एक ओर देश का स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था और दूसरी ओर द्वितीय विश्वयुद्ध जारी था। इसी बीच ब्रिटिश सत्ता ने देश का अनाज बाहर भेजना शुरू कर दिया। बंगाल में मानव-निर्मित अकाल पड़ा। लोग तड़पने लगे। उनकी सहायता के लिए देशभर के कलाकारों ने चंदा एकत्र किया। उत्तर प्रदेश के वामिक जौनपुरी ने ‘भूखा है बंगाल’ गीत की रचना की। इसी समय 25 मई 1943 को मुंबई में अनेक कलाकार एकत्र हुए और उन्होंने भारतीय जन नाट्य संघ (इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन – इप्टा) की स्थापना की। मारवाड़ी स्कूल के मंच पर नाटक, गीत, नृत्य और संगीत के माध्यम से साम्राज्यवाद, फासीवाद, युद्ध, अकाल, विषमता और देश की स्वतंत्रता के लिए सांस्कृतिक संघर्ष शुरू किया गया। इप्टा का ध्येय वाक्य तय हुआ – ‘जनता इप्टा की नायक है।’ तब से लेकर आज तक इप्टा देश का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन माना जाता है। कला मानव-जीवन के उत्कर्ष के लिए होती है, कला सामाजिक परिवर्तन के लिए भूमि तैयार करती है और कला मनुष्य के मन और मस्तिष्क दोनों को समान रूप से प्रेरित करती है—इप्टा ने इस बात को लगातार सिद्ध किया है।

मुंबई में अनेक वर्षों बाद राष्ट्रीय स्तर पर बहुभाषी नाट्य समारोह मनाया गया। 20 मई से 27 मई 2026 तक ‘जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय नाट्य समारोह’ में नौ राज्यों के 12 नाटक प्रस्तुत किए गए। उल्लेखनीय है कि जितेंद्र रघुवंशी के नाम पर यह नाट्य समारोह इसलिए आयोजित किया गया था क्योंकि 1985 में इप्टा के पुनर्गठन से लेकर 2015 तक संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय बनाए रखने में पूर्व महासचिव जितेंद्र रघुवंशी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इप्टा की राष्ट्रीय समिति के नेतृत्व में मुंबई इप्टा द्वारा कैफ़ी आज़मी और शौकत आज़मी की स्मृति में आयोजित इस नाट्य समारोह में दिल्ली, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और बिहार के नाटक हिंदी, तमिल, मराठी, पंजाबी, ओड़िया और उर्दू में प्रस्तुत किए गए। आदिवासी-दलित-स्त्री समानता, सामाजिक न्याय, सांप्रदायिकता, पर्यावरण, बाज़ारवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसे मुद्दों पर नए नाटक तैयार करने का उद्देश्य इस नाट्य समारोह के केंद्र में था।

समारोह के पहले दिन मुंबई इप्टा ने कुलदीप सिंह और उनके गायक वृंद के साथ ‘वाको नाम कबीर’ गायन का कार्यक्रम प्रस्तुत किया। अतुल तिवारी के संचालन में ‘हमन है इश्क मस्ताना’, ‘साधो जग बौराना’, ‘अनहद का बाजा बाजता’, ‘मन बनिया वंज न छोड़े’ आदि कबीर-पद प्रस्तुत किए गए। उद्घाटन कार्यक्रम में आईं शबाना आज़मी, जिन्हें मुंबई इप्टा के सचिव मसूद अख्तर ने ‘इप्टा की बच्ची’ कहा, यह सुनते ही वे बेहद भावुक हो गईं और बोलीं कि हम इप्टा के लोग कभी एक-दूसरे का धन्यवाद नहीं करते, बल्कि हम कॉमरेड हैं इसलिए एक-दूसरे को गले लगाते हैं। आज सांस्कृतिक ‘स्पेस’ सिकुड़ता जा रहा है, यह सच है, लेकिन हम ऐसी संस्था की मशाल आगे बढ़ा रहे हैं जिसने बुरे दिनों में भी कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। शबाना आज़मी के साथ सभागार में उपस्थित इप्टा की सभी महिला साथियों ने मिलकर इलेक्ट्रिक दिया जलाकर नाट्य समारोह के उद्घाटन की घोषणा की।

