कॉमेडी शो के साथ क्या हुआ, यह भी सबने देखा। कुणाल ने अपने यूट्यूब चैनल के शो ‘शट अप या कुणाल’ पर सुधा भारद्वाज के विस्तृत जीवन-अनुभवों पर उनसे जो बातचीत की, वह 5 अगस्त 2026 को प्रसारित हुई है। इस साक्षात्कार का लिप्यन्तरण यहाँ साझा किया जा रहा है। बातचीत के मूल प्रवाह को बनाए रखने के लिए भाषिक स्तर पर अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करने की पूरी कोशिश की गई है। हरेक व्यक्ति की अभिव्यक्ति-शैली का अपना रस होता है। बातचीत की बारीकियों को समझने के लिए इसे मूल रूप में https://www.youtube.com/watch?v=LVecH-VoqJo पर अवश्य सुना एवं देखा जाना चाहिए। सुधा जी और कुणाल जी का शुक्रिया कि उन्होंने इस शानदार बातचीत का लिप्यन्तरण कर ‘सहयात्री’ में प्रकाशित करने की अनुमति प्रदान की।)

कुणाल कामरा : आज हम बात करेंगे सुधा भारद्वाज से, जो सुपरिचित वकील और कार्यकर्ता हैं। उनसे हम संविधान और उससे प्राप्त गारंटियों के बारे में जानेंगे। आपका स्वागत है मैं’म! आपके साथ यह आयरनी रही कि आप पहले आईआईटी गईं, फिर आपने लॉ चुना। उसके बाद मेरी जानकारी के अनुसार 2000 से आपने ‘पीपल्स लॉयर’ के रूप में काम करना शुरू किया। तो सबसे पहले यह ‘पीपल्स लॉयर’ वाला कंसेप्ट हमें समझना होगा और उसके बाद इस दिशा में आपकी यात्रा कैसे तय हुई, इसे बताइए।
सुधा भारद्वाज : आईआईटी तक तो ठीक है मगर लॉयर मैं बाद में बनी। मैं पहले ट्रेड यूनियनिस्ट बनी। मतलब मैं छत्तीसगढ़ गई, वहाँ शंकर गुहा नियोगी की ट्रेड यूनियन से जुड़ी। वे एक ‘लीजेंडरी’ ट्रेड यूनियनिस्ट रहे हैं। उनके साथ काम करना शुरू किया। उनकी यूनियन एक बहुत अलग तरह की ट्रेड यूनियन थी, जो सिर्फ़ वेतन और बोनस की लड़ाई लड़ने वाली यूनियन नहीं थी बल्कि वह यह सोचती थी कि हमारा अस्पताल कैसा होना चाहिए, स्कूल कैसा होना चाहिए, कल्चर कैसा होना चाहिए, शराबबंदी होनी चाहिए। उन्होंने महिलाओं को संगठित किया शराबबंदी के लिए। मतलब, इस तरह के बहुत दिलचस्प प्रयोग किए उन्होंने! उनका यह कहना था कि अगर मज़दूर सारी चीज़ें बना सकता है तो वह एक बेहतर दुनिया भी बना सकता है। तो एक तरह से एक ऐसा मॉडल कि, मज़दूर अगर दुनिया बनाए तो वह कैसी होगी? मैं इसी प्रोसेस में वहाँ गई थी। मैंने पहले उनके स्कूलों में पढ़ाया और अन्य बहुत सारे काम किए। यूनियन का काम किया। लॉयर तो मुझे मजबूरी में बनना पड़ा। मतलब यह ऐसा गले पड़ा ढोल है, जो बजाती रहती हूँ। (हँसी) वर्कर्स के पास तो बड़ी-बड़ी कंपनियों का सामना करने के लिए वकील नहीं होता। वे ऐसे वकीलों को अफ़ोर्ड भी नहीं कर सकते। तो उन्होंने कहा कि दीदी, वैसे भी आप वकील को ब्रीफ़ करती हैं, फिर उन्हें फ़ीस भी देनी पड़ती है। कभी-कभी वे लोग पटक भी देते हैं फ़ीस, कि इतने से नहीं चलेगा! इससे तो अच्छा होगा कि आप ही कर लें! तो इस तरह मैं अपनी 40 की उम्र में लॉयर बनी। जल्दी नहीं बनी।
कुणाल कामरा : मगर आईआईटी कानपुर से कैसे आपका ट्रेड यूनियन में आना हुआ?
सुधा भारद्वाज : इसकी पृष्ठभूमि कुछ यूँ है कि मेरा माँ का … माँ और बेटी का ही परिवार था, आज मेरा भी माँ और बेटी का ही परिवार है। तो मेरी माँ कारवार से थीं, आपको ख़्याल होगा कि यह वह बॉर्डर एरिया है, जहाँ पोर्तुगीज़ लिबरेशन मूवमेंट चल रहा था। उस समय वहाँ पर सोशलिस्ट वग़ैरह बहुत काम करते थे। तो एक तरह से उनका बहुत ही ‘सोशलिस्ट बेंट ऑफ़ माइंड’ था। फिर जेएनयू में थे तो बचपन से एक अवेयरनेस थी कि ग़रीबी और ग़ैर-बराबरी क्या होती है! ये सारी बातें दिमाग़ में थीं। मैंने आईआईटी में कोई इंजीनियरिंग वग़ैरह नहीं किया, मुझे मैथेमैटिक्स चाहिए था और वैसे भी मेरा रैंक इतना ख़राब था कि मुझे मैथेमैटिक्स ही मिल सकती थी। उस पर हमारा जो जनरेशन है न, उसने कई ऐसी चीज़ें देखी हैं … 1984 … मतलब 79 टू 84, हालाँकि इसे सिख रॉइट्स नहीं कह सकते, उसे जेनोसाइड कहना चाहिए, तो हमने सिख जेनोसाइड देखा। दूसरा, हमने भोपाल गैस ट्रेजेडी देखी …, तो जब मैं पढ़ाई पूरी कर दिल्ली आई, उस समय 1982 में एशियाड के लिए प्रोसेस शुरू हुआ था। माइग्रेंट वर्कर्स बाहर से आए थे। स्टेडियम बन रहे थे, फ्लाईओवर्स बन रहे थे, दिल्ली की शक्ल ही बदल रही थी। उस समय मैं एक स्टूडेंट्स ग्रुप में थी। स्टूडेंट पॉलिटिक्स का एक अर्थ होता है कैंपस पॉलिटिक्स करना, मगर हमें लगता था कि हमको कैंपस के बाहर के लोगों से जुड़ना चाहिए। तो हम माइग्रेंट वर्कर्स के साथ काम करने लगे। मुझे याद है, उस समय छत्तीसगढ़ से वर्कर्स आए थे, ओड़िसा से आए थे, उनका एक कैम्प यूनिवर्सिटी के पास ही था। हम वहाँ जाते थे। कुछ डॉक्टर्स थे, जो वहाँ मेडिकल कैम्प लगाते थे। हम जैसे यूज़लेस लोग, जो बच्चों में थोड़ा पढ़ने-पढ़ाने का काम करते थे। तो उस समय मुझे अच्छी तरह याद है कि एक ओडिया लड़का था, वह ओडिया में बात करता था। उसका बहुत ही डिस्ट्रेस्ड परिवार था, उसने बताया था कि हम लोग वापस जाना चाहते हैं, मगर हमें वापस भी जाने नहीं दे रहे हैं। मेरी पत्नी बीमार है। हमें जो पैसा देना होता है, वह भी काट लेते हैं कि इसी से तुम्हारा ख़ाना और दाल-चावल आ रहा है। अगली बार जब हम वहाँ गए तो वह व्यक्ति नहीं मिला, उसका परिवार भी नहीं मिला। तब हमें महसूस हुआ कि यहाँ कोई चैरिटी नहीं है, कोई हार्मलेस चीज़ें नहीं हैं। मतलब, अगर आपको कुछ करना है तो ये बहुत कठोर रियलिटी है। उसको बदलना इतना सरल काम नहीं है। अगर आपको कुछ करना है तो सिर्फ़ ‘ब्लीडिंग हार्ट’ होने से कोई फ़ायदा नहीं है। आपको जाकर मेहनत करनी पड़ेगी। तब दिमाग़ में यह था कि वर्कर्स के साथ काम करना है। 1983 की बात है। उस समय शंकर गुहा नियोगी जी जेल में थे। उनको रिहा करवाने के लिए हमने कैम्पेन किया। तब मैं पहली बार दल्ली राजहरा (छत्तीसगढ़) नियोगी जी के यहाँ गई। बाद में 1986 तक मैंने तय कर लिया था कि मुझे ट्रेड यूनियन में फुल टाइम काम करना है।
कुणाल कामरा : तब ट्रेड यूनियन के साथ लेफ्ट के अलावा और कौन सी पॉलीटिकल पार्टीज़ थीं मेन स्ट्रीम में?
सुधा भारद्वाज : दरअसल, काफ़ी दिलचस्प दौर से निकली हैं ये चीज़ें! 1970 में जब पहली बार कॉंट्रैक्ट लेबर एक्ट आया था, उसकी मैंने एक स्टडी की। उस समय की लोकसभा की बहसों को मैंने सुना। कोई पोलिटिकल पार्टी नहीं बची थी जिसने कॉंट्रैक्ट लेबर की कंडीशन पर बात न की हो। कुणाल, आप विश्वास नहीं करेंगे, कांग्रेस के लोग तो विरोध कर ही रहे थे क्योंकि उस समय कांग्रेस की ही बड़ी-बड़ी यूनियन्स थीं; मगर दूसरी पार्टीज़ भी, यहाँ तक कि जनसंघ की भी यूनियन भी थी, जो ज़रूर थोड़ा लिमिट में बोलती थी, मगर वह भी कहती थी कि कॉंट्रैक्ट लेबर शोषण है। कॉंट्रैक्ट लेबर समाप्त होना चाहिए। आजकल इस तरह की बहसें नहीं होतीं। अब तो पार्लियामेंट में ऐसी कोई बात ही नहीं करता। हालाँकि उस समय 1980 तक आते-आते चीज़ें काफ़ी ख़राब हो चुकी थीं। मैं छत्तीसगढ़ के जिस हिस्से में गई, वह तो इंडिपेंडेंट ही था। यूनियन इंडिपेंडेंट थी। उस समय तक लेफ्ट यूनियंस भी श्रिंक होने लगी थीं। कॉंट्रैक्ट लेबर बहुत ज़्यादा होने लगा था। असंगठित क्षेत्र का लेबर बहुत ज़्यादा बढ़ गया था। तब तक कांग्रेस वग़ैरह के यूनियन्स सिर्फ़ परमानेंट वर्कर्स के और ज़्यादातर मैनेजमेंट के साथ कोलाबोरेट करने वाली यूनियन में बदल चुके थे। तो ये स्थिति वैसे भी पोलिटिकली मज़दूरों से दूर हट चुकी थी। मज़दूर कहीं उनके केंद्र में नहीं था। तब तक यह बदलाव आ चुका था।
कुणाल कामरा : सत्तर के दशक में पोलिटिशियंस फिर भी ग़रीबों की राजनीति करने में दिलचस्पी रखते थे। यह डिस्कोर्स शिफ्ट कैसे हुआ?
सुधा भारद्वाज : मेरे ख़्याल से वह शिफ्ट कई चीज़ों से हुआ। एक तो ग्लोबली जो चीज़ें हो रही थीं, उनको फाइनली 1990 के आसपास आकर डायरेक्टली बोला गया कि हम नियो-लिबरल एज में जा रहे हैं। मगर मुझे लगता है कि हमारे इतिहास में, जब हम आज़ाद हुए, उस समय तो हमें ज़रूरत थी पब्लिक सेक्टर की। उस समय बिना पब्लिक सेक्टर के कैसे काम चलता? और अगर आप ध्यान दें तो उस समय के उद्योगपतियों ने ‘बॉम्बे प्लान’ बनाया था, जिसमें निजी उद्योगपतियों ने गवर्नमेंट से रिक्वेस्ट की कि हमारे लिए कृपया एक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाइए, उसके बिना हम काम नहीं कर पाएँगे। उस समय वे वर्कर्स से एक तरह की अपील करते थे कि देश को आगे बढ़ाने के लिए, देश-हित में आप लोग उत्पादन करें। हड़ताल वग़ैरह न करें। उस समय ‘बारगेनिंग पॉवर’ लेबर के पास थी, मगर धीरे-धीरे करके निजीकरण होने लगा, पब्लिक सेक्टर को बेचना, पब्लिक सेक्टर के अंदर कॉट्रेक्चुअलाइज़ेशन भारी पैमाने पर आना होने लगा। अभी जो पब्लिक सेक्टर है, उसके अंदर आप देखिए, भिलाई स्टील प्लांट के अंदर आप देखिए, हार्डली 10 से 15 प्रतिशत परमनेंट वर्कर्स हैं। बाक़ी सारे कॉट्रेक्चुअल वर्कर्स हैं। यहाँ लोगों का स्टैण्डर्ड ऑफ़ लिविंग बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रॉफिट कमाना ही उनका लक्ष्य हो गया है।
कुणाल कामरा : पीएसयू का प्रॉफिट कमाने का क्या मतलब है?
