(आज हमारे देश में जो कुछ भी चल रहा है, उससे हरेक संवेदनशील, विचारशील व्यक्ति बेचैन है। शिक्षा, आर्थिक परिस्थिति, विदेश-नीति, सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक क्षेत्रों में भयानक उथलपुथल से एक तरह की अव्यवस्था और अराजकता चारों ओर व्याप्त है, हिंसा और नफ़रत राज्य का स्वभाव बन गया है। मानव-मात्र की बेहतरी के लिए कृत-संकल्प व्यक्ति और संगठन-संस्थाएँ लगातार इन स्थितियों से उबरने और सकारात्मकता की ओर समाज को मोड़ने का प्रयास कर रही हैं, मगर उनका यह प्रयास समुंदर में एक बूँद की तरह विलीन हो रहा है। उन्नीस सौ चालीस-पचास के दशक में जो सांस्कृतिक उभार आया था, उसकी एक प्रगतिशील सांस्कृतिक राजनीति थी और वह लोगों के दिल-दिमाग़ को रौशन करती थी। आज उस तरह की नीतियाँ असफल साबित हो रही हैं। इसलिए लगता है कि क्या हमें एक बार फिर नए सिरे से प्रगतिशील सांस्कृतिक राजनीति पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए?
प्रवीण नाडकर नव-निर्माण सांस्कृतिक मंच मुंबई के वरिष्ठ विचारक, संस्कृतिकर्मी साथी हैं। उनका प्रस्तुत लेख मराठी में पढ़ा और मुझे लगा कि इसे हिन्दीभाषी साथियों के साथ भी साझा किया जाए, ताकि समविचारी संस्कृतिकर्मी अपनी भावी कार्य-योजनाओं के लिए एक सैद्धांतिक पुनर्विचार की प्रक्रिया से गुजर सकें और इस संक्षिप्त आलेख में प्रस्तुत बिंदुओं पर चर्चा कर उसमें अद्यतन वैचारिक-व्यावहारिक नये आयाम जोड़ सकें। मूल लेखक के सभी विचारों से सहमत न होने पर भी इसके अधिकांश बिंदुओं पर खुली बातचीत की जा सकती है। – उषा वैरागकर आठले)
सांस्कृतिक राजनीति सत्ता, संघर्षों और संस्कृति में हस्तक्षेप की प्रक्रियाओं से संबंधित है। प्रगतिशील सांस्कृतिक राजनीति मूलधारा के सांस्कृतिक अवकाश से वंचित रखे गए, दबाए गए समूहों की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से मूलतः जुड़ी होती है। मुख्यधारा की वर्चस्ववादी राजनीति में कौन-सा कथन (Narrative) वर्चस्व स्थापित करता है, सांस्कृतिक राजनीति इसका विश्लेषण करती है। सांस्कृतिक राजनीति मूल्याधारित और कार्यकर्तावादी होती है। वह सामाजिक आंदोलनों से निकट संबंध जोड़ती है और संस्कृति को भी राजनीतिक संघर्षों की भूमि मानते हुए अपना कार्यक्रम चलाती है।
सांस्कृतिक राजनीति की परंपरा सांस्कृतिक अध्ययन (Cultural Studies) से अत्यंत निकटता से जुड़ी हुई है। सांस्कृतिक अध्ययन एक शैक्षणिक क्षेत्र है, जो संस्कृति का विश्लेषण सत्ता और राजनीति के संदर्भ में करता है। समाज में संस्कृति की भूमिका को समझने की अंतर्दृष्टि सांस्कृतिक अध्ययन प्रदान करता है। विभिन्न सिद्धांतों और विश्लेषणात्मक अनुसंधान पद्धतियों की सहायता से संस्कृति की भूमिका का आलोचनात्मक अध्ययन करने का सांस्कृतिक प्रयास किया जाता है। मीडिया, लोकप्रिय संस्कृति, दैनिक जीवन, अर्थ-निर्माण और उपभोक्तावादी विचारधारा, भाषा, तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में वर्ग, लिंग, नस्ल, जाति आदि सभी विषयों का अध्ययन सांस्कृतिक राजनीति के स्वरूप को निर्धारित करने में किया जाता है।
भारत में पाश्चात्य साम्राज्यवाद के साधन के रूप में :
नवहिंदुत्व के राजनीति-विमर्श को पाश्चात्य सांस्कृतिक राजनीति के एक साधन के रूप में देखा जाना चाहिए। पहली नज़र में नव-हिंदुत्व स्वयं को पश्चिम-विरोधी और राष्ट्रवादी होने का आभास देता है। किंतु, आलोचनात्मक राजनीतिक-अर्थशास्त्रीय तथा सांस्कृतिक अध्ययन के दृष्टिकोण से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि नव-हिंदुत्व की सांस्कृतिक राजनीति अनेक बार पाश्चात्य साम्राज्यवाद के संरचनात्मक हितों के अनुकूल कार्य करती है। इस तरह ऊपरी तौर पर विरोधाभासी प्रतीत होने वाली भूमिका में वैचारिक भ्रम पैदा करने वाली शैक्षणिक प्रस्तुति, वर्गीय विरोधाभासों का अराजनीतिकीकरण तथा नवउदारवादी हितों के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रवृत्ति निहित होती है।
