
(आँख खुलते ही इप्टा के साये में पलने-बढ़ने वाले जितेंद्र रघुवंशी ने न केवल 1985 में इप्टा के पुनर्गठन में सक्रिय भूमिका अदा की, बल्कि बाद में अनेक वर्षों तक राष्ट्रीय महासचिव का कार्यभार सम्हालते हुए देश भर की अनेक राज्य इकाइयों को सक्रिय किया, अनेक युवा रंगकर्मियों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं को इप्टा से जोड़ा। 07 मार्च 2015 को अपनी अंतिम साँस लेने तक उनकी प्राथमिकताओं में इप्टा को अधिक से अधिक सक्रिय और समसामयिक रूप से जन-प्रतिबद्ध बनाने की धुन सवार थी। इप्टा के पूर्व महासचिव राकेश ने उनको याद करते हुए लिखा था कि “1985 में आगरा में इप्टा के पुनर्गठन के बाद हर सुबह 7.30 से 8 के बीच मेरा फ़ोन बज उठता था (तब मोबाइल नहीं थे, सिर्फ़ लैंडलाइन ही मौजूद थे) और उधर से आवाज़ आती थी, “हाँ साहब!” उसके बाद इप्टा या फिर समसामयिक सामाजिक-राजनैतिक मसलों पर चर्चा शुरू हो जाती। दूसरी ओर से आने वाली यह आवाज़ होती थी जितेंद्र रघुवंशी की।” कहानीकार और नाट्य समीक्षक हृषिकेश सुलभ ने उनके सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित करते हुए कहा था, “सिर्फ़ नाटक करना, गीत गाना, कहानी लिखना ही संस्कृतिकर्म नहीं है, बल्कि दूसरों के लिए उम्मीद बनना भी संस्कृतिकर्म है। विगत दो-तीन दशकों से इप्टा का नेतृत्व कर रहे जितेंद्र रघुवंशी इसी तरह का संस्कृतिकर्म कर रहे थे। उन्होंने करोड़ों हिंदुस्तानियों को अपने सपने, अपने जीवन को नाटक-गीत-संगीत के माध्यम से देखने, सोचने और करने का एक मंच ‘इप्टा’ दिया; यही उनका संस्कृतिकर्म है।” (इप्टानामा, 14 मार्च 2015 से साभार)


जितेंद्र रघुवंशी न केवल रंगकर्मी और संगठनकर्ता थे, बल्कि वे एक रचनाकार, अनुवादक और विचारक भी थे। उनकी कई रचनाओं और उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित संस्मरणों को आगरा के रंगकर्मियों ने ‘शब्द रहेंगे साक्षी : जितेंद्र रघुवंशी’ शीर्षक से पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया गया था। जिसके संरक्षक थे डॉ हरिवंश चतुर्वेदी तथा संपादन किया था नवाब उद्दीन, प्रमोद सारस्वत तथा डॉ विजय शर्मा ने।


पुस्तक के शुरुआती परिचयात्मक पृष्ठों के फोटो अर्पिता श्रीवास्तव के सौजन्य से यहाँ साझा किए जा रहे हैं।


साथ ही उनकी स्मृति में अनेक लेख ‘इप्टानामा’ (संपादक – दिनेश चौधरी) की इस लिंक पर पढ़े जा सकते हैं – https://iptanama.blogspot.com/2015/03/

आज जितेंद्र रघुवंशी का 75 वाँ जन्मदिन है। उन्हें सलाम करते हुए, उनकी जीवनसाथी भावना जी के सौजन्य से उनकी वैश्विक परिदृश्य पर रची गई एक प्रेम कहानी ‘पुल’ प्रस्तुत है।)
पुल
यूरोप और एशिया – हमारी पृथ्वी के दो महाद्वीप अपना-अपना इतिहास, संस्कृति और जीवन-पद्धति। शायद इसीलिए अंग्रेज़ी कवि रूडयार्ड किपलिंग ने नकार ही दिया कि पूर्व और पश्चिम कभी मिल सकते हैं। इन दो सभ्यताओं का मिलन उन्हें ऐसा लगा जैसे धरती और आसमान मिलना यानी एक असंभव परिकल्पना!