सुधा भारद्वाज : क्या मतलब है! मगर वे कहते हैं बाक़ी सब बेकार है। मगर उदाहरण के लिए देखिए, कि गाँव-गाँव में पोस्ट ऑफिस कौन सी प्राइवेट कंपनी खोलेगी? उसे क्या फ़ायदा है? ट्रांसपोर्ट को गाँव-गाँव में कौन ले कर जाएगा? वहाँ के लोगों के लिए कौन स्कूल खोलेगा – किसी पहाड़ी के ऊपर, बस्तर के किसी जंगल में एक छोटा सा स्कूल – 15 बच्चों के लिए कौन लगाएगा? कौनसा प्राइवेट स्कूल करेगा यह? यह चेंज तो आ चुका था।
कुणाल कामरा : दिस इज़ प्री-लिबरलाइज़ेशन …
सुधा भारद्वाज : एक्ज़ेक्टली! लिबरलाइज़ेशन जब आया, उसी समय हमारा भिलाई आंदोलन शुरू हुआ। तो एक तरह से … इट वॉज़ रियली अगेंस्ट द टाइड … इसी दौरान नियोगी जी की हत्या हुई। सिर्फ़ नियोगी जी की हत्या ही नहीं, बल्कि उस दौरान आप पूरा वह फ़ेज़ देखिए 91 का, सफ़दर हाशमी, दत्ता सामंत, शंकर गुहा नियोगी – मेजर लेबर लीडर्स को उस वक्त ख़त्म किया गया। वह मिलिटेंट इकोनोमिज़्म था, जिसमें लेफ्ट पार्टी या अन्य को भी ख़त्म किया गया।
कुणाल कामरा : तब जो कांस्टीट्यूशनल गारंटीज़ आप लागू करना चाहते थे, वो आज की रियलिटी से कितनी दूर है?
सुधा भारद्वाज : आज की रियलिटी से तो बहुत दूर हैं। अभी तो जिस तरह की बातें बार-बार कही जाती हैं कि ‘बेल इज़ द रूल, जेल इज़ द एक्सेप्शन’, व्हॉट इज़ एक्चुअली हैपनिंग इज़ द अदर वे अराउंड? अभी ये आप हर फील्ड में देख सकते हैं। ख़ास तौर पर आपका जो हरेक फंडामेंटल राइट है, राइट टू स्पीच है, राइट टू एक्सप्रेशन है, राइट टू एसेंबल है, पीसफुली डिसेंट है … मेरे ख़्याल से इस पैमाने का पीसफुल प्रोटेस्ट जैसे लद्दाख में हुआ, वैसा देखना मुश्किल है! लद्दाख, जो एक छोटे से यूरोपियन देश के बराबर है। मतलब आप समझिए कि पूरा देश ही आंदोलन कर रहा था। ठीक है? पर उसको भी आप एक ग़लत नज़रिए से देख रहे हैं, जैसे कोई देश का विरोध हो रहा है! यहाँ फंडामेंटल राइट्स को नज़रअन्दाज़ किया गया। मगर डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स क्या हैं? आपका राज कैसे चलना चाहिए? उसमें कॉन्सेंट्रेशन ऑफ़ वेल्थ नहीं होनी चाहिए। उसमें लोगों की भलाई के लिए रिसोर्सेज़ का उपयोग होना चाहिए। ये सब बातें हैं … या केवल कोई गरीब है इसलिए आप उसका शोषण करते जा रहे हैं! उसके हेल्थ का, उसके श्रम का दुरुपयोग कर रहे हैं! ये सब अलाउड नहीं था डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स के अनुसार! साइंटिफिक टेम्पर …! आई मीन दीज़ आर ऑल पार्ट्स ऑफ़ योर डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स। यह एक अलग बात है कि एक लीगल व्यू लिया जाता है कि इन्हें कोई कोर्ट एनफोर्स नहीं कर सकता। लेकिन ये सारी बातें बहुत बहसों के दौरान हमारे फ्रीडम स्ट्रगल से आई हुई हैं। साथ ही, अलग-अलग हिस्सों ने, अलग-अलग आंदोलनों ने जो कॉण्ट्रीब्यूट किया था, उसी का पूरा रिफ्लेक्शन था यह! हालाँकि उससे ऑलरेडी बहुत दूरी बन चुकी थी। 90 के दशक में यह चीज़ और बढ़ती गई, अभी तो उसका काफ़ी कठोर रूप देखने को मिल रहा है। यहाँ तक कि अब इलेक्शन से तक लोगों का धीरे-धीरे भरोसा उठ रहा है। तो डेमोक्रेटिक पार्टिसिपेशन का जो इश्यू है, उस पर भी कुठाराघात हो रहा है। या इवन फ़ेडरलिज़्म का जो इश्यू है … हरेक पर कुठाराघात हो रहा है न!
कुणाल कामरा : फ़ेडरलिज़्म इंडिया के लिए क्यों इम्पॉर्टंट है? अगर आप हमें बता पाएँ कि फ़ेडरल स्ट्रक्चर क्यों इम्पॉर्टंट है?
सुधा भारद्वाज : मेरे हिसाब से इस देश को, एक देश कहना मुश्किल है क्योंकि यह एक उपमहाद्वीप है। आप हरेक की सिचुएशन देखिए। आप लद्दाख की सिचुएशन देखिए, केरल की देखिए, नार्थ ईस्ट की देखिए, बिहार की देख लीजिए, बस्तर की देखिए … माने ये ऐसा लगता है कि लिटरली वे अलग-अलग देश जैसे हैं। वहाँ की सारी चीज़ें अलग-अलग हैं। वहाँ के मुद्दे अलग-अलग हैं। लोगों का इतिहास अलग-अलग है। लोगों की माँगें अलग-अलग हैं। लोगों के एस्पिरेशंस अलग-अलग हैं। तो अगर आप फ़ेडरलिज़्म को जगह नहीं देते तो एक तरह से उनके लिए डेमोक्रेसी का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। अगर आप ऊपर से थोपेंगे … सब जगह एक ही चीज़ होनी चाहिए, एक ही भाषा होनी चाहिए, एक ही ड्रेस होनी चाहिए, एक ही खान-पान होना चाहिए, एक ही धर्म होना चाहिए – तो ऐसा चलेगा नहीं क्योंकि वे सब अलग-अलग ढंग से विकसित हुए हैं और यही सुंदरता भी है इस देश के अंदर। तो इस तरह आपको हरेक स्टेट को ज़्यादा मौक़े देने चाहिए कि वह अपनी वास्तविक समस्याओं को डील करें और लोगों के एस्पिरेशंस को पूरा करने की कोशिश करें। मतलब … छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड, झारखंड इसी माँग से तो पैदा हुए थे। मगर हुआ इसके बिल्कुल उल्टा।
कुणाल कामरा : इन राज्यों का बेसिकली कहना था कि चलो ब्रिटिशर्स ने हमको जैसा भी देखा था, मगर अब ‘अपने लोग’ हमें कैसे देखते हैं? क्या आपको नहीं लगता कि हमारे पास अपनी एक डेमोक्रेसी है, अपनी एक असेम्बली है, वैसा ही अपना एक स्ट्रक्चर होना चाहिए, जैसा आपके पास है! हाँ, ठीक है कि हम थोड़े अलग हैं, मगर …
सुधा भारद्वाज : हाँ, मगर ऐसा नहीं है कि अलग होने की वजह से हम एक साथ को-एक्ज़िस्ट नहीं कर सकते! इसके बावजूद हरेक की डेमोक्रेटिक एस्पिरेशंस ऐसी हों कि एक रिस्पेक्ट के साथ हम एक-दूसरे के साथ डील कर सकते हैं! पर ऐसा नहीं होना चाहिए कि कोई एक एरिया रिसोर्स रिच है तो बस वहाँ से लूटो … लूटो! छत्तीसगढ़ के पहले चीफ़ मिनिस्टर थे अजीत जोगी, वो एक जुमला यूज़ करते थे – ‘अमीर धरती के गरीब लोग’! जो अमीर हैं वो तो और अमीर होते जा रहे हैं, पर जो गरीब लोग हैं, वो और गरीब होते जा रहे हैं। यह तो बहुत बड़ी विडंबना है न! आप हरेक रिसोर्स-रिच एरिया को देखिए! यही तो कॉलोनाइज़ेशन था। इसके बारे में अगर आप थ्योरिटिकली उत्सव (उत्सा) पटनायक या प्रभात पटनायक को पढ़ें तो उनका यह कहना है कि अगर हम सोचते हैं कि ‘वैसा’ वाला पूंजीवाद बना लेंगे तो वह हो नहीं सकता। ‘वैसावाला’ पूंजीवाद ऐसी ही कालोनीज़ के शोषण से बनाया गया था। तो क्या हम अपने ही लोगों का शोषण करेंगे? मतलब, एक सोचने वाली बात है! वो लोग तो ऐसा एक्ट करते हैं कि जैसे ब्रिटेन अपने-आप ही बन गया! वह अपने-आप नहीं बना, चारों ओर से लूटकर बना। अगर हम सोच रहे हैं कि हम एक ऐसा ही कैपिटलिज़्म बनाएँगे, तो क्या हम सोचते हैं कि हमारे कुछ लोग ऐसे हैं, जिनको लूटा जा सकता है, या उनका श्रम लूटा जा सकता है या उनके रिसोर्सेज़ लूटे जा सकते हैं?