इस अवसर पर इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रसन्ना, कार्यकारी अध्यक्ष राकेश वेदा, महासचिव तनवीर अख्तर, सचिव मंडल सदस्य उषा आठले, शैलेंद्र कुमार, मनीष श्रीवास्तव, मसूद अख्तर, संयुक्त सचिव मंडल की सदस्य अर्पिता और वर्षा, कार्यकारी मंडल के सदस्य उपेंद्र मिश्रा, सर्वेश जैन, चारुल जोशी, तल्हा शेख, रजनीश तथा दिल्ली, तमिलनाडु, मुंबई और नासिक के साथी मुंबई के दर्शकों के साथ उपस्थित थे। (विस्तृत रिपोर्ट देखें https://sahayatri.in/wp)

दूसरे दिन जेएनयू दिल्ली इप्टा ने ‘गोह’ नाटक में आदिवासी कवि वंदना टेटे, अनुज लगुन और जसिंता केरकेट्टा की कविताओं पर आधारित प्रस्तुति दी। इसमें आदिवासियों का जीवन, उनकी जल-जंगल-जमीन और सामुदायिकता पर आधारित संस्कृति, उनके मिथक, पर्यावरण तथा स्वयं को बचाने के लिए उनका संघर्ष और उन पर होने वाले राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक आक्रमण को दिखाने का प्रयास जेएनयू इप्टा ने सामूहिक निर्देशन के माध्यम से किया।

इसी दिन तमिलनाडु इप्टा ने ‘उर्यंथा थेरुप्पू’ (बड़ा फैसला) नाटक में विशाल विकास परियोजनाओं के कारण आम नागरिकों को होने वाली परेशानियों, प्राकृतिक संसाधनों पर सामूहिक स्वामित्व के बजाय राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित निर्णय थोपने की नीति और उसके विरुद्ध नागरिकों द्वारा किए जाने वाले प्रतिरोध को आनंद बसु के निर्देशन में कलाकारों ने पूरे प्रेक्षागृह में जुलूस निकालकर गूँजा दिया। (21 मई को मंचित दोनों नाटकों की विस्तृत रिपोर्ट के लिए देखिए – https://sahayatri.in/wp)

तीसरे दिन, नाशिक इप्टा के ‘उपटसुंभ’ (अनधिकृत व्यक्ति ‘घुसपैठिया’) नाटक में मनोरंजन उद्योग की चमक-दमक के आवरण के नीचे छिपी क्रूर वास्तविकता को दिखाया गया था। मायानगरी मुंबई में अलग-अलग गाँवों और शहरों से आने वाले चार लेखक-कलाकारों के संघर्ष और उनके शोषण की भयावह सच्चाई को नाटक में प्रस्तुत किया गया। अनेक स्थानीय संदर्भों, प्रश्नों और घटनाओं के माध्यम से महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजनीति पर उंगली रखने का काम नाशिक इप्टा ने मुकेश काले के निर्देशन में और योगेश गोवर्धने के नाट्यालेख के माध्यम से प्रस्तुत किया। (विस्तृत रिपोर्ट के लिए देखिए – https://sahayatri.in/wp)

समारोह के चौथे दिन कपूरथला पंजाब इप्टा के नाटक ‘कुड़े विच खिडिया गुलाब’ (कचरे में खिला गुलाब) में एक सफाईकर्मी पिता-पुत्र की कहानी दिखाई गई। इसमें वर्ग और वर्ण के चक्रव्यूह में फँसे एक युवा की सफलता को दर्शाया गया था। आरक्षण की बहस का जवाब देने का प्रयास भी नाटक में किया गया है। नाटक डॉ. देविंदर कुमार ने लिखा था और इसका निर्देशन इंद्रजीत रूपोवाली ने किया था।