लेकिन भूगोल भी तो कोई सत्य है। विशाल युराल पर्वत श्रृंखला इन दो महाद्वीपों की सीमा-रेखा है और मैग्निटोगोर्स्क का पुल एशिया और यूरोप को जोड़ता है। इस पुल पर एशियाई लड़का और यूरोपियन लड़की साथ-साथ टहलते निकल आए थे। चाहें तो उनके कुछ नाम भी रख सकते हैं, जैसे – रवि और आन्ना।
तो पुल के यूरोप वाले हिस्से में खड़े रवि और आन्ना बतिया रहे थे।
आन्ना ने शंका की, “लेकिन ज़िंदगी को पीछे तो नहीं लौटाया जा सकता।”
“कैसी मूर्खतापूर्ण बात है”, लड़का क्षोभ से भर उठा था, “कि आगे जो कुछ होना है वह इस बात पर निर्भर करता है कि कल क्या था, आज क्या है। नहीं, मैं ऐसा जीवन नहीं चाहता। मैं अभी जीना चाहता हूँ। मैं थक गया हूँ। मैं सोच-सोचकर थक गया हूँ – यह नहीं, वह, वह नहीं कुछ और। लो, मैंने हाथ फैला दिए हैं। आओ। मैं सब कुछ भूल सकता हूँ। भूल सकता हूँ कि कोई और आस-पास है। कुछ और आगे-पीछे है।”
चारों ओर बर्फ़ बिछी थी। हल्की धूप में हिम-बिंदु ऐसे चमक रहे थे, जैसे अमावस की रात में चाँदनी छिटक रही हो। नंगे वृक्षों की सूनी डालियों पर बर्फ़ के फूल उगे थे, पुल के नीचे बहने वाली पतली नदी की सारी जल-राशि जमकर ठोस हो गई थी और शिशिर वय की प्रकृति में सिर्फ़ फर की नुकीली पत्तियाँ अपने अस्तित्व का पता देती थीं।
लड़की सुनकर स्थिर रही। लड़के ने उसकी ओर कदम बढ़ाया, “यहाँ केवल मैं और तुम हैं। केवल मैं और तुम।”
लड़की ने आहिस्ता से कहा, “सिर्फ़ अभी जीने की जवाबदेही नहीं करनी होती।”
“मैं तुम्हें हर जवाबदेही से मुक्त करना चाहता हूँ।” लड़का गर्व से भर उठा।
“मैं मुक्त होना नहीं चाहती।” आन्ना ने विनय की।
रवि ने घोषणा की, “तुम कितनी पिछड़ी हुई हो।”
“और तुम?” आन्ना ने आपत्ति की।
“मैं, मैं, मैं, …” रवि अटक गया।
“तुम्हारी भाषा में सिर्फ़ एक ही सर्वनाम है – मैं।” आन्ना को हँसी आ गई।
“नहीं, एक और भी है – तुम।” रवि ने मौक़ा नहीं खोया।
“और – ‘वह’?”