कुणाल कामरा : पर बेसिकली, जैसे सोसाइटी आपका काम देखती है, एज़ अ पीपल्स लॉयर, वह ऐसे देखती है कि आप देश के डेवलपमेंट के बीच आ रहे हैं! मुझे भी यह समझने के लिए सालों लग गए कि आप अपनी सोसाइटी के बाहर गार्ड लगाकर, डबल डोर रख, दो-दो ताले लगा के सो रहे हो और वहाँ पर उनके पूरे रिसोर्स छीन कर बोल रहे हो कि क्या हो गया!! तो इस हिप्पोक्रेसी को समझने में मुझे भी बहुत समय लगा। अब बाक़ी लोगों को हम कैसे समझा पाएँगे कि भाई! कोई आज़ाद देश अपने लोगों के साथ ऐसा नहीं करता।
सुधा भारद्वाज : एक्चुअली! आपने सही कहा। एक्चुअली, हम विकास किसे कहते हैं? ये पहले समझने की ज़रूरत है। विकास को हम ये समझ सकते हैं कि एक तो, बंबई को देखिए, सब जगह हाई राइज़ेस हो रहे हैं! बुलेट ट्रेन भी आ रही है, कोस्टल रोड भी हो रहा है! मेट्रोज़ आ रही हैं वग़ैरह वग़ैरह … और दूसरा हम ये देखें कि हमने एक ऐसा विचित्र स्ट्रक्चर बना लिया है, जिसमें कई जगहों से गरीब लोग रोज़ मुंबई में आएँ! दे पोर इन मुंबई! और उसके बाद आप कहें कि नहीं, नहीं, हमें ये झोपड़पट्टी नहीं चाहिए, ये नहीं चाहिए, वो नहीं चाहिए … ये सब कहने की बातें हैं। आप याद करो, जब कोविड में लोग पैदल-पैदल गए वापस, तो ज़्यादातर बिल्डर थे मुंबई में, उनका काम बंद हो गया। उनका कहना था कि जब तक वे लौटकर नहीं आएँगे, हमारा काम शुरू नहीं हो पाएगा। आख़िर क्यों? क्योंकि उस रेट पर, उन मुश्किल कंडीशंस में, मेट्रो की खुदाई करने वाले और कंस्ट्रक्शन करने वाले, साइट पर ही रहकर सारा काम करने वाले, ये माइग्रेंट वर्कर्स उन्हें कहाँ मिलेंगे? एक्चुअली, आप उनके ही श्रम से इन चीज़ों को बना रहे हैं। और फिर उन्हीं को आप कह रहे हैं कि बहुत भद्दी हैं झोपड़पट्टियाँ, इनको निकालो, बदनुमा दाग़ हैं! फिर उनको हटाने के लिए आप उन्हें कहीं दूर फेंक देंगे, जहाँ से उनका आना-जाना भी मुश्किल हो! इसके विपरीत, विकास को देखने का दूसरा एक तरीक़ा यह भी है कि जैसे नियोगी जी ये कहते थे कि हमें लोगों में इतनी क्रय-क्षमता पैदा करनी चाहिए कि … अभी एक उदाहरण देखिए, साइकिल की फ़ैक्टरियाँ लगभग आज ख़त्म हो गई हैं। क्या ये इसलिए है कि लोगों को साइकिलें नहीं चाहिए? नहीं, इसलिए है क्योंकि जिसको साइकिल चाहिए, वो साइकिल ख़रीदने के लिए पैसे नहीं दे सकता। ठीक है? तो आप प्रीफ़र कर रहे हैं कि आप लक्ज़री एसयूवीज़ बनाएँगे, साइकिलें नहीं बनायेंगे। तो आपका विकास उसी हिसाब से होगा न? लेकिन अगर आप परचेज़िंग पॉवर दें लोगों के हाथ में, तब वे बताएँगे कि उन्हें क्या चाहिए! और फिर तब इस तरह की एक्सपोर्ट लेड ग्रोथ मात्र ही नहीं होगी, तब आप लोगों के डिमांड के हिसाब से चीज़ें बनाएँगे! जो आप अपने देश में बना सकते हैं! आपको इम्पोर्ट करने की ज़रूरत नहीं है। असल में ये सारी चीज़ें एकदूसरे से जुड़ी हुई हैं – सेल्फ रिलायंस, डेमोक्रेसी, बेटर लिविंग स्टेण्डर्ड्स फॉर एवरीबडी, रिस्पेक्ट फॉर एवरीबडी … तो ये एक अलग ही मॉडल होगा, जिसमें सबको ज़रूरत की चीज़ें मिलें! अब जैसे शुरू-शुरू में जो सोशलिस्ट कंट्रीज़ थे, उनके बारे में कहा जाता था कि वहाँ तो सिर्फ़ दो या तीन क़िस्म के ही कपड़े मिलते हैं। फ्रीडम नहीं है कंज़्यूमरिज़्म का। लेकिन सबको खाने को तो मिल रहा था न! सब स्कूल तो जा रहे थे न! सबके पास घर तो होता था न! व्हॉट इज़ मोर इम्पोर्टेंट? मतलब … दोनों में फ़्लक्चुएट होता है। शुरू में इंडिया वॉज़ अ मिक्स्ड इकॉनोमी। उसमें सोशलिस्ट फ़ीचर्स भी थे। बहुत बड़ी ग़रीबी को पार करने की बात थी। फ़ूड सेल्फ सफ़िशिएंसी की बात थी। पर अभी ये सब दिखाई नहीं देता। अब तो हमने दरवाज़े खोल दिए हैं। हम कह रहे हैं कि फ़ॉरेन कैपिटल आए भरपूर, और वह जो भी करना चाहे वो करें, प्रॉफिट कमाएँ! और फिर हमारे मिडिल क्लास वग़ैरह के जो लोग हैं, वे कंपनीज़ वग़ैरह में जाना चाहेंगे। मगर जो हमारे गरीब लोग हैं, दे आर अ गुड सोर्स ऑफ़ लेबर! चीप लेबर! मतलब अब हमारा पिक्चर ये है! इसमें और उसमें तो बहुत बड़ा फ़र्क़ है!
कुणाल कामरा : इट्स लाइक मोस्ट ऑफ़ सोसाइटी इज़ गिवअप ऑन जस्ट ड्रीमिंग … और ऐनी सॉर्ट ऑफ़ एस्पीरेशन ही नहीं है लोगों में … किसी चीज़ की और उसका … आई थिंक, सबसे वर्स्ट फ़ेज़ ये पिछला 10-11-12 साल रहा है। जैसे हम शो के पहले डिस्कस कर रहे थे कि अगर अभी यूपीए टू टाइप की सरकार होती तो आप क्या कर रहे होते? वर्सेस … हम अब क्या कर रहे हैं?
सुधा भारद्वाज : यूपीए की सरकार, ख़ासकर टू, इवन वन, फर्स्ट ऑफ़ ऑल, दे वर कोइलेशन गवर्नमेंट। उसमें वो सारी पार्टियाँ बहुत सारे अलग-अलग क़िस्म के हितों को रिप्रेज़ेंट करती थीं। सो इनमें जो एक खींचातानी थी, वो एक्चुअली एक अच्छी चीज़ थी इस सोसाइटी के लिए, कि आपको उनकी आवाज़ भी सुननी पड़ती है, इनकी आवाज़ भी सुननी पड़ती है। एक दूसरी बात यह भी थी कि उस समय एक कंसल्टेशन जो होती थी सिविल सोसाइटी के साथ, आंदोलनों के साथ, उसकी वजह से कई चीज़ें आईं – उसी के कारण आपका आरटीआई एक्ट आया, मनरेगा एक्ट आया, आपका फ़ॉरेस्ट राइट्स एक्ट आया। हालाँकि ये भी काफ़ी मशक़्क़त के बाद आए। पहले लोगों ने कहा, फिर एक्सपर्ट्स के पास गया, फिर बहुत बहस हुईं … इवन जो नया लैंड इक्विज़िशन एक्ट आया … उस समय आप याद कीजिए, चारों तरफ़ के किसान त्रस्त थे, जो पुराने लैंड इक्विज़िशन एक्ट थे उससे! आज इतना बोला जा रहा है कि हम एंटी कॉलोनियल हो रहे हैं तो सबसे पुराना कॉलोनियल एक्ट तो वो था और उसको बदलने में एक आंदोलन की अहम भूमिका थी, कि बार-बार चर्चा होकर, बार-बार चर्चा होकर एक नया एक्ट आया। आप विश्वास नहीं करोगे कि वह अभी कहीं पर भी लागू नहीं होता है। क्योंकि अभी हाईवे के लिए हाईवे एक्ट है, लीनियर प्रोजेक्ट्स के लिए कुछ और है … किसी और चीज़ के लिए कुछ और है … आप अवॉयड ही कर जाते हैं कि 2013 का एक्ट, जिसमें लोगों का सोशल इंपैक्ट असेसमेंट ज़रूरी था, मैजॉरिटी ऑफ़ पीपल हैव टू एग्री। एंड ऑल सच काइंड ऑफ़ डेमोक्रेसी, जो बहुत सारी चीज़ें उसमें डाली गई थीं … जैसे, आपने ज़मीन ले ली और अगर बहुत साल तक आपने यूज़ नहीं की तो फिर वापस करनी पड़ेगी। … अब तो सब कुछ लैंड बैंक में डाल दिया जाता है। अगली किस्त में जाएगा। मतलब आपकी ज़मीन तो आपके हाथ से गई न! रीहेबिलिटेशन के इश्यूज़ … मतलब यह कि अगर आप लोगों से कंसल्ट करके कोई चीज़ बनाते हैं तो जो चीज़ बनती है … और जो केवल इकतरफ़ा रह जाती है … उसमें फ़र्क़ है। मतलब कि वही बुलडोज़र राज! आपको लगा कि इस जगह को सुंदर बनाना है तो बुलडोज़र ले लो और सबको फ़्लैट कर दो। तो यही डिफ़रेंस है न कि कैसे किया जाए!
कुणाल कामरा : अगर डेवलपमेंट में पीपल पार्टिसिपेशन नहीं होगा तो आख़िर वह किसका डेवलपमेंट होगा? इस बात को हम समझ रहे हैं पर लोग हमसे एग्री नहीं कर पा रहे हैं, इस पर कुछ …
सुधा भारद्वाज : देखिए, एक्चुअली होता यह है कि एक है माइक्रो नेरेटिव और एक होता है मैगा नेरेटिव; मोस्टली बहुत सारे लोगों से आप बात करना शुरू करेंगे तो वे मेगा नेरेटिव पर जाएँगे। तो उनका वही हिंदू-मुस्लिम … इंडिया-पाकिस्तान वग़ैरह वग़ैरह … मतलब अबाउट व्हिच दे नो लिटिल, बट दे हैव हर्ड सो मच … एण्ड दे आर कन्विंस्ड … लेकिन जब आप उनकी लोकल जगह के बारे में बात करना शुरू करें, उनके लोकल काम की बात करना शुरू करें, उनके मोहल्ले की बात करना शुरू करें तब उनकी अपनी बात आ जाती है। अरे, हर पाँच साल में आ जाते हैं, हमारी ये नाली अभी तक साफ़ नहीं हुई है … और ऐसा हो गया और वैसा हो गया … इसका घर डिमॉलिश कर दिया, उसका नहीं किया। मतलब जो सारे डिफ़रेंसेज़ और प्रॉब्लम्स हैं, उन पर वे बोलने लगेंगे और कहने लगेंगे कि इतने बार हम सुझाव देते हैं पर कोई सुनता ही नहीं। हमारा कॉरपोरेटर हमारी बात नहीं सुनता। तब आप उस रूप में उसको समझ रहे हैं। पर इसको वहाँ तक कैसे ले जाएँ? ये लिंक खो गया है। और ये लिंक कब बनता है? – जब मूवमेंट्स होते हैं। अब जैसे आप किसानों को देखिए, उनकी तो रोज़ की प्रॉब्लम्स हैं – मंडी वाले के साथ झगड़ा और ये और वो …, धान-ख़रीदी …! हम छत्तीसगढ़ में देखते हैं, कभी-कभी वज़न में प्रॉब्लम, कभी मंडी में बोलेंगे बारदाना नहीं है … गनी बैग्स जो हैं, वो नहीं हैं, कभी कुछ … कभी कुछ! मगर जब वो एक मूवमेंट के रूप में होता है तब आपको समझ में आने लगता है कि अरे! यहाँ तो किसान को जीने लायक़ भी नहीं छोड़ा जा रहा है! साथ ही हम ये भी समझने लगते हैं कि मेरा खेतिहर मज़दूर से जो झगड़ा है, जो कांट्राडिक्शन है कि भई, किसान ठीक से पेमेंट नहीं देता है खेतिहर मज़दूर को। मगर जब हम और वो एमएसपी के लिए लड़ते हैं, तब हम दोनों की ही भलाई हो सकती है। अभी आपने देखा होगा कि जो मनरेगा का नया अमेंडमेंट आया है, उसमें उन्होंने एक बात कही है कि जिस समय फसल का टाइम होगा, हम मनरेगा को चालू नहीं होने देंगे। वे क्या दिखा रहे हैं? कि हम किसानों के लिए कितने अच्छे हैं? हम आपको उस समय चीप लेबर उपलब्ध करा देंगे। मगर अब वे इनके कांट्राडिक्शन को बढ़ा रहे हैं। जबकि एक्चुअली क्या होना चाहिए था कि किसानों को इतना दो कि वे मज़दूरों को ढंग का वेतन दे सकें।
कुणाल कामरा : और एक घर में तीन काम करने वाले हैं न …
सुधा भारद्वाज : हाँ, तीनों तरह के काम करने वाले होते हैं। तो यही फ़र्क़ है एटीट्यूड का। मगर वह कैसे किया जाए? मतलब इंडस्ट्री और एग्रीकल्चर के बीच बैलेंस कैसे लाया जाए? पानी की ज़रूरत इंडस्ट्री को भी है। पानी की ज़रूरत एग्रीकल्चर को भी है। कैसे डिसाइड करेंगे? एक ज़माने में हमारा प्रिंसिपल था ड्रिंकिंग वाटर फर्स्ट, देन एग्रीकल्चर … देन इंडस्ट्री … टोटली इन्वर्टेड … !
कुणाल कामरा : जहाँ भी रिसोर्स मिला हो, चाहे वह वाटर हो, कोल हो … इन सम केसेस रेयर मिनरल्स हों, उस रिसोर्स पर किसका हक़ है? यह सबसे बड़ा डिबेट है। मेरे हिसाब से … आई थिंक, पंडित नेहरू बताते थे कि भारत माता भारत के लोग हैं। मगर इन्होंने इन दोनों चीज़ों को बिलकुल ही अलग कर दिया कि अब भारत माता मतलब ‘हम’ हैं, बाक़ी के ‘तुम’ हो। तो आपने जितना कांस्टीट्यूशन एंड लॉ प्रैक्टिस किया है, व्हॉट डू यू थिंक इज़ द एमिकेबल वे टू रीच योर कंसेसस इन अ सिचुएशन?
