(इप्टा की अनेक इकाइयाँ गर्मी की छुट्टियों में बच्चों और किशोरों के लिए कार्यशाला का आयोजन करती हैं। इनमें छत्तीसगढ़ में रायगढ़ और भिलाई, मध्य प्रदेश में अशोक नगर, छिन्दवाड़ा और उत्तर प्रदेश में आगरा तथा ऊरई में प्रति वर्ष नियमित सैकड़ों बच्चे कार्यशाला में शरीक होते हैं। कई इकाइयों में आज जो कार्यशाला-प्रशिक्षक और संचालक की भूमिका निभा रहे हैं, वे ख़ुद भी इन्हीं कार्यशालाओं के माध्यम से प्रशिक्षित होकर इप्टा के नियमित सदस्य बने हैं। यहाँ प्रस्तुत है रायगढ़ इप्टा द्वारा आयोजित कार्यशाला की रिपोर्ट। यह रिपोर्ट लिखी है रायगढ़ इप्टा की वरिष्ठ सदस्य अपर्णा ने, जिन्होंने कई वर्षों तक लगातार बच्चों की कार्यशालाओं का संचालन कर अनेक नाटक निर्देशित किए हैं।)

जैसे ही गर्मियों की छुट्टियों का आगाज़ होता है, वैसे ही रायगढ़ के नाट्यप्रेमी दर्शकों में सुगबुगाहट शुरू हो जाती है, यह सुगबुगाहट पिछले 30-32 वर्षों से लगातार होती आ रही है। लेकिन यह नाटक देखने की नहीं बल्कि ग्रीष्मकालीन नाट्य शिविर में अपने 5 वर्ष से लेकर 17 वर्ष की उम्र के बच्चों को भेजने की होती है। अभिभावक चाहते हैं कि आज सोशल मीडिया के दौर में किसी तरह उनके बच्चे इससे दूर रहें। ताकि उस समय का उपयोग उन्हें सृजनात्मक बनाने के लिए किया जाए। यह सृजन का काम हमउम्र बच्चों के बीच हो और यह इप्टा के ग्रीष्मकालीन रंग शिविर में हो, इससे बेहतर और क्या हो सकता है। शिविर केवल मनोरंजन के लिए ही नाटक तैयार करने का उद्देश्य नहीं रखता बल्कि बच्चे सामूहिक तौर पर काम करते हुए सामंजस्य स्थापित करना सीखते हैं। साथ ही अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए बच्चों के साथ काम करते हुए सहजता महसूस करते हैं । हालांकि 25-30 दिनों की कार्यशाला में मुश्किल लगता है लेकिन उनमें इसके बीज जरूर डाले जा सकते हैं।
इप्टा रायगढ़ में 33वां ग्रीष्मकालीन नाट्य शिविर एक माह 1 मई से 30 मई तक आयोजित किया गया। अंतिम दिन 31 मई को शिविर में तैयार नाटक-गीत-संगीत और नृत्य का मंचन पॉलीटेकनिक कॉलेज के सभागार में हुआ। इस एक माह में दो जगह शिविर का संचालन हुआ। पहला शिविर रेलवे बंग्लापारा में स्थित विवेकानंद स्कूल में और दूसरा बोइरदादर, मालीडीपा में स्थित प्रज्ञा स्कूल में संचालित हुआ। इन दोनों शिविरों में 5 वर्ष की आयु से लेकर 16-17 वर्ष तक के बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रज्ञा स्कूल में आयोजित ग्रीष्मकालीन शिविर इप्टा और राशू फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।

शिविर में भाग लिए बच्चों की संख्या और उम्र देखते हुए नाटक के साथ लोकगीतों पर नृत्य भी सिखाया गया। पहला समूह लोक नृत्य तमिल भाषा में था। जिसे प्रज्ञा स्कूल के बच्चों ने किया। इस लोकनृत्य को बच्चों ने पूरी ऊर्जा और उत्साह से किया। भाषा भले समझ नहीं आ रही थी लेकिन भाव-भंगिमाओं से उसके भाव को समझा जा सकता था। दूसरा लोकनृत्य राजस्थान से था, जिसे विवेकानन्द स्कूल के बच्चों ने बहुत ही मजे के साथ किया। दोनों नृत्य का निर्देशन इप्टा की प्रेरणा देवांगन ने किया।