“ओफ़, फिर वही ‘वह’। मैं हर मूर्त्त-अमूर्त्त ‘वह’ से नफ़रत करता हूँ।” लड़का झुँझलाने लगा था।
दरअसल, ‘वह’ नाम का तृतीय पुरुष वह आक्रामक शक्ति है, जो ‘मैं’ और ‘तुम’ के हर सामंजस्य की विरोधी है। यह आक्रामक शक्ति सार्वभौमिक भी है और सार्वकालिक भी। अलग-अलग रूप रखकर ‘वह’ हर कहीं और हर समय मौजूद रहता है। इस पुल के नीचे वह बारूद के पलीते के रूप में सुलग रहा था पर युराल इससे अनजान था।
“रवि, रवि।” आन्ना ने स्नेह से लड़के को पुकारा। वह शांत हो गया।
“मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।”
“शायद मैं भी।”
“लड़कियाँ स्वीकारोक्ति में बड़ी कंजूस होती हैं।”
“लड़के अतिशय उदार।”
“मैं तुमसे रोज़-रोज़ मिलना चाहता हूँ।”
“तुम्हें मालूम है, मेरी कहीं और शादी होने वाली है।”
“मुझे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।” रवि ने दृढ़ता से कहा।
“क्या करूँ? तुम्हारे पास से जाती हूँ तो ग़ुस्सा आता है कि तुम क्यों नहीं समझते। या कभी-कभी तुम लोग समझकर भी नहीं समझना चाहते।” वह दुःखी थी।
“यही समझ लो।” रवि ने कोमलता से उसका चेहरा हाथों में भर लिया। अपना चेहरा आगे बढ़ाया तो आन्ना ने गर्दन दूसरी ओर कर ली।
“मूर्ख!” रवि ने मन में सोचा लेकिन प्रकट में कहा, “प्रिये!”
आन्ना ने गर्दन वापस घुमा ली।
लड़के ने आख़िरी अस्त्र चलाया। उसकी आँखों में प्रवेश कर कहा, “वीनस!”
लड़की ने दोनों हाथों से चेहरा ढाँप लिया।
…
थोड़ी देर बाद भी पुल वही पुल था। एशियाई लड़का रवि और यूरोपियन लड़की आन्ना एशिया की ओर बढ़ रहे थे।
“हम-तुम कितने भिन्न हैं?” आन्ना देर तक सोचने के बाद बोली।
“फिर भी कहीं कोई संस्पर्श बिंदु तो है।” रवि ने कन्विंस करने की कोशिश की।
“है तो!” आन्ना सहमत हो गई। पूछा, “यूरोप और एशिया एक दूसरे से बहुत भिन्न हैं। तुम तो दोनों को जानते हो।”
“ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है।” लड़के को किपलिंग याद आ गया।
आन्ना ने चारों ओर दृष्टि फैलाई, “आजकल प्रकृति कितनी जड़-सी है। तुम्हारे यहाँ खूब सूरज चमकता होगा। मुझे सूरज अच्छा लगता है।”
“उगते और डूबते समय मुझे भी सूरज बुरा नहीं लगता। लेकिन दिन में …” रवि स्मृति-मात्र से झुलसने लगा।
आन्ना ने ध्यान से सुना।
“हमारे यहाँ बहुत ग़रीबी है। गंदगी है।”
“तुम्हारे यहाँ कितनी सुंदर इमारतें हैं – दुनिया के इतिहास में झाँक लो।”
“हमारे लोग बहुत दुःखी हैं।”
“सामाजिक व्यवस्था का प्रश्न है। यूरोप में भी तो फ़र्क़ है।”
“कुल मिलाकर मुझे तुम्हारा वाला यूरोप पसंद है।”
“और हमारे यहाँ उभरता टुटपुँजियापन? तटस्थता-निरपेक्षता का भाव?” आन्ना ने सवाल किया।
“नहीं, वह नहीं।” रवि ने उत्तर दिया।
“हम अपनी सांस्कृतिक विरासत खोज रहे हैं।” आन्ना कह रही थी, “तुम कैसी सम्पदा के धनी हो?”
“हम एक साथ कई सदियों में जी रहे हैं। इसका अभिशाप जानती हो?”
“हाँ, समय की दौड़ में तुम लोग ज़रूर पिछड़ गए हो।”
“हम उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं,” रवि के स्वर में व्यंग्य था, “तुम इतिहास की बात करती हो, वे भविष्य की। और वर्तमान?”