सुधा भारद्वाज : सी, एक्चुअली लुक ऐट लैंड! तो जब ज़मीन का अधिग्रहण होता है तो किसके थ्रू होता है? कलेक्टर के थ्रू। पर तब अज़्यूम ये किया जाता है कि कलेक्टर स्टेट का रिप्रेज़ेण्टेटिव है … स्टेट का है मतलब, पूरे लोगों का! इसलिए उसको बहुत ईमानदारी से किसानों की बात भी सुननी है … और उद्योग की बात भी सुननी है। सारी बातें सुनकर ऑब्जेक्शंस को सॉल्व करना है। ग्रीवेंसेज़ को सॉल्व करना है। फॉर एग्ज़ाम्पल, सपोज़, किसान आकर बोलते हैं कि आपने जो यह रोड यहाँ पर सजेस्ट की है, वह बिलकुल हमारे खेतों से होकर जा रही है। अगर थोड़ी सी परिक्रमा ले लें, तो हमारे खेत बच जाएँगे और रोड बंजर ज़मीन से चली जाएगी। ठीक है, उस इंडस्ट्री को थोड़े और ज़्यादा किलोमीटर ट्रक चलाना पड़ेगा। इसके बारे में तो कलेक्टर सोच ही सकता है न!
कुणाल कामरा : एब्सोल्यूटेली!
सुधा भारद्वाज : तो आईडिया यह था कि स्टेट को रेफ़री होना चाहिए। जैसे लेबर कमिश्नर को भी रेफ़री होना चाहिए – जब मज़दूर आते हैं और उद्योगपति आते हैं। पर अब ये रेफ़री वाला रोल ही पूरा ख़त्म हो गया है। स्टेट अब इतने नेकेड तरीक़े से सिर्फ़ कॉर्पोरेट्स के लिए या कुछ विशेष मित्रों के लिए काम करने लगा है … वो साफ़ दिखने लगा है लोगों को, कि हमारी बात ही नहीं सुनी जा रही। अब मैं आपको एक उदाहरण देती हूँ छत्तीसगढ़ का; रायगढ़ में इतने ज़्यादा माइंस हो चुके हैं कि वहाँ का सब कुछ प्रदूषित है। जिंदल के, अड़ानी के, मोनेट के … मतलब बहुत सारी माइंस … थर्मल पॉवर प्लांट्स एंड कोल माइंस हैं। तो एक नई जगह माइन खुलने वाली थी। उसके लिए होता यह है पर्यावरण का एक …
कुणाल कामरा : एनवायरमेंटल सर्टिफ़िकेशन के लिए असेसमेंट?
सुधा भारद्वाज : असेसमेंट नहीं, एक हियरिंग होती है। दैट इज़ द ओनली प्लेस, जहाँ लोगों को मौक़ा मिलता है कुछ बोलने का … एनवायरमेंटल हियरिंग होती है। सारे गाँव के लोग वहाँ इकट्ठे हो गए जहाँ हियरिंग के लिए कलेक्टर ने बोला था। मगर कलेक्टर ने अलग ही जगह पर प्राइवेटली एक हियरिंग कर ली। उसकी वीडियो शूटिंग कर ली। अब बताइए, आप घबरा रहे हैं लोगों का सामना करने के लिए! यही स्थिति है … इसलिए लोगों का विश्वास नहीं रहा कलेक्टर पर, लेबर कमिश्नर पर।
कुणाल कामरा : मुझे तो लगता है कि कभी-कभी ये रुकते हैं … देखते हैं कि प्रोटेस्ट कब वायलेंट होगा! फिर बंद कर देंगे।
सुधा भारद्वाज : हाँ, एक बार वायलेंट हुआ तो ख़त्म!
कुणाल कामरा : आपके केस में आपको, आई थिंक 2018 में एक लाइफटाइम एचीवमेंट अवॉर्ड मिला था और वही साल था, जब सरकार ने आपको यूएपीए के अंडर पकड़ा था … ये कैसे होता है? और आप कैसे … मतलब आपको केस के बारे में बात करने की ज़रूरत नहीं है … बट … ये क्या प्रोसेस है और कौनसा लॉ है?
सुधा भारद्वाज : देखिए, जब हम ट्रेड यूनियन का काम करते हैं, तो मज़दूरों को तो रोज़ ही लड़ना पड़ता है। तो लड़ना, जेल जाना ये इतना आश्चर्यजनक नहीं होता। मतलब स्थिति ऐसी है। देखिए, क़ानून एक्चुअली दो प्रकार के हैं। एक प्रकार के क़ानून वे होते हैं जो हमें राइट्स देते हैं। उनको तो ठीक से इम्प्लीमेंट किया नहीं जाता। दूसरे प्रकार के क़ानून वे होते हैं जो स्टेटस को मैंटेन करने के लिए होते हैं। उनको बड़ी सख़्ती से लागू किया जाता है। तो अगर आपको तीन महीने से पगार नहीं मिला … आप माँगते रहो, आवेदन-निवेदन करते रहो … कुछ नहीं होगा! लेकिन अगर आपने घेराव कर दिया तो पुलिस आ जाएगी। मामला पुलिस का हो जाएगा और वह आपको गिरफ़्तार करके ले जाएगी। सो ये चीज़ें तो हमें पता ही थीं कि ऐसा होता है। शुरू में ट्रेड यूनियन के साथ हमने कॉर्पोरेट्स का सामना किया। बाद में जब मैं वकालत में और लेबर कोर्ट से आगे जाने लगी, हमारे लेबर केसेस हाई कोर्ट में चले गए, तो वहाँ हमने ‘जनहित’ नाम का एक ग्रुप बनाया। हमने ये सोचा कि ये जो इंडिविजुअल लीगल एड होती है न … एक-एक व्यक्ति को हेल्प करते हैं, इससे सिस्टम बहुत चेंज नहीं होता। तो इससे बेहतर है ग्रुप लीगल एड देते हैं। मतलब किसी एक गाँव के पूरे लोग आंदोलन कर रहे हैं या कुछ लोग एनवायरमेंट के लिए कर रहे हैं – तो ऐसे लोगों को हेल्प करनी चाहिए। तो उसके लिए जब हमने ग्रुप बनाया तब बहुत सारे कॉर्पोरेट हमारे दुश्मन हो गए। मेरे ख़्याल से मैंने छत्तीसगढ़ में रहते हुए वेदान्त, होलसीम, लफार्ज, अड़ानी, टाटा, एसआर … मतलब कौनसी कंपनी से नहीं लड़ा है! मुझे पता था कि मैं उनके आँख की किरकिरी बन रही हूँ। मुझे काफ़ी क्लियर थी यह चीज़! और फिर आगे चलकर जब पीयूसीएल में भी मैंने भागीदारी करनी शुरू की तो वहाँ पर स्थिति यह थी कि बस्तर जैसी जगहों पर बहुत सारे साधारण ग्रामीण कई केसों में फँस जाते थे। अब मान लीजिए कि कोई बम ब्लास्ट वग़ैरह कर दिया नक्सलियों ने … तो उसके बाद वे तो भाग जाएँगे, मगर उसके बाद जो कॉर्डन सर्च ऑपरेशन होगा, जिसमें ये लोग फँस जाएँगे सैकड़ों की संख्या में, तो आप ही लॉजिकली बताइए कि उसमें कोई नक्सली तो मिलेगा नहीं, वहाँ तो गाँववाले ही मिलेंगे … तो गाँववालों को आप पकड़कर अंदर करेंगे। तो ऐसे लोगों के केसेस जब हमने उठाने शुरू किए, ऐसे जो एनकाउण्टर्स होते थे, उनको उठाना शुरू किया, तब और ज़्यादा अनपॉपुलर हो गए। मतलब सरकार की नज़र थी … लोगों में पॉपुलर थे … मगर सरकार की नज़र में हम बहुत अनपॉपुलर हो गए। और मुझे लगता है कि हम जैसे जितने भी लोग अरेस्ट हुए इस केस में, वे इसी टाइप के लोग थे। स्टेन स्वामी इसी टाइप के थे, आनंद तेलतुंबड़े भी इसी टाइप के थे। हमको एक सबक़ सिखाने वाली बात थी कि देखो भाई, इनकी तरह ऐसा मत करो कि सरकार का विरोध करो … मतलब वे ऐसा पर्सिव करते थे कि हम सरकार का विरोध कर रहे हैं, जबकि हम एक्चुअली सरकार का विरोध नहीं कर रहे थे। बहुत बार हम कॉर्पोरेट्स का विरोध कर रहे थे और सरकार जो कॉर्पोरेट की तरफ़ से काम करती थी, उसका विरोध करते थे। मेरे साथ तो गिरफ़्तारी तब हुई जब मैं ब्रेक लेकर दिल्ली गई हुई थी, पढ़ा रही थी यूनिवर्सिटी में और कोशिश कर रही थी कि कुछ पैसे वग़ैरह इकट्ठा कर बेटी का कॉलेज वग़ैरह करवा दूँ … यह सोच कर मैं गई थी दिल्ली। उस टाइम उन्होंने अरेस्ट किया यूएपीए में!
कुणाल कामरा : बट जब आप कहती हैं … हालाँकि अभी तो मुझे लगता है कि ये भी बोलना मुश्किल है कि सरकार के कॉर्पोरेट्स हैं या कॉर्पोरेट्स की सरकार!
सुधा भारद्वाज : हाँ, ये दोनों एक दूसरे में मिल गए हैं।
कुणाल कामरा : पहले ब्यूरोक्रेट रिज़ाइन करके पॉलिटिक्स जॉइन करता था, अब रिलायंस जॉइन करता है!
सुधा भारद्वाज : यह चीज़ आप अमेरिका में भी देख सकते हैं कि कोई जो मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स का पार्ट होता है … फिर वह सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट बन जाता है। उसके बाद वह इन-आउट होता रहता है इनके साथ। तो हम बहुत हद तक वैसे ही होते जा रहे हैं, जो पहले नहीं था।
कुणाल कामरा : अब तो पीयूसीएल हो या वैसी कोई ऑर्गेनाइज़ेशन हो, उनके लिए प्रधानमंत्री ने एक टर्म कॉइन किया है – आंदोलनजीवी। तो आपकी नज़र में है कोई ऐसा आंदोलनजीवी?
सुधा भारद्वाज : मैं हूँ। (हँसी)
कुणाल कामरा : अगर जेन्युइनली ये वर्ड … मतलब … हम बहुत ही अलग समय में रह रहे हैं न कि आपको आज़ाद मैदान में प्रोटेस्ट करने के लिए परमिशन चाहिए! हाँ … तो उसका नाम क्यों ‘आज़ाद मैदान’ है? उस पर भी तो डिस्कस होना चाहिए न!
सुधा भारद्वाज : आंदोलनजीवी से उनका मतलब यह है कि कुछ लोग शायद ज़बरदस्ती आंदोलन करते हैं … इसमें ज़बरदस्ती की कोई बात नहीं है। भई, जब लोग कम से कम वोट देते हैं … मतलब कितनी बार सरकारें बदल गईं … इंदिरा गांधी हार गईं, संजय गांधी हार गया, जनता पार्टी आ गई … लोगों ने अपना ग़ुस्सा दिखाया। तो इसी तरह एक आंदोलन में एक डायलॉग की कोशिश होती है। वह डायलॉग आप बनाइए न! अब आंदोलनजीवी कहकर गाली देना है इसका क्या अर्थ है? मेरे लिए तो आंदोलन एक बहुत पॉज़िटिव चीज़ है। जहाँ लोग कम से कम कुछ विकल्प देने की कोशिश करते हैं कि ऐसे नहीं, हमारे लिए ऐसा करो … ऐसा बनाओ! यह तो सरकार के ऊपर है कि वह उनसे कैसे डील करे या कैसे बात करे!
कुणाल कामरा : पर जैसे आपने तीन साल … मैंने कभी किसी औरत का पर्सपेक्टिव नहीं लिया जेल पर, जिनसे भी मैं अब तक मिला हूँ। दे हैव बीन मेल, एण्ड दे हैव नॉट हैड गुड थिंग्स टू शेयर … तो आपने जो तीन साल जेल में बिताए, तो आपने कौनसा भारत देखा वहाँ पर?