हिंदू धर्म और नवहिंदू धर्म :
हिंदू धर्म के नाम पर सांस्कृतिक राजनीति की इस बदली हुई भूमिका को पहचानने के लिए हिंदू धर्म और नवहिंदू धर्म के बीच का अंतर समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है।
हिंदू धर्म अनेक धार्मिक दृष्टिकोणों के समन्वित रूप में प्रदर्शित होता है; जैसे कि बहुदेववाद, एकेश्वरवाद, सर्वेश्वरवाद, नास्तिकवाद आदि। इसका कोई एक संस्थापक, केंद्रीय धर्म-ग्रंथ या एकीकृत सिद्धांत नहीं है। शिव, विष्णु और दुर्गा जैसी देवताओं की पूजा करने वाली बहुदेववादी परंपराएँ; वैष्णव या शैव धर्म जैसी एक सर्वोच्च देवता पर केंद्रित एकेश्वरवादी भक्ति परंपराएँ; इसके अतिरिक्त अद्वैत और वेदांत जैसी दार्शनिक व्याख्याएँ तथा चार्वाक, सांख्य आदि जैसी वे नास्तिक दार्शनिक प्रणालियाँ, जो ईश्वर को सृष्टि का रचयिता नहीं मानतीं — ये सभी हिंदू परंपरा के भीतर सह-अस्तित्व में विद्यमान रही हैं।
नव-हिंदू धर्म का दृष्टिकोण केवल अद्वैत पर आधारित वेदांतिक भागवत गीता और उपनिषद को हिंदू धर्म का मूलभूत, आवश्यक और एकमात्र सच्चा प्रतिनिधि मानता है। नवहिंदूवाद भारत में नव-औपनिवेशिक शासकों के सहयोग से पाश्चात्य साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा संचालित की जाने वाली एक वर्चस्ववादी सांस्कृतिक परियोजना बनकर रह गया है। नव-हिंदूवाद, हिंदुत्ववाद को आधुनिक प्रौद्योगिकी और पश्चिमी शक्तियों की नवउदारवादी संस्कृति के अनुरूप एक सार्वभौमिक धर्म के रूप में प्रस्तुत करता है। जाति के बारे में उनका दृष्टिकोण हिंदुत्व की पहचान के नाम पर सामाजिक विषमता की वास्तविकता को नकारने का है। इस ब्राह्मणवादी नवहिंदू धार्मिक पुनरुत्थान को आकार देने वाले कुछ सुधारकों में स्वामी विवेकानंद और दयानंद सरस्वती जैसे व्यक्तियों का समावेश है।
नव-हिंदुत्व की सांस्कृतिक राजनीति :
नव-हिंदुत्व के उद्घोषकों ने नव-हिंदुत्व की सांस्कृतिक राजनीति को जन-जन में प्रसारित किया है। संस्कृति कभी भी तटस्थ नहीं होती। अतीत की सांस्कृतिक व्यवस्था को ज्यों-का-त्यों वर्तमान समय में लागू करना संभव नहीं होता। इसीलिए नव-हिंदुत्ववाद ब्राह्मणवाद के नव-औपनिवेशिक राजनीतिक-सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के एक साधन के रूप में कार्य करता है। ग्राम्शी के अनुसार, संस्कृति के माध्यम से — अर्थात मूल्यों, प्रतीकों, मिथकों और विशिष्ट पहचान-आधारित अस्मिताओं की सहायता से — यह सांस्कृतिक वर्चस्व सांस्कृतिक राजनीति के रूप में लागू किया जाता है। नव-हिंदुत्व की सांस्कृतिक राजनीति धर्म को पहचान और अस्मिता के प्रमुख आधार के रूप में पुनर्स्थापित करती है। भौतिक और वर्ग-आधारित अंतर्विरोधों के स्थान पर व्यक्तिगत आकांक्षाओं का उदात्तीकरण करके सभ्य प्रतीत होने वाले सत्तावादी आख्यान खड़े किए जाते हैं। जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्रीय अंतर्विरोधों को दबाकर एकीकृत हिंदू पहचान को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है। यह परिवर्तन साम्राज्यवाद के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि इसके कारण जन-प्रतिरोध खंडित होकर संघर्ष को भटका दिया जाता है, जिससे साम्राज्यवाद को टिके रहने में सहायता मिलती है।
नवउदारवादी वैश्विक पूंजी के अनुरूप नीतियाँ :
राष्ट्रवादी भाषा की खोल में नव-हिंदुत्ववादी शासनकाल में निजीकरण को और अधिक तीव्र किया गया है। नीतिगत क्षेत्रों को पाश्चात्य बहुराष्ट्रीय पूंजी के लिए खोल दिया गया। IMF, विश्व बैंक, WTO जैसी संस्थाओं के साथ संबंध बढ़ाए गए। अमेरिका–नाटो गुट के साथ सैन्य और नीतिगत संबंधों को मजबूत करके, पाश्चात्य दुनिया की भारत पर नई साम्राज्यवादी पकड़ को और गहरा करने में नव-हिंदुत्ववाद ने मदद की। यह मॉडल दुनिया की अन्य दक्षिणपंथी सरकारों जैसा ही है, जो राष्ट्रवादी सांस्कृतिक मुखौटे के पीछे पाश्चात्य साम्राज्यवाद के पिछलग्गू भागीदार के रूप में कार्य करता है।