इसी दिन इंदौर, मध्य प्रदेश का नाटक ‘आजादी के तराने’ भी प्रस्तुत किया गया। जया मेहता और विनीत तिवारी द्वारा गहन शोध के आधार पर लिखे गए इस नाटक में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर 1947 में मिली स्वतंत्रता तक के तीन संघर्षों—चिमूर (महाराष्ट्र), बलिया (उत्तर प्रदेश) और मिदनापुर (बंगाल)—को मुख्य रूप से दिखाया गया था। चिमूर में गाडगे बाबा, बलिया में चित्तू पांडे और मिदनापुर में अनेक क्रांतिकारियों के संघर्ष को मंच पर प्रस्तुत किया गया। इन संघर्षों में सामान्य लोग, विद्यार्थी, किसान, मजदूर और गृहिणियाँ भी बड़ी संख्या में शामिल थे। नाटक के बाद फिल्म निर्देशक आनंद पटवर्धन ने कहा कि, ‘नाटक में यह भी दिखाया गया है कि स्वतंत्रता आंदोलन में कौन शामिल नहीं था!’ नाटक का निर्देशन गुलरेज खान और सारिका श्रीवास्तव ने किया था। (23 मई को मंचित दोनों नाटकों की विस्तृत रिपोर्ट के लिए देखिए – https://sahayatri.in/wp-admin/ – चूँकि यह रिपोर्ट 25 मई को पोस्ट की गई थी, इसलिए इसमें 25 मई 2026 को इप्टा के स्थापना दिवस के झंडोत्तोलन का विवरण भी शामिल है।)

पाँचवें दिन 24 मई को इप्टा लखनऊ ने मध्य युग के चार अलग-अलग प्रांतों की भक्त कवयित्रियों की विद्रोही अभिव्यक्ति को आज के संदर्भ में प्रस्तुत किया था। मीराबाई, अक्का महादेवी, अंडाल और ललद्यद की कविताओं पर आधारित राजेश जोशी द्वारा लिखित ‘सपना मेरा यही सखी’ नाटक में स्त्रियों ने अपने अस्तित्व के लिए कड़ा सवाल करते हुए समाज की परंपराओं और रीति-रिवाजों को ठुकराकर परिवार और समाज से मुँह मोड़ लिया था। वेदा राकेश ने निर्देशन, संगीत और अभिनय-गायन के माध्यम से दिखाया कि विद्रोही स्त्रियों को पितृसत्तात्मक समाज या तो देवी मान लेता है या उन्हें बहिष्कृत कर देता है। एक ‘मनुष्य’ के रूप में कभी भी उनका स्वीकार नहीं करता। अर्पिता द्वारा लिखित विस्तृत रिपोर्ट देखिए – https://padhateseekhate.com/sapna-mera-yahi-sakhi/)

छठे दिन इप्टा का 83वाँ स्थापना दिवस था। सुबह राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष राकेश वेदा, महासचिव तनवीर अख्तर के साथ इप्टा का झंडा फहराकर उपस्थित पंजाब, ओडिशा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व राजस्थान के सदस्य कलाकारों ने जनगीत गाया। पिछले दिन हुए नाटक पर ‘डायरेक्टर्स मीट’ कार्यक्रम में खूब चर्चा की गई। शाम को इप्टा मुंबई की ओर से शुरुआती महान कलाकारों, जिन्होंने फिल्मी दुनिया में भी अपना और इप्टा का नाम रोशन किया, ऐसे बलराज साहनी के जीवन पर आधारित ‘मेरी फिल्मी आत्मकथा’ और चेतन आनंद, विजय आनंद व देवानंद पर ‘आनंद ही आनंद’ संगीत नाटक प्रस्तुत किए गए। पहला नाटक निधिकांत पांडे ने निर्देशित किया था और दूसरा नाटक सोहैला कपूर ने।