सुधा भारद्वाज : मैं जब वहाँ गई तो मुझे एक चीज़ तो समझ में आ गई कि इन सब औरतों में मैं बहुत ही प्रिविलेज्ड हूँ। मुझे एक तो समझ में आ रहा है जो भी क़ानूनी प्रक्रिया चल रही है … मैं समझ सकती हूँ कि क्या हो रहा है! मेरे वकील मिलने आते हैं। मेरा परिवार है … बाहर मेरे साथी हैं यूनियन के, जो बहुत कोशिश कर रहे हैं मुझे बेल-वेल दिलाने के लिए। मगर वहाँ पर ज़्यादातर जो औरते हैं, ख़ासकर वे, जो कोई पति को मारकर आई है ग़ुस्से में, कोई सास को मारकर आई है … मतलब इस तरह के सो कॉल्ड फ़ैमिली क्राइम्स में इनवॉल्व्ड है, उसको तो सब लोग छोड़ देते हैं … ना मायका, ना ससुराल … सब छोड़ देते हैं … कोई नहीं आता …! और उनमें से बहुत सारी महिलाएँ टोटली इल्लीटरेट हैं और लीगली तो बिलकुल भी लिटरेट नहीं हैं। तो टू मेक सेंस … कि क्या हो रहा है, हमारी केस किस स्टेज पर है? वकील क्या कर रहा है? हमारी अपील कहाँ पहुँची है? ऑर्डर क्या हुआ? – कुछ पता नहीं। उनमें से जो पर्टिकुलर क़िस्म की कुछ औरतें ऐसी होती हैं, जिनके पति या बॉयफ्रेंड या जो भी गैंगस्टर हैं, उनके बारे में उन्हें कुछ पता नहीं होता कि वह गैंगस्टर करता क्या है? और क्या होता है जस्ट अरेस्टेड लिटरली लाइक अ लीगल होस्टेज … कि हाँ, हमने किसी को पकड़ रखा है। अरे …
कुणाल कामरा : अंडर नो लॉ?
सुधा भारद्वाज : नो नो, अंडर द लॉ … मकोका लॉ एंड सम स्ट्रिंजेंट लॉ! बेसिकली सेइंग कि शी इज़ पार्ट ऑफ़ द गैंग बिकॉज़ … हो सकता है कि पति ने उसके नाम पर कुछ प्रॉपर्टी रख दी। तो आप ऐसा करो न कि उस प्रॉपर्टी को अटैच कर लो। उस बंदी को जाने दो – जब आपको पता है कि उसको कुछ नहीं पता … उस गैंग की वर्किंग के बारे में, तो उसको पकड़कर मिला क्या आपको? मतलब एक पेट्रियार्कल सोच की वजह से क्या-क्या नहीं हो जाता! मेरा कहना यह है … कि इसके बावजूद भी लोग इतना एकदूसरे की मदद करते हैं – बच्चों को देखना, बीमार लोगों को देखना … मतलब बिलकुल अनजान लोगों के साथ आप हैं। जो मेरे बग़ल में सोती थी, वह बहुत गरीब, मतलब लिटरली भीख माँगने वाली औरत थी, जो थोड़ी मेंटली वेल डेवलप भी नहीं थी, रोती रहती थी। मुस्लिम महिला थी। उसका दूर-दूर तक कोई चांस नहीं था। बहुत दिनों तक लोग उसे परेशान करते थे। बाद में जब मुझे पता चला कि बेटी उसकी अलग है … तो जब बेटी से बात कराई तो बस ‘अम्मी अम्मी’ कहते हुए मेरे पीछे-पीछे पूँछ की तरह घूमती रहती थी। एण्ड समहाउ अपने वकीलों के थ्रू उसकी बेल हो गई। उसके दो हफ़्ते बाद मेरी बेल हुई। पूरे जेल में माहौल था कि दीदी को, आंटी को मेहरून्निसा की दुआ लग गई इसलिए वे छूट गईं। लोग किस तरह … और आप सोचो कोविड के दौरान पता ही नहीं है कि परिवार का क्या हाल है! कोर्ट जाना बंद हो चुका है। कोई आ नहीं रहा है। मतलब सब्ज़ियाँ नहीं आ रही हैं … तो डीप सी डाइविंग करने पर एक आलू मिल सकता है सब्ज़ी में । ख़ाना कम बन रहा है। ये सब कठिन समय था … लेकिन मैंने वहाँ ग़ज़ब-ग़ज़ब की दोस्तियाँ देखीं कि कैसे लोग इसको झेलते हैं! इट इज़ अ डिफरेंट वर्ल्ड … चलो वहाँ बच्चे होते हैं तो हमारे लिए अच्छा है लेकिन उन बच्चों की सोचिए, जो पाँच-छः साल अपनी माँ के साथ रहते हैं और बाद में वे भी एक संस्था में जाएँगे। तो बच्चा अलग जेल में, माँ अलग जेल में …
कुणाल कामरा : किस एज तक के बच्चे रह सकते हैं?
सुधा भारद्वाज : सिक्स ईयर्स तक बच्चे अपनी माँ के साथ रह सकते हैं।
कुणाल कामरा : तो मे’म, सिस्टम ने आपको वर्क डाउन नहीं किया इन तीन सालों में?
सुधा भारद्वाज : एक्चुअली जैसे मैंने कहा … जब मैं गई तो मुझे अपनी बेटी के बारे में सबसे ख़राब लगता था, क्योंकि वो बिलकुल अकेली थी बाहर, कोविड के टाइम में। उसका मुझे ज़रूर लगता था …। लेकिन बाक़ी मुझे पता था कि लोग कोशिश कर रहे हैं। अब हो नहीं रहा तो क्या करें? तो मैंने अपने लिए एक दिमाग़ बना लिया था कि मैं पाँच साल के बाद ही पूछूँगी उनसे। क्योंकि मुझे पता है कि यूएपीए में 10 साल की सज़ा है, जिसके चार्जेस उन्होंने लगाए थे। दस साल की सज़ा का हाफ है पाँच साल। तो पाँच से पहले तो शायद ही कोई निकलेगा बाहर! तो मैंने पूछना ही बंद कर दिया। मैं पूछती ही नहीं थी इसलिए बच गई उस रोलर कोस्टर से कि अभी बेल लगी, अभी रिजेक्ट हो गई … अभी बेल लगी, अभी रिजेक्ट हो गई। वे लोग बेचारे करते जाते थे। मैं कहती थी, ठीक है, ठीक है! और उस बीच मैंने एक्चुअली येरवड़ा में, वहाँ हम लोग सिंगल सेल में थे न, तो मैं लिखने लगी लोगों के बारे में – जो-जो दिखते थे, जिन-जिनसे भेंट हो जाती थी। पीछे फैक्ट्री थी। फैक्ट्री में जो लोग जाते थे … क्या कहानियाँ हैं? मतलब किस तरह से सर्वाइव करती हैं महिलाएँ? एक महिला का मुझे याद है कि वह और उसकी बेटी जेल में थे। बहुत गरीब परिवार था। उन लोगों ने कुछ लोन लिया हुआ था और लगभग सारे पैसे दे दिये थे। मतलब जैसे होता है ना कि ब्याज ही बढ़ता जाता है। … तो फिर उस आदमी ने सेक्सुअल फ़ेवर्स माँगने शुरू किए। कुछ देर तक तो उन्होंने झेला फिर उनसे झेला ना गया। नाउ दैट दे वर नॉट क्रिमिनल्स इज़ प्रूव्ड … बाय द फैक्ट दैट दे जस्ट किल्ड हिम एण्ड लेफ्ट हिम देयर इन द झोंपड़ा एंड लॉक इट एण्ड वेण्ट आउट। उन्हें तो पकड़ा ही जाना था। मतलब ऑब्वियस है … लेकिन यह कौनसी सिचुएशन है, जिसने यह स्थिति पैदा कर दी? वे जेल में थीं। लंबे समय तक रहने वाली थीं। भगवान भरोसे … ! तो कोई बाइबिल लेकर बैठा रहता है, कोई पूजा-पाठ करता है, कोई नमाज़ पढ़ता है। बहुत सी मुस्लिम औरतें थीं वहाँ … मगर ये अच्छा है कि वहाँ हिंदू-मुस्लिम का चक्कर नहीं है। मतलब वहाँ पे यह होता है कि सारे देवताओं को पूजो जो निकाल दे जेल से! लेकिन इस मामले में सारे गॉड्स भी यूनाइटेड हैं … इन्हें जल्दी निकालते नहीं हैं!
कुणाल कामरा : इज़ इट वर्थ फाइटिंग फॉर दिस वेयर कि आपको इस तरह से मार्जिनलाइज़ कर दिया जाए कि … मतलब पता नहीं हो कि आगे क्या रिकोर्स है एण्ड व्हाट इज़ द काइंड ऑफ़ इंडिया यू आर गोइंग टू कम आउट टू सी …
सुधा भारद्वाज : समटाइम्स, अलग-अलग समय होते हैं … मुझे कभी-कभी लगता है कि 1931 में अगर भगत सिंह फाँसी चढ़ा तो क्या उसको कहीं दिख रहा था कि आज़ादी मिलेगी? हमें भी तो नहीं दिख रहा है। पर जो हम कर रहे हैं उससे कहीं न कहीं कुछ तो होगा … इट्स लाइक दिस … मतलब अभी आप कह सकते हैं कि कुछ नहीं हो रहा। लेकिन मैं ज़ोर लगा रही हूँ इस हाथ से कि ये ना हो तो ये दूसरा हाथ गिर जाए! तो हमने किसी तरह एक प्रेशर बना रखा है कि इतना हम नहीं होने देंगे। अब सोचिए … मैं क्या बोलूँ कि इस देश में आज भी गटर साफ़ करने के लिए लोगों की मौत हो रही है।
कुणाल कामरा : महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा …
सुधा भारद्वाज : इसी महाराष्ट्र में मैं जो एक केस कर रही हूँ कि उसमें महाराष्ट्र सरकार ने यह कहा है कि कोई भी मैन्युअल स्कैवेंजर नहीं है इन एनी ऑफ़ द 26 डिस्ट्रिक्ट्स। बिकॉज़ दे आर डिफ़ाइनिंग मैन्युअल स्कैवेंजर एज़ पर्सन हु क्लीनिंग ड्राई लैट्रिन्स। उनके हिसाब से तो ड्राई लैट्रिन्स ख़त्म … तो मैन्युअल स्कैवेंजर ख़त्म … पर जब मर जाता है तो उसको मानते हैं कि ये मैन्युअल स्कैवेंजर था … तो ये क्या विचित्र लीला है! इतने बड़े-बड़े बिल्डर्स हैं, कार पार्क्स बना रहे हैं, बिल्डिंग बना रहे हैं, कोस्टल रोड्स बना रहे हैं, मगर ऐसा सीवेज सिस्टम नहीं बना सकते जिसमें किसी को उतारने की ज़रूरत ना पड़े?
कुणाल कामरा : बना तो सकते हैं …
सुधा भारद्वाज : कम से कम नई बिल्डिंग्स में तो ऐसा कुछ कर सकते हैं! दे कैन फ़ोर्स इट … दे कैन फ़ोर्स कि आपको … यू कैन नॉट हैव दीज़ काइंड ऑफ़ सिस्टम्स एनी मोर!
कुणाल कामरा : अभी तो आप देखेंगे कि स्प्रिंकलर्स लगे हुए हैं सब जगह। अब यह बाय लॉ है, बाय रूल … लगाने पड़ेंगे आपको, दिखेंगे ख़राब लेकिन लगाने पड़ेंगे बाय रूल, क्योंकि घर के अंदर जो आदमी रह रहा है, उसके लिए हैं। उसकी सेफ़्टी के लिए हैं। मगर उसका लैट्रिन जहाँ जाता है, उसकी सेफ़्टी के लिए कुछ नहीं है!
सुधा भारद्वाज : अब हम लोग भी अगर किसी नई बिल्डिंग में जाते हैं तो कभी पूछते हैं क्या कि साहब, आपका सेप्टिक टैंक कैसे साफ़ होता है? शुड वी आस्क शुड द सोसाइटी नो अबाउट इट? मतलब जब कोई मरेगा और सोसाइटी के ऊपर केस आएगा, तभी हम मीटिंग करके बोलेंगे – अरे यार! हमें तो कुछ पता ही नहीं था … यह कैसी बात है? हम क्यों पैसा दें इसके लिए?
कुणाल कामरा : क्यों हमारी ज्यूडीशियरी के चश्मे इतने काले हैं कि वह कुछ देख नहीं पाती?
सुधा भारद्वाज : यह सिर्फ़ ज्यूडीशियरी की ही नहीं …
कुणाल कामरा : नहीं, पर जब एक बार आप अंदर चले गए, तब तो ज्यूडीशियरी के ही हाथ में है न?