“उसी वर्तमान में से तो भविष्य जन्म लेगा।”
“तालियाँ … तालियाँ!” रवि क्षोभ से भर उठा। सामने पड़े कंकड़ को उसने ज़ोरों से ठोकर लगाई, “मैं तो उस भविष्य में नहीं होऊँगा। मेरी नियति तो इसी वर्तमान को ढोने की है। कल चाहे सबको केक खिलाना, लेकिन बच्चे को इस वक्त रोटी की ज़रूरत है। इस वक्त। ख़ास बात यह है।”
“रवि, रवि!” आन्ना ने रुककर स्नेह से लड़के का नाम पुकारा। उसका हाथ अपने हाथ में लेकर झुलाने लगी, “तुम्हारे यहाँ खूब फूल होते होंगे – बारहों महीने।”
“हाँ, लू वाली गर्मी में भी लाल गुलमोहर और अमलतास देखोगी तो ठगी रह जाओगी।”
“मैं जब भी तुम्हारे यहाँ के बारे में सोचती हूँ, मुझे सब सुंदर-सुंदर लगता है।”
“सुंदरता है हमारे यहाँ। पर केवल वही नहीं है।” रवि बोला।
“तरक़्क़ी है हमारे यहाँ। पर केवल वही नहीं है।” आन्ना का उत्तर था।
उन्होंने एक दूसरे की ओर देखा।
पुल के नीचे पड़ी बारूद सुलग रही थी। इस प्रेमी युगल को कहाँ मालूम था कि कभी भी धमाका हो सकता है और न उनका निशान बाक़ी बचेगा, न इस पुल का, जो दो महाद्वीपों को जोड़ता है।
आन्ना और रवि – विशाल मानवता के दो आम बच्चे अपने में व्यस्त थे।
दोपहरी ढलने लगी थी। लेकिन उनके लिए समय रुक गया था और भूगोल की कोई सीमा न थी।
“मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।” रवि बोला।
“शायद मैं भी।” बिना रुके आन्ना ने भी कह दिया।
“कंजूस!”
“अतिशय उदार!”
रवि ने कहा – “तुम और मैं साथ हैं – यह सुख नहीं है? बड़े सुख के इंतज़ार में छोटी-छोटी ख़ुशियों को क्यों ठुकरा दें? कुछ और के बारे में क्यों सोचें?”
आन्ना ने उसके गले में बाँहें डाल दीं, “इस समय तो तुम सोच रहे हो।”
लड़का सब कुछ भूल गया था। उसने कोमलता से लड़की का चेहरा अपने हाथों में भर लिया – आँखें बंद कर लीं और धीरे से फुसफुसाया, “वीनस!”
लड़की उसके अंक में गिर गई।
दोनों पुल के बीचों-बीच पहुँच गए थे।
“अरे, मेरे हाथों में तुम्हारी सुगंध भर गई है।” रवि अचरज से भर उठा।
“कैसे नयी-नयी बातें सोच लेते हो!”
“नहीं, मैंने सोचकर नहीं कहा।” रवि सफ़ाई देने लगा।
“मैंने तो यों ही कहा।” आन्ना उदास हो गई।
“तुम्हारी आँखों में कितना अवसाद है। मैंने इतनी उदासी कभी नहीं देखी।“
“मैं तुमसे वादा नहीं कर सकती कि सब ठीक होगा।”
“तुम पर सफ़ेद रंग खूब जमता है।”
“सच!” लड़की ने मुस्कुराने की कोशिश की, “दसवीं क्लास में एक लड़का भी यही कहता था।”
“क्या?”
“यही कि सफ़ेद रंग …”
“एक बात बताऊँ?”