सातवें दिन इप्टा ओडिशा (कटक) के ओड़िया नाटक ‘एका नुआ सकलार अपेख्यरे’ (नए सवेरे की आशा में) में दो अलग-अलग विचारधाराओं वाले दो भाइयों की कहानी प्रस्तुत हुई। पिता गांधीजी के सत्य-अहिंसा के मार्ग पर चल रहे थे। उनका एक बेटा भ्रष्ट राजनेता था और दूसरा बेटा सशस्त्र क्रांतिकारी, लेकिन अंततः उन्हें अहिंसा का मार्ग समझ में आता है। नाटक का लेखन डॉ. बिधुभूषण पंडा ने किया था और निर्देशन बिक्रम केसरी जेना का था।

दूसरा नाटक इप्टा राजस्थान (जोधपुर) का कृष्ण चंदर की कहानी पर आधारित ‘थाली में बैंगन’ था। नाट्य रूपांतरण और निर्देशन डॉ. विकास कपूर ने किया था। एक गरीब परिवार की असहायता से उत्पन्न, लोगों की अंधविश्वासी धार्मिक आस्थाओं का सहारा लेकर शॉर्टकट से पैसा कमाने की प्रवृत्ति का इस कथा में मज़ेदार सफर है। लेकिन यह भोली आस्था कब सांप्रदायिकता में बदल जाती है, यह उन्हें स्वयं भी पता नहीं चलता। हास्य-व्यंग्य की शैली में वर्तमान सांप्रदायिकता की ओर इशारा करते हुए नाटक स्पष्ट करता है कि मनुष्य जाति-धर्म के जाल में फँसकर अपने और समाज के जीवन को नुकसान पहुँचाता है। राजस्थानी लोकसंगीत का बीच-बीच में तड़का लगाते हुए हल्के मूड में एक गंभीर समस्या को इस नाटक में उठाया गया था। (अर्पिता द्वारा लिखी गई 26 मई को प्रस्तुत दोनों नाटकों की विस्तृत रिपोर्ट देखिए – https://padhateseekhate.com/natak-kesaath-satat-chalta-darshan/)
आठवें और अंतिम दिन दो नाटक प्रस्तुत किए गए। इप्टा बिहार (पटना) का स्वदेश दीपक द्वारा लिखित और तनवीर अख्तर द्वारा निर्देशित नाटक ‘कोर्टमार्शल’ सबसे ज़्यादा खेले जाने वाले और चर्चित हिंदी नाटकों में गिना जाता है। एक युवा सैनिक अपने एक अधिकारी की हत्या कर देता है और दूसरे को घायल कर देता है। उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। उसका कोर्टमार्शल का मुकदमा चल रहा है। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता जाता है कि उसके अपराध के पीछे वर्ग और वर्ण का वर्चस्ववाद तथा उच्च वर्ग और वर्ण द्वारा लगातार किया जाने वाला क्रूर अमानवीय उत्पीड़न और अपमान है।


दूसरा नाटक था इप्टा मुंबई का सागर सरहदी द्वारा लिखित और रमेश तलवार द्वारा निर्देशित ‘हम परवाने’। शहीद अशफाकुल्लाह खान वारसी और रामप्रसाद बिस्मिल की धर्मनिरपेक्ष देशभक्ति का उदाहरण प्रस्तुत करने वाला यह नाटक प्रसिद्ध काकोरी कांड में सरकारी खजाना लूटने के अपराध के लिए फांसी की सज़ा पाए अशफाकुल्लाह खान के जेल जीवन की झलक दिखाता है। (27 मई को प्रस्तुत दोनों नाटकों की विस्तृत रिपोर्ट के लिए देखिए – https://sahayatri.in/wp)