सुधा भारद्वाज : हाँ, वो तो है। जैसे आपने कहा कि क्यों नहीं दिख पाता? अभी एक आदमी गाड़ी के अंदर है और एक पेडेस्ट्रियन जा रहा है … उसके ऊपर कीचड़ उछल गई। तो जो गाड़ी के अंदर बैठा है, वह सोच रहा है – अरे यार! ये लोग सड़क पर क्यों चलते हैं? और जो बंदा चल रहा है वह सोच रहा है – अरे यार! इतनी बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ क्यों रखते हैं ये लोग? … तो यह उसी घटना को देखने के दो तरीक़े हैं। तो … हमारा जो पुराना समाज है न … इतने समय से डिवाइडेड है – कास्ट लाइंस के … मतलब हम आदी हैं इस चीज़ के कि कुछ लोग तो ऐसे हैं … कुछ लोगों को यही काम करना चाहिए! कुछ लोगों की क़िस्मत यही है कि वे ऐसे ही रहेंगे। सो आई थिंक इवन दैट हैज़ अफेक्टेड द ज्यूडीशियरी आल्सो। आप देखिए कि किसी स्टूडेंट के लिए केस होता है कोई, तो उसको फटाफट रिलीफ मिल जाती है; लेकिन बहुत सारे लोगों को रिलीफ नहीं मिलती क्योंकि वे इतने इंपोर्टेंट नहीं हैं।
कुणाल कामरा : वही है कि कॉन्स्टिट्यूशन जब सबको इक्वल इम्पोर्टेंस देता है, मगर जज क्यों नहीं दे पाते फिर? … मैं किसी एक जज की बात नहीं कर रहा …
सुधा भारद्वाज : मैं समझ रही हूँ बिलकुल जो आप कह रहे हो। मुझे लगता है कि जैसे नेल्सन मंडेला ने बोला था कि आई एम अ ब्लैक मैन इन अ व्हाईट मैंस कोर्ट … ठीक है? या कई बार एक औरत को लगता है कि शी इज़ ए वुमन इन अ मैंस कोर्ट। ठीक है? आप कई बार देखिए … ज्यूडीशियरी जो है … अगर कोई पति अचानक पहुँच जाता है और वह देखता है कि उसकी बीवी किसी और लवर के साथ है और वह ग़ुस्से में गोली मार देता है। ऐसे बहुत सारे लोगों को ज्यूडीशियरी के लोगों ने एक नर्म सज़ा दी कि दिस वॉज़ टू गेव अ प्रोवोकेशन! लेकिन वह औरत, जिसको बंदा रोज़ दारू पीकर मारता है, अगर वह उल्टा मार दे उसको … तो ये नर्मी नहीं मिलेगी। यह फैक्ट है। सो समटाइम्स यू आर अ वर्कर इन अ इंडस्ट्रियल कोर्ट … समटाइम्स यू आर अ फार्मर इन अ डेवलपर्स कोर्ट … तो ये जो चीज़ है न, तो देखने का चश्मा है ही अलग-अलग। पहले तो कॉन्स्टिट्यूशन की बात फ़िल्टर होकर आती भी थी थोड़ी बहुत … अब तो विकास … और जो है संस्कृति और संस्कार … और यह … यह पूरा ऐसा मिश्रण भयंकर हो गया है कि इससे नहीं हटा जा सकता।
कुणाल कामरा : लेकिन जैसे आपने बोली यह बात … मतलब मेरे हिसाब से तो जज पहले किचन-विचन में जाकर देखें कि औरतों के आस-पास क्या-क्या होता है, जो वे यूज़ कर सकती हैं और नहीं करतीं। इट रिक्वायर्स ग्रे प्रोवोकेशन न? मतलब आपके पास तो पड़ा है सामान … आप डे वन से तो नहीं यूज़ करते उसे?
सुधा भारद्वाज : बिलकुल!
कुणाल कामरा : बट वही है कि आप अगर एक सिचुएशन में वायलेंस का कॉंटेक्स्ट देते रहेंगे और एक सिचुएशन में आप कॉंटेक्स्ट ही हटा देंगे वायलेंस का, तो फिर?
सुधा भारद्वाज : जैसे किसी औरत ने जब सुसाइड किया … क्योंकि उसको बार-बार कहा जाता है कि तुम बाँझ हो, तुम्हारे बच्चे नहीं हैं … तो जज साहब ने लिख दिया कि इतना क्या सेंसिटिव होना … अगर कोई बोल रहा है कि आपको बच्चे नहीं हो रहे! ये तो हाइपरसेंसिटीविटी है, सुसाइड का रीज़न नहीं माना जा सकता! तो उन्होंने तो वह सब झेला ही नहीं है या देखा ही नहीं है या समझा ही नहीं है …! जब पहली बार मैन्युअल स्कैवेंजिंग का केस आया था तो जज साहब ने एक विचित्र सवाल पूछा। उन्होंने कहा कि वे यह काम करते ही क्यों हैं? तो अगर आप इसको पिक्चर ही नहीं कर सकते कि वे इस काम को करते क्यों हैं? कंप्लेन क्यों नहीं करते? … इसका मतलब आप वस्तुस्थिति को समझ ही नहीं रहे हैं। तो यह तो बहुत बड़ी कमी है ज्यूडीशियरी के अंदर! मुझे लगता है कि वे जिस क्लास को बिलाँग करते हैं और जिस तरीक़े से बहुत ज़्यादा … कुछ ही फ़ैमिलीज़ के लोग ज्यूडीशियरी में भर जाते हैं … ये सब भी है …। बहुत सारे इशूज़ कॉलेज़ियम को लेकर भी आते रहते हैं। सिमिलर पॉलिटिकल आइडियोलॉजीज़ के लोग … सिमिलर बैकग्राउंडज़ के लोग … सिमिलर … ये सब एक क्लब जैसा हो जाता है न!
कुणाल कामरा : बट व्हॉट मैक्स अ कंट्री लाइक इंडिया, व्हॉट मैक्स इट … व्हॉट इज़ अ कंट्री दैट यू वाँट टू कम आउट ऑफ़ जेल टू सी? क्या देखना चाहेंगी आप?
सुधा भारद्वाज : जब मैं छत्तीसगढ़ में थी, बहुत लोग बोलते थे कि सैक्रिफाइस एंड ऑल दैट … पर उन लोगों के बीच आप उनका रेज़िलिएंस देखिए … आप उनका फ़न लविंग नेचर देखिए … उनका प्यार देखिए … वो इतने डिफ़िकल्ट सर्कमस्टैन्सेस में कैसे जीते हैं और एक साथ कैसे आते हैं … जैसे मैंने जेल का भी आपको बताया … मतलब ह्यूमैनिटी वहाँ दिखती है। जैसे कई लोग हमको बताते थे कि छत्तीसगढ़ के लोग कश्मीर तक जाते हैं काम करने के लिए; तो छत्तीसगढ़ में तो ठंड क्या होती है, पता ही नहीं है। वे लोग जब श्रीनगर पहुँच गए तो वहाँ क्या हाल हुआ होगा? मगर वे बताते हैं कि नहीं दीदी! वहाँ श्रीनगर के लोग बहुत अच्छे हैं और हम लोगों को पूरा कपड़ा देते हैं। छत्तीसगढ़ के लोग परिवार सहित जाते हैं तो सारे बच्चों को उन्होंने कपड़े पहनाए और सबसे बड़ी बात है दीदी, हमको साथ में बिठाकर ख़ाना खाए। मतलब … जब मैंने वह चीज़ पिक्चर की दिमाग़ में, मुझे लगा कि यह मेरा भारत है भई! यह भी होता है। पॉसिबल तो है। पॉसिबल तो है!
कुणाल कामरा : बट जैसे कॉन्स्टिट्यूशनल गारंटीज़ पर और ज्यूडीशियरी पर हम बात कर रहे हैं; तो आपने एक बात की कि उसमें पुलिसिंग का एक बड़ा रोल होता है।
सुधा भारद्वाज : बहुत बड़ा।
कुणाल कामरा : आपको क्या लगता है कि भारत में जो पुलिस … मैं नहीं बोलूँगा यूपी की पुलिस या महाराष्ट्र की पुलिस या तमिलनाडु की पुलिस … मैं बोलूँगा भारत की पुलिस में क्या ऐसी चीज़ें हैं जो एक सिटिजन को पुलिस से इंटरैक्ट करते वक्त ही सेकंडहैंड बना देती हैं? … कि भई, आप सेकंडहैंड सिटीजन हो भारत के!
सुधा भारद्वाज : आजकल एक अच्छी बात है कि पुलिस के ऊपर बहुत सारे ओटीटी सीरियल्स आने लगे हैं। व्हिच इज़ नोट ब्लैक एण्ड व्हाईट …
कुणाल कामरा : ग्रे हैं …
सुधा भारद्वाज : ग्रे हैं। पुराने ज़माने में भी ‘आक्रोश’ वग़ैरह बनी हुई है। तो मुश्किल पार्ट यह है कि पुलिस के ऊपर बहुत पॉलिटिकल प्रेशर्स हैं। एण्ड आई थिंक, ये प्रमुख बात है। एक तो, ख़ुद ही … कुछ लोग जो पुलिसमैन होते हैं, उनके अंदर एक घमंड और ऑथोरिटेरियनिज़्म होता है … ये होता है कि वह सामने बैठे हुए बंदे को कुछ समझता ही नहीं! कपड़े-वपड़े देखकर भगा देता है। एफ़आईआर तक नहीं लिखता है उसका … या कोई महिला आ गई तो बोलता है, अरे तूने ही कुछ किया होगा जो ऐसा हुआ! चल बाद में आना। मतलब कुछ तो कैरेक्टर में भी होता है … बट अगर वह ईमानदारी से कोशिश करता भी है, तब फ़ोन आने शुरू हो जाते हैं। ये पक्का है। एमएलए का फ़ोन, एमपी का फ़ोन, बग़ल वाली कंपनीवाले का फ़ोन, ज़मींदार का फ़ोन … मतलब, बड़े लोगों का फ़ोन …! और उसको पता है कि वहीं ट्रांसफ़र की भी तलवार लटक रही है। यह तो बहुत समय से … प्रकाश सिंह वग़ैरह पुलिस रिफॉर्म्स आदि की बात कर रहे हैं … ऑल दिस हैज़ बीन इन द कोर्ट्स ऑलसो … पर ये कभी लागू नहीं होता है। अब आप सोचिए गोपीनाथन और हर्षमंदर और अरुणा रॉय जैसे लोग आईएएस छोड़कर … कि हमारे ऊपर इतना प्रेशर होता है … तो एक थानेदार के ऊपर क्या प्रेशर होता होगा? आप सोच के देखिए … मतलब एक थानेदार के लिए … कि वह जो लोकल कंपनी का मालिक है, उसके ख़िलाफ़ जाकर एक वर्कर की एफ़आईआर लिख ले! एक लड़की आई हुई है … वह कह रही है कि फ़लाना एमएलए मेरे साथ ऐसा कर रहा है … उसके ख़िलाफ़ एफ़आईआर लिखने और इन्वेस्टीगेशन करने की हिम्मत कैसे और कब आएगी? इट्स रियली डिफिकल्ट टू थिंक ना … फिर क्या होता है, वह रूटीन हो जाती है और पुलिस का बहुत सारा यूज़ वीआईपी ड्यूटी … मतलब … आईपीएल मैच … शो … इन सबमें यूज़ होता है, जहाँ होना चाहिए, वहाँ नहीं होता है। एक्चुअल में पुलिसिंग का जो काम है … एण्ड इवन अगर आप उनके मैनुअल्स वग़ैरह देखें, जो अभी भी अंग्रेज़ ज़माने के हैं … जैसे कोई कम्युनल रायट होता है तो सबसे पहले मैनुअल में यह लिखा है कि पुलिस का काम यह है कि अलग-अलग समुदायों के लोगों से मिलकर अमन कमेटी बनाना। ये अंग्रेज़ों के ज़माने का लिखा हुआ है। पर क्या पुलिस ऐसा करती है? ऑब्वियसली नहीं करती। एक साइड के साथ चुप रहती है। दूसरे साइड को जाकर लाठी मारती है। मतलब … हर जगह वे अपनी प्रेजुडिस हमें दिखाते हैं। ज़रूरी नहीं कि यह उनका पर्सनल प्रेजुडिस हो! सिस्टम का प्रेजुडिस भी हो सकता है। अभी-अभी एकाध बहुत ही ब्रेव पुलिस ऑफिसर के बारे में सुनने को मिला, जिन्होंने किसी कम्युनल रायट को रोक दिया। मगर आप देखोगे कि थोड़े दिनों में ही उनका ट्रांसफ़र कर दिया जाएगा। उन्हें रखा नहीं जाएगा। तो व्हॉट डू वी डू अबाउट दिस?
