
मुंबई में आयोजित जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय बहुभाषीय नाट्य समारोह के दूसरे दिन 21 मई 2026 को दो नाटकों का मंचन हुआ। मंचन से पहले इप्टा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष राकेश वेदा ने पूर्व महासचिव जितेंद्र रघुवंशी, जिनकी स्मृति में यह राष्ट्रीय नाट्य समारोह आयोजित किया जा रहा है, के बारे जानकारी प्रदान की। जितेंद्र रघुवंशी एवं उनके पिता राजेंद्र रघुवंशी ने सपरिवार किस तरह 1985 में दोबारा इप्टा को राष्ट्रीय स्तर पर पुनर्जीवित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की, इसे रेखांकित किया।
पहला नाटक था जेएनयू दिल्ली इप्टा का ‘गोह’। जल-जंगल-ज़मीन और उनसे जुड़े आदिवासी समुदायों की संस्कृति और उनके समूचे जीवन को मानव-सभ्यता के तथाकथित विकास के नाम पर नेस्तनाबूद करने के तमाम प्रयासों की क्रूरताओं और उनका सामना करने वाले आदिवासियों के अपने सांस्कृतिक संघर्ष को आदिवासी कवि अनुज लगुन, वंदना टेटे तथा जसिंता केरकेट्टा की कविताओं के माध्यम से मंच पर साकार किया गया। नाटक में वंदना टेटे की पाँच कविताएँ ‘ओ माकी’, ‘अजनबी’, ‘हम कविता नहीं करते’, ‘सबसे सुंदर स्त्री हो जाति हूँ’, ‘पुरखों का कहन’; अनुज लगुन की ‘यह पलाश के फूलने का समय है’ शीर्षक की दो कविताएँ, ‘मेरी माँ, मैं और भेड़िए’, ‘उलगुलान की औरतें’, शहर के दोस्त के नाम पत्र’, ‘गुवा-नुआमुण्डी (1980)के शहीदों के प्रति’, ‘गोह की कविता’ शीर्षक की पाँच कविताएँ; जसिंता केरकेट्टा की तीन कविताएँ ‘नदी, पहाड़ और बाज़ार’, ‘उससे मेरा संबंध क्या था’, ‘राष्ट्रगान बज रहा है’, शामिल थीं। इन तीनों कवियों के अपने अनुभव और विचार, उनकी संवेदना और समझ के साथ आदिवासी ज़िंदगी की लय, ताल, गतियाँ, उनकी प्रतिक्रियाएँ, उनके गीत-संगीत और नाद की दुनिया को दिल्ली इप्टा के कलाकारों की समझ की आँच में पककर नाटक में अभिव्यक्त किया गया था।

आदिवासी मिथक, उनके जुझारू पूर्वज, उनके संघर्षों और उनकी परंपराओं में दृढ़ विश्वास,जंगल-पहाड़ों, नदियों-पगडंडियों के बीच के जीवन से आए हुए बिंब और प्रतीक तीनों कवियों की कविताओं में बिखरे हुए हैं। उनके संदर्भ ग़ैर आदिवासी कलाकारों और दर्शकों-पाठकों तक संप्रेषित होना कुछ कठिन काम था। मगर उनकी प्रकृति की गोद में शांति से गुज़रने वाली ज़िंदगी में अन्य सभ्यताओं की दख़लंदाज़ी से उनके जीवन में उथलपुथल मचा दी है। वंदना टेटे की पंक्तियाँ हैं –
सर्पिली सड़कें यहाँ /खींच लाईं तुम्हें/ तुम क्या/ तुम्हारे देवों को भी/ घर हमारा अच्छा लगा तभी तो/ किसी बहुरूपिये की तरह/ रिफ़्यूजी की तरह/ घुसपैठिये की तरह/ घुसे चले आए तुम/ कभी शांति की खोज में/ तो कभी पनाह माँगते, डराते/ और कभी प्रेम के छलावे से/ घुस आए तुम/ हमारे पहाड़ों में घरों में/ और डाल लिया घेरा-डेरा/ कर दिया हमें ही बेदख़ल।

आदिवासी शान्तिप्रिय, आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी हैं, मगर कायर नहीं। वे आत्मरक्षा और ज़रूरत पड़ने पर प्रतिकार भी करने के लिए हरदम तैयार होते हैं, इतिहास की सैकड़ों कहानियाँ इसकी गवाह हैं। वंदना, अनुज और जसिंता की अनेक कविताओं में आदिवासी जीवन-शैली का यह स्वाभिमान पंक्तियों में तरह-तरह से अभिव्यक्त हुआ है। उन्हें मंच पर दृश्यमान करना काफ़ी मुश्किल काम है, मगर दिल्ली इप्टा ने अपने संयुक्त निर्देशन में इसे महसूस करने और करवाने की ईमानदार कोशिश की है। कहीं-कहीं तो शब्द, अर्थ, उच्चारित ध्वनि, पार्श्व में उभरता हुआ ताल और अभिनेताओं की देह-गतियाँ जीवंत होकर उस दृश्य को, कविताओं के वैचारिक संवेदन को चाक्षुष कर रही थीं। यही इस मंचन की सफलता है।