दो लोक नृत्यों के प्रदर्शन के बाद नाटक का प्रदर्शन किया गया। जिसमें पहला नाटक नाम में क्या रखा है खेला गया। आधे घंटे का यह नाटक अपने कथानक, अभिनय और निर्देशन में कसा हुआ था। नाटक से जो बात सामने निकल कर आती है वह यह की नाम पहचान देता है, पहचान नहीं बनाता। लेकिन इसे अब सही नहीं माना जा सकता।
नाम में क्या रखा है नाटक में एक बच्चा गोगना अपने नाम को लेकर बहुत परेशान और दुखी रहता था क्योंकि स्कूल और मोहल्ले में सभी उसके नाम को लेकर चिढाते थे। गोगना खराब नाम रखने पर अपनी माँ पर नाराज होता है, माँ उसे नाम बदलने की सलाह देती है। नए नाम की तलाश में इधर-उधर जाने पर उसने पाया कि सब अपने नाम के विपरीत स्वभाव और काम के हैं। उसे तब समझ आ जाता है कि नाम में कुछ नहीं, असल बात जीवन में किया गया काम होता है। आज भले लोगों में नाम बदलकर ट्रेंड में आ जाने का चलन बढ़ा हो लेकिन असली बात नाम के पीछे छुपी है, जो उसकी आदर, स्वभाव और प्रवृत्ति। गोगना को जैसे यह बात समझ आती है, वह अपने नाम के साथ मजे लेना शुरू कर देता है। उसे समझ आ जाता है नाम में क्या रखा है ।

बच्चों में उनके नाम को लेकर जो समझ इस नाटक के माध्यम से बनाई गई, उम्र के लिहाज से भले लोगों को सही लग रहा हो लेकिन देखा जाए तो नाम में ही सब रखा हुआ है। पिछले कुछ वर्षों से लगातार नाम को लेकर अवलोकन करते हुए जातिगत भेद की समझ विकसित हुई। किसी भी उच्च जाति के यहाँ बच्चों के नाम अर्थपूर्ण और सलीके से रखे जाते हैं लेकिन श्रमशील समाज में पैदा हुए बच्चों के नाम ऐसे रखे जाते है हैं, जिन्हें पुकारते हुए भी संकोच होता है। जैसे कल्लू,कूटोना, चमरू, खुखड़ी आदि। इस समाज में भले ही शिक्षा का अभाव लोग कारण बताएं लेकिन यह पूरा सच नहीं है।
नाम रखने को लेकर एक घटना मुझे मालूम है, जिसमें ठाकुर परिवार के घर के बच्चे का जो नाम रखा गया, वही नाम उनके घर काम करने वाले नौकर के अपने बच्चे का भी था, इस बात को लेकर ठाकुर परिवार उस पर हावी हो गया और नाम बदलवाने पर जोर देते हुए कहने लगा कि तुम कैसे मेरे बच्चे जैसा नाम रख सकते हो? यह आज से 3-4 वर्ष पहले की घटना है। इस घटना को देखकर लगा कि उच्च वर्ग काम के साथ नाम पर भी हावी है लेकिन आज बदलाव देखने को मिल रहा है, जो सकारात्मक है। इस दृष्टि से देखा जाए तो स्क्रिप्ट का चयन सही नहीं था और उससे मिलने वाली शिक्षा श्रमशील समाज के लिए ही है। यह नाटक श्रमशील समाज के बच्चों के नाम को लेकर जस्टीफाई कर रहा है।