इप्टा के जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय बहुभाषीय नाट्योत्सव का समापन करते समय कार्यकारी अध्यक्ष राकेश वेदा, महासचिव तनवीर अख्तर, इप्टा मुंबई की अध्यक्ष सुलभा आर्य और सचिव मसूद अख्तर ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। मुंबई जैसे भागदौड़भरे जीवन में और सांस्कृतिक आंदोलन की लंबी परंपरा से समृद्ध महानगर में इप्टा मुंबई द्वारा पूरे आठ दिनों का नाट्य समारोह आयोजित करना सराहनीय है। मसूद अख्तर और चारुल जोशी जैसे वरिष्ठ कलाकारों के साथ-साथ मुंबई और नासिक इप्टा के युवा कलाकारों ने काफी मेहनत कर एक बड़े बहुसंवाद आयोजन को ज़मीन पर साकार किया। इसमें शबाना आज़मी ने पूरे समारोह के आयोजन के लिए ‘कैफी और मैं’ नाटक के दो प्रयोग किए और अन्य प्रसिद्ध कलाकारों ने आर्थिक सहायता प्रदान की। साथ ही इप्टा मुंबई के वरिष्ठ निर्देशक रमेश तलवार, संगीत निर्देशक कुलदीप सिंह, अभिनेता अंजन श्रीवास्तव, सुलभा आर्य और अन्य सभी वरिष्ठ और युवा सदस्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। मैसूर एसोसिएशन माटुंगा ने पूरे आठ दिनों तक सभी गतिविधियों के लिए भरपूर सहयोग किया।

नाट्य-प्रस्तुतियों के अलावा महत्त्वपूर्ण गतिविधियाँ :
इप्टा के इस नाट्योत्सव में सिर्फ नाटकों का मंचन ही नहीं हुआ, बल्कि हर दिन सुबह पिछले दिन हुए नाटकों पर निर्देशक-कलाकार और दर्शक ‘डायरेक्टर्स मीट’ के तहत खुलकर चर्चा करते थे। नाटक की स्क्रिप्ट और मंचन के सभी पहलुओं पर हर उपस्थित व्यक्ति अपनी राय व्यक्त करता था। इसमें बड़ी संख्या में युवा रंगकर्मी और वरिष्ठ रंगकर्मी-विचारकों के बीच खुला संवाद हुआ। इसके साथ ही राकेश वेदा ने अपने तीन नए नाटकों का तीन दिन पाठ किया, उन पर भी चर्चा की गई। झारखंड के कॉमरेड शैलेंद्र कुमार प्रति दिन नए-नए वैचारिक और कलात्मक पहलुओं पर प्रकाश डालते रहे।

प्रसन्ना की अभिनय कार्यशाला :
21 मई को इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विख्यात निर्देशक प्रसन्ना ने अभिनय कार्यशाला लेकर युवाओं से संवाद करने की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने श्रम और कला के समन्वय के लिए छोटे-बड़े समुदाय बनाने और गाँव के समुदायों के साथ काम करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनका कहना है कि इसके बिना हम अपने सांस्कृतिक दायरे में लोगों को शामिल नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा ‘लोगों के लिए रची गई कला’ लोगों से दूर होती जा रही है। (अर्पिता द्वारा लिखित विस्तृत रिपोर्ट देखिए – https://sahayatri.in/2026/05/manoranjan-ka-sadhan-ban-gai-hai-reel/)

समूचे समारोह के दौरान प्रेक्षागृह के बाहर इप्टा के 83 वर्ष के सफर की तस्वीरें और चारुल जोशी द्वारा तैयार की गई पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई थी।

काफी वर्षों बाद इप्टा के विभिन्न राज्यों के विभिन्न भाषाई कलाकारों के समूह ने एक साथ आकर मुंबई के दर्शकों के साथ लगातार आठ दिनों में बारह नाटकों के प्रयोग किए और देखे, आपस में खूब चर्चा की और इप्टा के सांस्कृतिक आंदोलन की मशाल आगे कैसे ले जाई जा सकती है, इसकी रूपरेखा भी तैयार की।
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