कुणाल कामरा : तो बेसिकली हमने तीन चीज़ों के बारे में बात की – एक है पुलिसिंग, दूसरा है लेबर और तीसरा ज्यूडीशियरी। तो इन तीन चीज़ों में जो लोग रिफॉर्म्स लाना चाहते हैं, वे किस तरह के रिफॉर्म्स करें, जो इनको डेमोक्रेटिक और फेयर और जस्ट बनाएँगे?
सुधा भारद्वाज : पुलिस, ज्यूडीशियरी और लेबर … हम लोग जब जेल में होते थे तो हँसते हुए कहा करते थे कि हरेक जज को, अपने करिकुलम के अंदर एक हफ़्ता जेल में रहना चाहिए। तब उनको समझ में आएगा कि क्या है रियलिटी! उस समय मुझे याद है कि मैंने किसी को कहा भी था कि हरेक जज के सामने एक ‘टिकर’ होना चाहिए ताकि उसको पता हो कि जब-जब वे बेल डिनाई करते हैं, तो कितने लोग उनकी कस्टडी में जेल में हैं – उनकी वजह से या उनके निर्णय से! सो मैनी पीपल आर देयर … एम आई लुकिंग आफ्टर दोज़ पीपल? उन लोगों का क्या हाल है? वे किस स्थिति में हैं? कितने समय से हैं?
कुणाल कामरा : ये उनकी रिस्पांसिबिलिटी है …
सुधा भारद्वाज : ऑफ़कोर्स! वी आर अंडर द कस्टडी ऑफ़ दैट कोर्ट! ठीक है, हम कन्वेनियंस के लिए जेल में रखे गए हैं। पर वह जज ज़िम्मेदार है हमारी स्थिति के लिए। ज़िम्मेदार यानी … ही इज़ द कस्टोडियन ऑफ़ अवर राइट्स। तो ये जो ज़िम्मेदारी है, इसको वे लोग महसूस ही नहीं करते। अब जैसे हम जेल में रहते हैं, बहुत सारे विज़िट्स होते रहते हैं। वे विज़िट होना हमारे लिए एक हेडेक होता है। क्योंकि उसमें क्या करना होता है? जल्दी-जल्दी अपना बिस्तर ऐसा लगाओ, अपना बर्तन-वर्तन लगाओ और ऐसे चुपचाप बैठ जाओ। और हमें पहले ही बता दिया जाता है कि कोई बात नहीं करना किसी से। वो लोग … चाहे डिस्ट्रिक्ट जज हो, चाहे आईजी हो, चाहे एसपी हो, चाहे जो भी कोई आते हैं … वे आएँगे … पूछेंगे … कोई प्रॉब्लम है? नहीं। ओके। ठीक है, चले जाएँगे। एटलीस्ट दे शुड हैव द गट्स टू से कि हमें इस तरह की इंस्पेक्शन नहीं करनी है। एण्ड पीपल फ्रॉम सिविल सोसाइटी शुड आस्क टू मेक दोज़ इंस्पेक्शंस। एण्ड दे शुड से कि आप लोग थोड़ा परे रहिए। हम लोग एक रूम में बैठकर जिस-जिस को शिकायत करनी होगी, हम कॉन्फ़िडेंशियली उनकी शिकायत सुनेंगे। अगर ये हो जाए ना तो चीज़ें सुधर जाएँगी! मतलब मेरा ये कहना है कि अभी भी … यू स्टिल हैव दैट एटीट्यूड कि जैसे राजा और प्रजा हों! आप अपनी कोई ज़िम्मेदारी … या उनकी स्थिति क्या है, इसको इवन जानने की कोई कोशिश नहीं करते।
कुणाल कामरा : हिम्मत नहीं करते!
सुधा भारद्वाज : हाँ, ऐसा भी कह सकते हैं कि हिम्मत नहीं करते।
कुणाल कामरा : जज देख लेगा जेल, तो फिर बहुत मुश्किल होगा उसको आप लोगों को भेजना!
सुधा भारद्वाज : भेजने में … और हाँ, बार-बार डिनाई करने में भी।
कुणाल कामरा : जैसे ज्यूडीशियरी में जो रिफॉर्म्स होने चाहिए, उस पर हमने थोड़ी डिस्कशन की। पुलिस पर, लेबर पर भी अगर हम थोड़ा डिस्कस कर लें …
सुधा भारद्वाज : लेबर पर ना … एक्चुअली अभी जो फेज़ आने वाली है लेबर की, इट्स गोइंग टू बी वैरी डिफिकल्ट … क्योंकि हमारे देश में एक काफ़ी अनोखी पॉज़िटिव चीज़ थी, वो थी कॉंट्रैक्ट लेबर रेगुलेशन एण्ड एबॉलिशन एक्ट … और वही एक्ट रिपील हुआ है अभी कोर्ट्स के साथ! वो एक्चुअली क्या था कि अगर कोई काम रेगुलर है, कंटीन्यूअस है, पैरेनियल है, बारहमासी चलने वाला रेगुलर काम है तो उसके लिए कॉंट्रैक्ट लेबर रखने की ज़रूरत नहीं है। आप परमानेंट लेबर रखो। क्योंकि वो परमानेंट लेबर थोड़ा सुरक्षित रहता था, यूनियन बनाता था … धीरे-धीरे करके माँगें रखता था और फिर उसके लिए लड़ाई … उसकी वजह से उन्होंने अपनी बहुत सारी चीज़ें बनाईं। तो आप किसी कॉंट्रैक्ट वर्कर से पूछिए कि उसका सपना क्या है? तो वो बोलेगा कि मुझे रेगुलर वर्कर होना है। परमानेंट होना है।
कुणाल कामरा : मालिक नहीं होना है?
सुधा भारद्वाज : मालिक होने की कोई बात ही नहीं करता। सोच भी नहीं सकता। पर यह तो सोच ही सकता है कि कम से कम एक रेगुलर वर्कर तो हो सकता हूँ। मगर वह सपना भी छीन लिया गया है। क्योंकि अभी जो लेबर कोड है, उसमें कॉन्सेप्ट है फिक्स टर्म वर्कर का, इसका मतलब यह है कि जो काम हमेशा चलता है – उस कंपनी के अंदर सीमेंट बनाने का काम … अब उसका कंसेप्ट ये था कि सीमेंट प्रोडक्शन में सब रेगुलर वर्कर रहेंगे और अगर मुझे एक शेड बनाना है या मुझे कोई छोटा-मोटा काम करना है, उसके लिए मैं कॉंट्रैक्ट पर 50 वर्कर्स लगा सकता हूँ, जो 6 महीना काम करके चले जाएँगे। ऑब्वियसली मैं उनको नहीं रख सकता एज़ अ रेगुलर वर्कर! पर अब अगर रेगुलर वर्कर भी ऐसा ही रहेगा कि 2 साल – 3 साल का कॉंट्रैक्ट … तो वो यूनियन कैसे बनाएगा? तलवार तो लटक रही है उसके ऊपर! और अगर यूनियन नहीं बनाएगा तो उसकी स्थिति क्या होगी? तो द इम्पोर्टेंस ऑफ़ यूनियन … मतलब क़ानून तो कब से बनकर पड़े हुए हैं! नियोगी जी 1991 में मारे गए। किन चीज़ों के लिए मारे गए? व्हाट वॉज़ द ग्रेट डिमांड्स? गेट पास दो, 8 घंटे का काम दो, मिनिमम वेजेस दो। मतलब … जो 1948 के क़ानूनों के हिसाब से है … सफ़दर हाशमी किस चीज़ के लिए मारे गए? मिनिमम वेजेस के लिए मारे गए! दत्ता सामंत किस चीज़ के लिए मारे गए? कि भई, वर्कर अपनी पसंद का यूनियन चाह रहा है। वो आपकी रिकॉग्नाइज़ यूनियन को मान नहीं रहा। उसको अपना यूनियन बनाना है। मतलब आप समझ रहे हो कि इतने बड़े आंदोलनों और यूनियनों वाले लोग छोटी-छोटी चीज़ों के लिए मारे गए! तो अब सोचो कि यूनियन ही ना रहेगा तो लोग लड़ेंगे कैसे? सो, इट्स अ वैरी डिफिकल्ट टाइम एण्ड सी … चेंज आने वाला है। ठीक है कि ज़्यादातर वर्कर्स ऑर्गनाइज़्ड नहीं थे, अनऑर्गनाइज़्ड थे। मगर ऑर्गनाइज़्ड इंडस्ट्री ने कुछ पैमाना बनाकर रखा था कि इतना मिनिमम वेज होना चाहिए, ईएसआई होनी चाहिए, पीएफ़ होना चाहिए …। दे हैड क्रिएटेड अ स्टैण्डर्ड। जो हर वर्कर सोचता था कि ये अचीवेबल है मेरे लिए। वो नहीं रहेगा तो बहुत मुश्किल होगी। मगर इसका मतलब यह ना सोचा जाए कि वर्कर चुप रहेगा। अभी आप पिछले एक महीने में देख लीजिए … पानीपत, सूरत … मतलब हज़ारों की संख्या में ऐसे लोग कंपनियों से निकल के आ रहे हैं और बोल रहे हैं … 8 घंटे का काम चाहिए। 12 घंटे का हम नहीं कर सकते। अब इनका न कोई यूनियन है और ना कोई नेता है। पर चीज़ें अब बर्दाश्त नहीं हो रही हैं। एक्चुअली अभी जो उद्योगपति लोग हैं, उनको सोचना चाहिए कि ये लेबर लॉ इसलिए आए थे क्योंकि बार-बार इंडस्ट्रियल अनरेस्ट से कोई फ़ायदा नहीं होता …
कुणाल कामरा : किसी को फ़ायदा नहीं होता …
सुधा भारद्वाज : किसी को फ़ायदा नहीं होता। टेबल पर बैठकर नेगोशिएट करना चाहिए और इसके लिए लॉ होता है। लेकिन अब आजकल आपमें इतना घमंड आ गया है … आपके अंदर इतना पॉवर हो गया है कि आपको लगता है … छोड़ो, क्या लॉ वग़ैरह करना! पर आप ये नहीं देख रहे हो कि आगे क्या होगा! जो दिये की तरह यूनियन जलते थे, वे अब पटाखे की तरह फूटने लगेंगे। अब आप सम्हालो फिर …! बेसिकली बिकॉज़ यू आर डिनाइंग अ होल सेक्शन कि उनके लिए कोई फ्यूचर ही नहीं। उनके लिए कोई ग्रोथ ही नहीं। वो अपने बच्चों के लिए कुछ सोच ही नहीं पा रहे हैं। हमारा घर कब बनेगा, ये सोच ही नहीं पा रहे हैं। मतलब आप सोचो ना … एक ज़रा सी क्राइसिस आ गई फ़ैमिली के अंदर, तो जो पानी यहाँ (नाक तक) तक है, इंसान डूब ही जाएगा। एक बीमारी … एक शादी … एक एक्सीडेंट … इट्स ऑल ओवर!
