
हिन्दी एवं मराठी सिनेमा और रंगमंच की ग्लैमर नगरी के रूप में मुंबई युवाओं को आकर्षित करती है। मुंबई के कुछ इलाक़े अपनेआप को बड़े-छोटे पर्दे पर छा जाने की चाह लिए युवाओं के निवास-स्थान हैं। ये ‘स्ट्रगलर्स’ के रूप में जाने जाते हैं। इस विषय पर कई फ़िल्में बन चुकी हैं, कई नाटक लिखे और खेले गए हैं। रंगमंच के अभिनेता और फ़िल्म के अभिनेता, लिखित अभिजात्य साहित्य के लेखक और फ़िल्मों के पटकथा लेखक के अलावा फ़िल्म इंडस्ट्री में किसी भी रूप में प्रवेश करने के इच्छुक लोगों की संख्या बहुत बड़ी है। इनकी आँखों में सुनहरे सपने होते हैं, दिलों में अरमान परन्तु वास्तविक रोज़मर्रा जीवन में निराशा, उपेक्षा, अपमान या खोखले मीठे आश्वासनों की चाशनी में लिपटा हुआ कई प्रकार का शोषण होता है। इसी तरह की समस्याओं पर केंद्रित नाटक इप्टा नाशिक ने 22 मई 2026 को प्रस्तुत किया।
इप्टा द्वारा आयोजित जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय नाट्य समारोह में 22 मई 2026 को मैसूर एसोसिएशन प्रेक्षागृह में योगेश गोवर्धने लिखित तथा मुकेश काले निर्देशित इप्टा नाशिक का मराठी नाटक ‘उपटसुंभ’ मंचित किया गया। यह एक राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पाखंडभरी दुनिया की कई समस्याओं से टकराता हुआ नाटक है। इसकी कहानी में विभिन्न स्थानों से मुंबई आए हुए प्रमुख चार पात्र हैं, जो एक कमरे में एक साथ रहते हुए रंगमंच और फ़िल्मी दुनिया में संघर्ष कर रहे हैं। लालू महाराष्ट्र-आंध्र सीमावर्ती स्थान से, प्रणिल नाशिक से, तेजस नौकरी और अभिनय दोनों क्षेत्रों में हाथ-पाँव मार रहा है तथा सत्या, जो एक छोटे शहर का लेखक है, फ़िल्म इंडस्ट्री में पटकथा लेखक बनने का इच्छुक है। वे मिलकर संघर्षरत कलाकारों के लिए एक सहायता समूह का गठन करते है, जिसका नाम है – ऑल इंडिया स्ट्रगलर्स एसोसिएशन – आईसा AISSA ।

तीन अभिनेताओं और एक लेखक के परस्पर संबंध, संघर्ष, सहानुभूति और जुड़ाव की वास्तविक कहानी के समानांतर एक प्रकार के जादुई यथार्थवाद की सृष्टि करते हुए संवादों, गतियों और प्रकाश-ध्वनि की सहायता से समस्या को उभारने की कोशिश की गई। उनका दैनिक जीवन ऑडिशन, अस्वीकृति, छोटे-मोटे काम और लगातार आर्थिक दबाव के चक्र में फंसा रहता है। वे ताश खेलते हैं, इस बात पर बहस करते हैं कि अमिताभ बच्चन या नसीरुद्दीन शाह में से कौन बेहतर अभिनेता है, और दारू पीते हुए उस दिन का सपना देखते हैं जब वे सफलता हासिल करेंगे। जब मनोरंजन उद्योग की दीवारें टूटेंगी, जो भाई-भतीजावाद, संपर्कों, पैसे और समझौता करने की इच्छा पर खड़ी हुई हैं।