इस्लामोफोबिया और वैश्विक “आतंकवाद-विरोधी युद्ध” का आख्यान :
9/11 के बाद के पाश्चात्य साम्राज्यवादी आख्यान के साथ नव-हिंदुत्व की सांस्कृतिक राजनीति कई मायनों में गठजोड़ क़ायम करती है। इसके एक समान लक्ष्य इस प्रकार हैं – इस्लाम को सभ्य समाज के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत करना। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पूरे समाज की निगरानी करना, राज्य का पुलिसीकरण और सैन्यीकरण करना तथा राज्य हिंसा का सामान्यीकरण करना। इस वैचारिक संगति के कारण अमेरिका-निर्देशित भू-राजनीतिक (जियो-पॉलिटिकल) ढाँचे में भारत की भूमिका उसके अनुरूप साबित होती है। साथ ही, देश के भीतर की दमनकारी नीतियों को अंतरराष्ट्रीय नीतिगत मान्यता मिलती रही है। इस प्रकार नव-हिंदुत्व की सांस्कृतिक राजनीति वैश्विक साम्राज्यवादी सुरक्षा-संरचना की पूरक सिद्ध होती है।
इतिहास का पुनर्लेखन और संस्कृति का विकृतिकरण :
साम्राज्यवाद की सांस्कृतिक राजनीति इतिहास-स्मृति पर नियंत्रण बनाए रखने पर अमल करती है। हिंदुत्व द्वारा किए जा रहे इतिहास के पुनर्लेखन के माध्यम से किसानों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और महिला आंदोलनों से जुड़ी उपनिवेशवाद-विरोधी परंपराओं को मिटाया जा रहा है। भगत सिंह, आंबेडकर (उनके क्रांतिकारी रूप में) और समाजवादी धाराओं को हाशिए पर धकेला जा रहा है। इतिहास को पूंजीवादी आधुनिकता से भिन्न किसी मिथकीय अतीत के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस प्रकार सांस्कृतिक हस्तक्षेप के माध्यम से साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष के लिए आवश्यक ऐतिहासिक चेतना को कमजोर किया जा रहा है।
वर्ग-संघर्ष और साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष का राजनीतिक दमन :
साम्राज्यवाद का प्रमुख उद्देश्य हमेशा ही वर्ग-संघर्ष को निष्प्रभावी करना और पूँजीवाद-विरोधी तथा साम्राज्यवाद-विरोधी राजनीति को कमजोर करना होता है। नव-हिंदुत्व की भूमिका इसमें सहयोग करने की रही है। नव-हिंदुत्ववादी सत्ता आर्थिक संकटों को सांस्कृतिक रोष में बदल रही हैं। यह पूँजी, कॉर्पोरेट सत्ता या वैश्विक असमानता के बजाय अल्पसंख्यकों को “आंतरिक शत्रु” के रूप में प्रस्तुत करती है। श्रमिक संघों, वामपंथी आंदोलनों, छात्र संघर्षों और किसान आंदोलनों को “राष्ट्रविरोधी” बताकर कमजोर किया जाता है। परिणामस्वरूप साम्राज्यवादी आर्थिक घुसपैठ के विरुद्ध व्यापक जन-आंदोलन की धार कुंद हो जाती है।
इस प्रकार संक्षेप में कहा जा सकता है कि वर्चस्ववादी सांस्कृतिक राजनीति केवल धार्मिक या पहचान-आधारित प्रश्नों तक ही सीमित नहीं रहती; बल्कि वह वैश्विक पूंजीवाद और पाश्चात्य साम्राज्यवाद के साथ समायोजित एक व्यापक राजनीतिक प्रक्रिया के हिस्से के रूप में कार्य करती दिखाई देती है। सत्ताधारियों की वर्चस्ववादी सांस्कृतिक राजनीति संस्कृति, इतिहास और अस्मिता के प्रश्नों को केंद्र में रखकर वर्ग-संघर्ष, सामाजिक न्याय के संघर्ष और साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष को गौण बना देती है। परिणामस्वरूप, समाज के वास्तविक आर्थिक-राजनीतिक प्रश्नों से ध्यान हटकर सांस्कृतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिलता है। इसलिए सांस्कृतिक राजनीति का आलोचनात्मक विश्लेषण करते समय प्रगतिशील शक्तियों के लिए वर्ग, जाति, लिंग और उपनिवेशवाद-विरोधी परंपराओं को जोड़ने वाली व्यापक लोकतांत्रिक और साम्राज्यवाद-विरोधी सांस्कृतिक दृष्टि विकसित करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक आवश्यकता बन गई है।
[28-29 मार्च 2026 के समता संवाद के शिविर के लिए उपरोक्त लेख लिखा गया था।]