“बताओ।”
“मेरे पड़ोस की एक लड़की भी जब ग़ुस्सा होती थी, तुम्हारी तरह मेरा नाम पुकारती थी।”
“और तुम शांत हो जाते थे।”
दोनों खूब हँसे।
लड़की देर तक खिलखिलाई, “ऐसा करते हैं, दोनों को मिलवा देते हैं।”
“तुम्हारे वाले लड़के और मेरी वाली लड़की को।” दोनों फिर ज़ोरों से हँस पड़े।
आन्ना बोली, “इसका मतलब सब जगह एक से लोग हैं – यूरोप, एशिया …”
“अफ़्रीका – अमेरिका”
“एक-सी बातें – एक-से सपने”
“एक सी जटिलताएँ …”
“यही तो संस्पर्श-बिंदु हुआ – एक से।”
“लेकिन मैं इस ‘एक-से’ के लिए भावी परिस्थितियों का इंतज़ार नहीं करना चाहता। कभी कोई सिरफिरा बटन दबा देगा और दुनिया राख का ढेर हो जाएगी।”
“मैं भी इंतज़ार नहीं करना चाहती। लेकिन …”
“यही ‘लेकिन’ तो ‘वह’ प्रतीक-चिह्न है। ‘वे’ हर बार इसी ‘लेकिन’ को खड़ा कर देते हैं। ‘वे’ ‘एक-सा’ नहीं चाहते।”
“नहीं चाहें।” आन्ना के स्वर में दृढ़ता थी।
रवि का हाथ पकड़कर बोली, “चलो नाचें।”
“यहाँ पुल पर?”
“क्यों क्या हुआ?”
“मुझे नाचना नहीं आता।” लड़के ने हाथ छुड़ा लिया।
“एशियाई विनम्रता! ठीक तो नाचते हो।”
“तुम सुंदर नाचती हो।”
“मुझे नाचना अच्छा लगता है।”
लड़की ने आग्रह किया, “आओ, बॉल नाचें।”
“मुझे सचमुच बॉल नहीं आता।”
“मैं सिखाती हूँ। आओ।”
लड़के ने उसके श्वेत परिधान पर नज़र डाली। दिमाग़ में सोचा – विवाह में वह सफ़ेद ही तो पोशाक पहनेगी – किसी और के लिए!
“लो मैंने हाथ फैला दिये हैं – मैं सब कुछ भूल सकती हूँ।” लड़की कह रही थी, “भूल सकती हूँ कि कोई और आसपास है … कुछ और आगे-पीछे है।”
लड़की ने एक हाथ लड़के के कंधे पर रख दिया, दूसरे में उसका हाथ थाम लिया। लड़के ने ख़ाली बचा हुआ हाथ उसकी कमर पर रख दिया।
लड़की गुनगुनाने लगी, “प र र र प र र र, प र र र प र र र …”
लड़का भी गा उठा था – “प र र र प र र र, प र र र प र र र …”
“कंजूस”
“अतिशय उदार”
“प र र र …”
“प र र र …”
“वीनस!”
“प र र र प र र र, प र र र प र र र …”
यह मैग्निटोगोर्स्क का पुल था। उसके बीचों-बीच यूरोपियन लड़की और एशियाई लड़का नाच रहे थे।
‘वह’ आक्रमण की मुद्रा में था।
भयानक विस्फोट हुआ। धरती दहल गई, नंगे वृक्षों पर बर्फ़ के फूल काँप गए, पतली नदी की हिम-राशि चटक गई। पुल के परखच्चे उड़ गए थे। पुल जो दो महाद्वीपों को जोड़ता था, पुल जो दो इतिहासों और सभ्यताओं के जीवंत संवाद का साथी था।
लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि यूरोपियन लड़की आन्ना और एशियाई लड़का रवि शवों के ढेर में नहीं बदले। वे दोनों ऊपर उठने लगे जैसे उड़ रहे हों। न अब ज़मीन थी, न आसमान। अनन्त आकाश में एक जोड़ा नर्तन कर रहा था। दो जोड़ी हाथ एक दूसरे को थामे हुए थे। हाथों का यह पुल अखंडित था।
विस्फोट ज़रूर बंद होंगे। बारूद ज़रूर धूल बनेगी। हाथों का यह पुल ज़रूर धरती पर अवतरित होगा।
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