नाटक की विशेषता या कमज़ोरी यह थी कि उसकी कहानी और पात्रों का ग्राफ़ एक अंतहीन घेरे में घूमता रहता है। कथ्य के स्तर पर अनेक समस्याओं को समेटने की चाह लेखक में दिखती है, मगर प्रस्तुति के स्तर पर वह अनेक गुंजालकों में फँस जाता है। एक क्राइम मास्टर इनकी ज़िंदगी में दस्तक देता है, वहीं नाटक के उत्तरार्ध में एक रहस्यमय व्यक्ति, जिसका मूल मंत्र ‘चिपके रहो’ है, अपनी विचित्र वेशभूषा और दिलचस्प आंगिक गतियों के साथ अनेक सवाल उछालता है, सामयिक टिप्पणियाँ करता है, व्यंग्य-बाण फेंकता है, परंतु पात्रों की समस्याओं के समाधान प्रस्तुत नहीं करता। वह बार-बार उलझता है, लपेटता है और चौंकाता है, मगर उसका नाटक की कथा की मूल समस्या में कोई योगदान नहीं दिखाई देता।

लेखक-निर्देशक ने नाटक में मराठी रंगमंच और फ़िल्मों के अनेक लोकप्रिय पात्रों का, प्रस्तुति-शैलियों का, पैटर्न्स का, मुहावरे का, रूपकों का उपयोग किया है, मगर उनकी परस्पर एकसूत्रता स्पष्ट नहीं होती। और नाशिक से जुड़े दादासाहेब फाल्के, कुसुमाग्रज जैसी महान हस्तियों की विरासत का उल्लेख किया है, मगर क्या ये बातें सिर्फ़ अस्मितामूलक भावनात्मकता को व्यक्त करती हैं? समूचे नाटक की यह कमज़ोरी रही कि नाटक आख़िर क्या कहना चाहता है, इसके इर्द-गिर्द झूलता रहता है। सभी कलाकारों के बेहतरीन अभिनय और कई दिलचस्प संवादों और दृश्यों के बावजूद नाटक की सोद्देश्यता भूलभुलैया में पड़ी दिखती है।
इसके बावजूद इप्टा नाशिक की इस बात के लिए सराहना करनी होगी कि उन्होंने सामूहिक रूप से कुछ दिलचस्प रचने की कोशिश की है। एक नई स्क्रिप्ट लेकर कुछ नया प्रस्तुत करने की कोशिश की है। युवा कलाकारों और युवा सपनों के मनोरंजन उद्योग के ग्लैमर में फँसने की दास्तान पेश करना, इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रसन्ना के इस वक्तव्य को रेखांकित करना है कि, “ये युवा गहरे और व्यक्तिगत रूप से अपनी भावनाएँ व्यक्त करना चाहते हैं। वे अभिनेता, गायक, नर्तक, लेखक — कुछ भी बनना चाहते हैं। लेकिन उनमें एक चीज़ की कमी है — सच्ची क्रिया।”


मंच पर अभिनय कर रहे थे – नीलेश सूर्यवंशी, विनीत पंडित, अजय तारगे, प्रतीक नायक, अतुल गायकवाड़, गौरी तिड़के, चेतन बर्वे, मानस मोर, स्वरूप पिसे। प्रस्तुति प्रमुख थे तल्हा शेख़ और मुक्ता, संगीत था सचिन राहने का, प्रकाश परिकल्पना एवं संचालन – मुकेश काले, रूपसज्ज़ा – ललित कुलकर्णी, वेशभूषा कविता देसाई की थी।

इप्टा द्वारा आयोजित जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय नाट्य समारोह में 24 मई 2026 को मैसूर एसोसिएशन प्रेक्षागृह में इप्टा लखनऊ का चार भारतीय संत कवयित्रियों पर केंद्रित राजेश जोशी लिखित नाटक ‘सपना मेरा यही सखी’ शाम 7 बजे से होगा। इसी तरह 25 मई को बलराज साहनी और आनंद बंधुओं पर केंद्रित दो नाटक होंगे – ‘मेरी फ़िल्मी आत्मकथा’ तथा ‘आनंद ही आनंद’ – क्रमशः 6 और 8.30 बजे। टिकट प्रेक्षागृह पर उपलब्ध होंगे।