कुणाल कामरा : जैसे हम कॉंट्रैक्ट लॉ के बारे में बात करते हैं … तो अगर मैं किसी के साथ कोई कॉंट्रैक्ट साइन करूँ … जैसे ये गिग वर्कर्स के साथ कर रहे हैं … बड़ी-बड़ी कम्पनीज़ … ज़ोमेटो, स्वीगी, ओला, उबर, ब्लिंकिट वग़ैरह … अगर उन गिग वर्कर्स के पास वह कॉंट्रैक्ट की कॉपी ही नहीं है … या उनमें वह कॉंट्रैक्ट समझने की क्षमता ही नहीं है … उन पर आप जीएसटी लगा रहे हो … रिट्रोस्पेक्टिवली उनका टीडीएस काट रहे हो … उनको बता नहीं रहे हो … टैक्स रिटर्न फाइल करने होते हैं … तो ये एक अलग तरह का शोषण चालू हो गया है।
सुधा भारद्वाज : बिलकुल … बिलकुल! और ये जो सिस्टम है वह एक्सपैंड करता जा रहा है। अभी आजकल ‘बुक माय बाई’ … और इस तरह के जिसमें उन्होंने … वो तो ख़ैर वापस ले लिया गया बहुत प्रोटेस्ट के बाद। उसमें उन्होंने यहाँ तक के एडवरटाइज़मेंट्स डाले थे कि हर 10 में से 3 डोमेस्टिक वर्कर्स क्रिमिनल होते हैं। इसलिए आप हमसे लीजिए पुलिस सर्टिफ़ाइड डोमेस्टिक वर्कर ! अरे, मतलब आप यह कह रहे हैं कि जो घरों में काम करती हैं, उनमें से 30% चोर होती हैं? ग़ज़ब है!! मतलब आप बेसिकली एक वर्कर को … एक ह्यूमन बीइंग के रूप में देखना बंद कर रहे हो!! और आप चाहते हो कि वह सिर्फ़ एक घंटे काम करके जाए? मतलब वह एक मशीन हो गया? अब इससे आगे आपको सोचने की ज़रूरत नहीं है कि इसका घर है या नहीं? इसका ये हैं कि नहीं … वो है कि नहीं? डोंट हैव यू थिंक एनीथिंग। और ख़ासकर … ओला-उबर वग़ैरह के जो लोग हैं, वे तो कहते हैं कि ये तो वर्कर ही नहीं हैं, ये पार्टनर हैं हमारे! पार्टनर! कैसा पार्टनर? जो बेचारा एल्गोरिदम ही नहीं जानता कि आप किस एल्गोरिदम से कैलकुलेशन कर रहे हो … कमीशन का और उसके हिस्से का? कई बार उबर का दाम बहुत बढ़ जाता है, लेकिन वो ड्राइवर को थोड़े ही जाता है! वो कंपनी को जाता है और उसमें से उसे कितना हिस्सा मिलेगा, उसको ठीक से पता भी नहीं कि उसका कैलकुलेशन कैसे हो रहा है! दूसरी बात, हमने एक कंप्लेंट कर दी … उसकी आईडी बंद हो गई। भई, कोई भी जस्टिस सिस्टम यह होता है कि इकतरफ़ा न्याय नहीं हो सकता। उस बंदे से भी तो पूछो … वो बंदा बोले तो किधर बोले? आपने तो आईडी बंद कर दी। तो ना तो ग्रीवेंस रीड्रेसल है, ना कोई कैलकुलेशन है! ये कौनसी पार्टनरशिप है भई? ऑब्वियसली एक कंपनी बेनिफ़िट कर रही है। और जैसा मैंने कहा कि यह बात अलग-अलग स्फियर्स में जा रही है – बुक माय बाई जैसी। अभी तक बाई के साथ जो रिलेशनशिप होती है, वह बहुत सालों की होती है और हम समझने भी लगते हैं उसको। हम उससे बात करते हैं। अरे, तुम्हारा पति ऐसा करता है तो चलो, तुम्हारा बैंक अकाउंट खोल लेते हैं, उसमें पैसे जमा कर देंगे। बीमार हो तो आज जाओ, आराम कर लो। आज छुट्टी है … अच्छा तुम क्रिश्चियन हो, चलो संडे को छुट्टी ले लो, चर्च चले जाओ – ये करते हैं। क्योंकि हम उसको इंसान के रूप में देखते हैं, वो भी हमें इंसान के रूप में देखती हैं। लेकिन हम हरेक को रिड्यूस कर रहे हैं – ‘वन आवर फॉर दिस वर्क’। जब वे लड़कियाँ काम करने जाती हैं तो देखती हैं कि आठ दिन के बर्तन पड़े हुए है! कैसे … कितनी गंदगी है! ये क्या है? ये एटीट्यूड … टुवर्ड्स वर्क एण्ड टुवर्ड्स वर्कर्स! उस वर्कर की भी एक ज़िंदगी है। यू हैव टू … यह बहुत ख़राब है! अभी सुप्रीम कोर्ट ने टर्न डाउन कर दी है डोमेस्टिक वर्कर्स की वो पीटीशन। … बहुत सारे स्टेट्स में लॉज़ बने हुए हैं, जो कहते हैं कि मिनिमम वेजेस मिलनी चाहिए। उनका कहना था कि दिस शुड बी एन ऑल इंडिया थिंग। द सुप्रीम कोर्ट सेड, नो बिलीव इन टू द स्टेट। इन फैक्ट, द चीफ़ जस्टिस आल्सो सेड दैट वी डोंट वाँट टू एनकरेज कॉन्फ़्लिक्ट्स इन एवरी हाउस … बट प्रीसाइज़ली बिकॉज़ यू डोंट वाँट अ कॉन्फ़्लिक्ट … यू वाँट द लॉ सो बी लेड डाउन! … जब से आपने लॉ ले डाउन कि टीचर कॉर्पोरल पनिशमेंट यूज़ नहीं करेंगे। तब से स्कूलों में मारना-पीटना बहुत कम हो गया। दैट इज़ बिकॉज़ द लॉ … अभी टीचर ये समझता है। नहीं तो ‘स्पेयर द रॉड एंड स्पॉइल द चाइल्ड’ … वह तो अभी भी यह कहावत चल ही रही है। अरे मास्टरजी, एक-दो लगाओ इसको, वरना वह समझेगा नहीं। कम से कम आपको तो पता है ना कि ये क़ानून ठीक नहीं है। तो घरवालों को भी तो पता होना चाहिए कि एक महिला को बाथरूम यूज़ नहीं करने देना … किसी काम के लिए आप बुलाएँ और दूसरे काम आप करवा रहे हैं! या पेमेंट नहीं करना कई महीनों तक या कोई छुट्टी ही नहीं देना हफ़्ते में … ये सब इल्लीगल है। दे शुड नो इट इज़ इल्लीगल। दैट इज़ द प्रॉब्लम वी आर बिकमिंग … मतलब, मिडिल क्लास को तो बहुत पैम्पर कर लिया … इतना पैम्पर कर लिया कि अभी हम उनको बोल रहे हैं कि छोड़ो, ये सब मशीनें हैं, लोग नहीं हैं। इनके बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं है! दिस इज़ अ वैरी बैड ट्रेंड … वैरी वैरी बैड ट्रेंड … मतलब यही हमारे मिडिल क्लास के बच्चे जब विदेश जाते हैं तो वहाँ तो कोई बाई अफ़ोर्ड नहीं कर सकते। तब सब कुछ करेंगे अपनेआप!
कुणाल कामरा : ऐब्सलूट्ली …! अभी यहाँ 200 दिन नरेगा हो जाए तो यहाँ भी करना पड़ेगा सब कुछ अपनेआप! ये बहुत ही यूनिक टू इंडिया प्रॉब्लम है, बिकॉज़ इसमें कास्ट और क्लास दोनों बहुत ज़्यादा ऐंगेंज्ड है। तो … जब कोई कंपनी … गिग वर्कर्स की कंपनी बोलती है ना कि हम कास्ट और क्लास नहीं देखते, तो कारण है कि आप नहीं देखना चाहते!
सुधा भारद्वाज : कितने इनसीडेंट्स हुए हैं ज़ोमेटो-स्वीगी के साथ, कि एक मुसलमान क्यों हमारा नवरात्रि का ख़ाना लेकर आया? और नॉनवेज और वेज … और ये सब! एण्ड इंफ़ैक्ट, अब ऐसे ऐप्स भी आ रहे हैं कि आप शुद्ध सनातनी लोगों से ही ख़ाना लीजिए हमारा … ये … ये लोग हैं हमारे …! ये सब तो होता है …
कुणाल कामरा : इन फॉर्म ऑफ़ मॉडर्न डिस्क्रिमिनेशन …!
सुधा भारद्वाज : यस!
कुणाल कामरा : मै’म मेरा लास्ट क्वेश्चन है कि जो अब लॉ कर रहा है, जिसे एम एण्ड ए नहीं करना है, टैक्स नहीं करना है, कॉर्पोरेट नहीं करना है, जिसको लिटिगेशन करना है, जिसको मज़दूरों के लिए लड़ना है – उसको क्या सोचना चाहिए इस देश और उसकी ज्यूडीशियरी एण्ड कांस्टीट्यूशन को लेकर?
सुधा भारद्वाज : वकालत के बारे में एक बहुत अच्छी चीज़ है, वह यह है कि वकील एक स्वतंत्र इंडिविजुअल है। उसका कोई बॉस नहीं है। तो यह बहुत पॉजिटिव चीज़ है। मतलब एक्सीडेंट नहीं है कि फ्रीडम स्ट्रगल में भी बहुत सारे वकील आए थे क्योंकि वे एक तरफ़ समझते भी थे … लेकिन बाउंड नहीं थे, उससे बाधित नहीं थे। तो यह स्थिति जो वकीलों की है … बहुत अच्छी है … पॉजिटिव है। लेकिन एक बहुत बड़ी कमज़ोरी वकीलों की है, वह यह है कि दोज़ पीपल हू नीड अस मोस्ट कैन पे अस लीस्ट! जिन लोगों को हमारी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, वे हमें फ़ीस नहीं दे सकते! तो हम कैसे टिकेंगे? तो हमने तो जैसे एक मॉडल बनाया या कई दूसरे लोगों ने जो मॉडल बनाया कि हम इतने केसेस कमर्शियल लेंगे, उसके बाद वी विल नॉट टेक मोर कमर्शियल केसेस, प्रोबोनो केस लेंगे। कुछ लोग ऐसा सोचते हैं, कुछ टीम-अप कर लेते हैं, टीम वर्क कर लेते हैं। मुझे एक चीज़ लगती है कि अगर कुछ लॉयर्स हैं … ख़ास तौर से … जो राइट्स के लिए ऑफ़ेन्सिव बैटल है, उसमें हम देखते हैं कि अक्सर जो भी आंदोलन के लीडर होते हैं, उन पर क्रिमिनल केस वग़ैरह हो जाते हैं तो हमें डिफेंसिव लड़ाई भी लड़नी पड़ती है। तो एक्चुअली हमें बहुत कुछ सीखने को है ऐज़ द लॉयर्स, एंड वी विल हैव टू फाइंड न्यू वेज़। अभी जैसे मैंने ऐज़ अ लेबर लॉयर जो सीखा … कि आजकल कोई प्रूफ ही नहीं देता वर्कर को … वर्कर के पास कुछ नहीं होता … कोई सैलरी स्लिप नहीं होती … कहीं कुछ नहीं होता …! वर्कर्स ने मुझे सिखाया कि दीदी, मुझे जब चोट लगी थी, तब हॉस्पिटल की पर्ची है मेरे पास … मेरी चिट्ठी कंपनी में आया करती थी। ये देखिए … ये प्रूफ है वो …! वे नए-नए तरीक़े निकालेंगे ताकि हम लड़ सकें! सो वी हैव टू बी वैरी क्लोज़ टू द पीपल एण्ड हम जो लॉयरिंग करें, वो ऐसी करें कि उनके लड़ने की क्षमता बंद ना हो। अभी देखिए, किसान कितने स्मार्ट थे … वे लोग सुप्रीम कोर्ट नहीं गए।
कुणाल कामरा : उनको पता था कि क्या होगा!
सुधा भारद्वाज : उनको पता था कि जाते ही सबसे पहले बोला जाएगा कि हाँ, हम आपकी सब बात सोचने के लिए तैयार हैं। पहले आप धरना उठाओ। लेकिन अगर हम ऐसा करेंगे लोगों के साथ, तो लोग एक्चुअली कैसे एक्सप्रेस करेंगे अपने आपको? तो हमें ऐसे लॉयर्स बनना है जो ऐसे मूवमेंट्स को हेल्प करें, उनके एक्सप्रेशन को हेल्प करें। देन देयर माइट बी सम चेंज। इट्स अ डिफ़िकल्ट पाथ। आई नो … मतलब नाउअडेज़ लॉ स्कूल्स इतने महँगे हैं कि लोगों को लगता है कि बाद में लोन वग़ैरह लेकर करेंगे तो फिर तो यूएस जैसा हो जाएगा। फिर आपको तो कॉर्पोरेट फर्म ही जॉइन करना पड़ेगा तभी आप पैसे पटा पाओगे। लेकिन मैं देखती हूँ हमेशा … जब मैं पढ़ा भी रही थी कि लोग स्टार्ट करते हैं इस चीज़ से कि हम वकालत लोगों के लिए करना चाहते हैं, पर उसको सिरे तक नहीं ले जा पाते।
कुणाल कामरा : सस्टेन नहीं कर पाते।
सुधा भारद्वाज : सस्टेन नहीं कर पाते। बिकॉज़ इट्स वैरी डिफ़िकल्ट फ़ाइनेंशियली एण्ड आई थिंक रियली वी हैव टू थिंक ऑफ़ न्यू मैथड्स कि लिटिगेशन में कैसे लोग रह पाएँगे। ख़ासकर गरीब लोगों की लिटिगेशन में कैसे रहें! इट्स अ चैलेंज … इट्स रियली अ चैलेंज!
कुणाल कामरा : मै’म! थैंक यू सो मच फॉर योर टाइम … थैंक यू सो मच फॉर कमिंग ऑन द शो! आई रियली हैड अ गुड टाइम टॉकिंग टू यू!
सुधा भारद्वाज : थैंक यू!
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