इस नाटक में भाग लेने वाले बच्चों के नाम गोगना – लक्ष्मी नारायण चौहान, नैरेटर – विश्वजीत साहू और अनंत नंदे, टीचर – आयुष दुबे, मां – प्राची, शेरसिंग – साक्षी मिश्रा, शांतिदेवी -संस्कृति सिंह श्रीवास्तव, पुलिस – कसक बरेठ, चोर –आयुष, भिखारी – यशिका बरेठ, कवि-कृतिका, बाजार वाले – मेघा, योगिता, आर्या, अल्का, सोनल, साक्षी और बच्चे – गौरव, लवी, अनुष्का। इस नाटक के निर्देशन का जिम्मा उठाया शोभा सिंह दाऊ और प्रेरणा देवांगन ने। इसमें सहयोग किया इप्टा के वरिष्ठ और अनुभवी साथी कृष्ण कुमार साव ने। संगीत – गौरव मोड़कर और राजू भैया का । पाठकों की जानकारी के लिए बता दें कि शोभा सिंह दाऊ बाल शिविर की ही उपज है और इंदिरा कला विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से नाटक में एमए करने के बाद इसी विधा में काम कर रही हैं। प्रेरणा देवांगन इप्टा की युवा कलाकार हैं साथ ही अपने नृत्य प्रशिक्षण केंद्र का संचालन भी करती हैं।
शोभा ने जैसा बताया कि नाटक का चयन करना बहुत ही मुश्किल लग रहा था। मैंने और प्रेरणा दोनों ने बहुत सारी पुस्तकें पढ़ीं। पर बच्चों के लायक कुछ अच्छा नहीं मिल रहा था और हमारे पास बच्चे भी कम थे। लगभग एक सप्ताह निकल गया, पर हम कुछ डिसाइड नहीं कर पा रहे थे। जहां हम लोग वर्कशॉप लेते थे, वहीं की लाइब्रेरी से प्रेरणा को बाल भास्कर मिली। जिसमें एक छोटी सी कहानी पढ़ी और उसे पढ़कर लगा कि इस कहानी को बच्चों से करवाया जा सकता है। पर कहानी बहुत छोटी थी। हमने इसे म्यूजिकल बनाने की कोशिश की, कुछ कविताएं जोड़ीं जो यूट्यूब में पीयूष मिश्रा के नाटक में हमने देखी थीं और कहानी को थोड़ा और बढ़ाने के लिए कुछ हास्यप्रद चीज़ें जोड़ीं, जिससे लोगों को देखने में मज़ा आए। इस तरह हमने लगभग 10 दिन में लगभग 17 बच्चो के साथ इस नाटक को तैयार किया।
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शिविर में तैयार दूसरा नाटक विवेकानंद स्कूल में आयोजित शिविर में तैयार करवाया गया। जल,जंगल,जमीन नाम के इस नाटक को इप्टा के पुराने और वरिष्ठ साथी रविन्द्र चौबे ने लिखा। आलोक बेरिया, इमरान खान और अंतिका खान ने मिलकर नाटक का निर्देशन किया। इस शिविर में विभिन्न आयु वर्ग में 6 वर्ष से लेकर के 16 वर्ष तक के 26 बच्चों ने हिस्सा लिया। विवेकानंद स्कूल में आयोजित ग्रीष्मकालीन शिविर में अभिनय, संगीत, गायन, नृत्य एवं पर्सनैलिटी डेवलपमेंट का प्रशिक्षण दिया गया।

शिविर में तैयार किया जल, जंगल और जमीन नाटक आज की स्थिति का सच्चा और दर्दनाक आईना है। विकास के नाम पर आज पूरे देश में आदिवासियों को उनके जल, जंगल, ज़मीन से विस्थापित कर सड़क पर छोड़ दिया जा रहा है। उनके रहने और रोजगार की जगह को छीन कर बड़ी बड़ी खदानें खोदकर तबाही मचाई जा रही है।
नाटक में गाँव वालों के विस्थापन का कष्ट, शासन-प्रशासन से उनकी मांगें, आंदोलन और वर्तमान तंत्र में चल रहे भ्रष्टाचार को बच्चों ने बहुत सजीव तरीके से प्रस्तुत किया। हालांकि इस नाटक को युवा करते तो और अच्छा रहता लेकिन तीन युवा निर्देशकों ने इसे बच्चों के लायक उनके हिसाब से तैयार करवाया। जिस गति से सिस्टम विनाश में लगा है, उसकी जानकारी आने वाले बच्चों को होना बहुत ज़रूरी है क्योंकि वे देश का भविष्य हैं।
प्रकृति की तीन मूल प्राकृतिक धरोहर जल, जंगल,ज़मीन हैं। ये सिर्फ संसाधन नहीं, जीवन का आधार हैं। जल के बिना जीवन संभव नहीं। जंगल हवा साफ करते हैं और धरती का संतुलन बनाए रखते हैं। जमीन हमें अन्न देती है और हर जीव को सहारा देती है। पर आज इनकी स्थिति चिंताजनक है। जल प्रदूषित हो रहा है और भूजल तेजी से घट रहा है। जंगल कट रहे हैं जिससे मौसम बिगड़ रहा है और प्रजातियाँ खत्म हो रही हैं। ज़मीन पर रसायन और प्लास्टिक का बोझ बढ़ रहा है, उसकी उर्वरा-शक्ति कम हो रही है। हम भूल रहे हैं कि ये विरासत हैं, कब्जे की चीज नहीं। अगर इन्हें बचाया नहीं गया तो आने वाली पीढ़ी के पास सिर्फ नाम रह जाएगा।

नाटक के अलावा बच्चों को व्यायाम, जुंबा, नृत्य-संगीत का प्रशिक्षण भी दिया गया, जिसमें मुख्य रूप से नृत्य एवं जुंबा प्रेरणा देवांगन द्वारा, नाटक के साथ उसकी ज़रूरी बातें इमरान आलम खान, आलोक बेरिया एवं अंतिका खान ने सिखाईं । समूह गीत आलोक बेरिया ने सिखाया।
इस शिविर का आयोजन दिनांक 1 मई से 30 मई तक स्वामी विवेकानंद स्कूल बांग्ला पारा रायगढ़ में किया गया। हर वर्ष ग्रीष्मकालीन शिविर के लिए स्थान देने का योगदान विवेकानंद स्कूल की प्राचार्या प्रतिभा सिंह का रहता है। भीषण गर्मी को देखते हुए यह शिविर सुबह 7:00 बजे से लेकर 11:00 बजे तक संचालित किया जाता रहा।
प्रत्येक दिन बच्चों को नए-नए क्राफ्ट कार्य एवं मनोरंजन के लिए ज्ञानवर्धक चीजें उपलब्ध कराई जाती थी | बच्चों को नैतिक शिक्षा एवं शारीरिक शिक्षा का विशेष ज्ञान प्रदान किया गया | मनोरंजन हेतु अंतिका खान द्वारा रेन डांस तथा आलोक बेरिया के द्वारा प्रेरणादायक फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ दिखाई गई |
इस नाटक में परी अग्रवाल और अनुष्का अग्निहोत्री – सूत्रधार थे, यामिनी यादव – नेता, मो. तबरेज़ आलम खान – ऑफिसर, टिया यादव – जंगल/गुंडा, कुमकुम सेन – ठेकेदार, अंशुमन अग्निहोत्री – उद्योगपति, पीयूष अग्रवाल – सेक्रेटरी, शालिनी रात्रे – हवलदार, वर्षा यादव-नदी, प्राची सिंह – ज़मीन, आशीष चौहान – कोटवार, अमन देवांगन – ग्रामीण, शिवांश गुप्ता एवं शिवम् सेन – गुंडा, मौली रात्रे – चपरासी, टिया चौहान – ग्रामीण, कोमल – थानेदार, आराध्या बेरिया – ग्रामीण/पेड़, शौयावी बेरिया- ग्रामीण/पेड़, प्रथा करेलीयाँ – पेड़, शालिनी रात्रे – हवलदार, मीत यादव – ग्रामीण, देवांश चौहान – गुंडा/पेड़ तथा मालविका चौहान ने पेड़ का किरदार निभाया। मेकअप किया था आलोक और अंतिका ने तथा कॉस्ट्यूम इमरान के थे। उल्लेखनीय है कि बच्चों के अभिभावकों ने भी पेड़ आदि बनाने में सहायता प्रदान की थी।

फिल्म निर्माता पवन सिंह को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था | कार्यक्रम के अंत में उन्होंने बच्चों को संबोधित कर उनके काम की प्रशंसा की, साथ ही शिविर निर्देशकों द्वारा तैयार किए गए कार्यक्रमों की तारीफ करते हुए शुभकामनाएँ दीं । कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागी बच्चों को प्रमाण पत्र प्रदान किया गया।
कार्यक्रम का संचालन का दायित्व सृष्टि सिंह, वाणी सिंह और देवयानी श्रीवास्तव ने सम्भाला।