नाटक में रस्सियों का प्रयोग आदिवासी सामुदायिकता, एकता और उनके जल,जंगल,ज़मीन,पहाड़ से जुड़ाव को रूपायित कर रहा था। रस्सी में पिरोए गए फूल उनकी रोज़ी-रोटी, दिनचर्या और ज़रूरत पड़ने पर धनुष की प्रत्यंचा में तब्दील होते रहे। आदिवासियों के स्वाभाविक और प्रकृति से संबद्ध जीवन में न्यूनतम भौतिक वस्तुओं के उपयोग को प्रतिबिंबित करती न्यूनतम मंच-सामग्री के साथ प्रस्तुति को अभिनेताओं की देह-बोली, मुद्राएँ और हाव-भावों के माध्यम से अधिक प्रतिबिंबित किया गया। समूचे नाटक में शहरों-महानगरों की तेज़ गतिविधियों, हलचलों तथा व्यक्तिकेंद्रित होती जीवन-शैली के विपरीत धीमी गतियाँ, सामूहिकता और परस्पर संबद्धता को कविताओं के शब्द-अर्थ-संदर्भों के साथ गूँथकर व्यक्त करने की कोशिश की गई थी। चूँकि चुनी हुई कविताओं का मूल स्वर ही प्रतिरोध का है, इसलिए प्रस्तुति में भी वही स्वर प्रमुख रूप से उभरा। उसमें आदिवासी जीवन का उल्लास, रंग और उनके अपने राग-रंग का पहलू लुप्त था। सभी कविताओं को आपस में जोड़ता हुआ एक सूत्र था ‘गोह’ की भूमिका में तमाम देह-मुद्राओं में व्यक्त होने वाली आक्रामक, निरीक्षक और कभी तटस्थ-सी दिखने वाली हलचलें व्यक्त करता एक अभिनेता। सभी अभिनेताओं ने कविताओं में मौजूद आदिवासी प्रतिरोध के कारणों, स्थितियों और क्रिया-प्रतिक्रियाओं को काव्य-पंक्तियों की संवादात्मकता, अर्थ-संदर्भों के अनुसार भावात्मकता तथा विभिन्न प्रकार की सापेक्षिक देह-मुद्राओं के माध्यम से दृश्यमान किया। ढोलक, नाल, ढपली जैसे तालवाद्यों के माध्यम से आदिवासी लय-ताल को पकड़ने की कोशिश बहुत सराहनीय थी। हालाँकि अभिनेताओं के अपने जीवन और आदिवासियों के स्थानीय जीवन का तालमेल होने के लिए शायद दीर्घ अभ्यास, प्रशिक्षण के अलावा उनके साथ वहीं उनके बीच रहकर प्रत्यक्ष जीवन-अनुभव लेने से कविताओं की अनेक परतें और भी खुल सकेंगी।

सामूहिक डिज़ाइन एवं निर्देशन की इस प्रस्तुति में मंच पर थे – वर्षा आनंद, तरुणी मिश्रा, रमेश देव पांडे, वागेश पवैजा, जितेंद्र कुमार, रजनीश श्रीवास्तव, पम्मी अंशु केरकेट्टा, इन्द्रदीप सेन, अनुला मालाकार, माधुरी सिंह और शिवांगी। प्रकाश परिकल्पना एवं संचालन – मनीष श्रीवास्तव का, वाद्य-वादन – रमेश देव पांडे, जितेंद्र कुमार तथा वागेश पवैजा, दृश्य-रचना – रजनीश श्रीवास्तव, रिहर्सल सहायक थे – संतोष कुमार, साजिद, ईशान और योगेश।
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दूसरा नाटक संपन्न हुआ तमिलनाडु इप्टा का। UYARNTHA THEERPPU (Tall Verdict) शीर्षक तमिल भाषा में खेले गए इस राजनीतिक नाटक में आज जन-सामान्य के जीवन की आवश्यकताओं को पूरी तरह परे धकेलकर किस तरह बड़ी-बड़ी परियोजनाएँ लागू की जा रही हैं, चाहे वह विशाल पुतलों या मूर्तियों के रूप में, विशाल हाईवेज़ या फ़्लाइओवर हों या फिर चकाचौंध पैदा करने वाली मंदिरों या मॉल जैसी इमारतें हों; या लोगों की बस्तियाँ हों, जंगल हों या प्राकृतिक परिसर हो, विकास के नाम पर विकासकों के लिए सब कुछ क़ुर्बान किया जा रहा है। नाटक में इसी तरह एक आत्मनिर्भर शांत गाँव में इसी तरह की एक परियोजना के आने पर स्थानीय निवासियों का उसके विरुद्ध किया जाने वाला प्रतिकार और संघर्ष अनेक रूपों में प्रस्तुत नाटक में प्रदर्शित किया गया। शासन द्वारा घोषित किया जाता है कि करोड़ों की लागत से निर्मित स्थानीय लोकप्रिय दिवंगत नेता की एक विशालकाय मूर्ति स्थापित की जाएगी। इससे गाँव में पर्यटन बढ़ेगा, आर्थिक विकास होगा साथ ही गाँव का नाम रोशन होगा। लोग चिंतित हो जाते हैं इसके भूमि-अधिग्रहण में तो अनेक लोगों के घर, खेत छिन जाएँगे, साथ ही पर्यावरण की हानि होगी, जिसकी क्षतिपूर्ति के बारे में कोई विकल्प नहीं है।
इस तरह की परियोजनाएँ राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों और समाज के ठेकेदारों की साँठगाँठ में पनपती हैं और जनता के विरोध का दमन कर लागू कर दी जाती हैं। आनंद बसु के निर्देशन में मंचित इस नाटक में जनता के प्रतिरोध की विविध अभिव्यक्तियों को अभिनेताओं ने समूचे प्रेक्षागृह का उपयोग करते हुए बहुत गतिमान, जीवंत और दिलचस्प बना दिया था। बादल सरकार के ‘थर्ड थिएटर’ की अवधारणा के अनुसार नाटक को डिज़ाइन किया गया था। इसीलिए विशेष प्रकार के प्रकाश, मंच-सज्जा, रूपसज्ज़ा या वेशभूषा का प्रयोग नहीं हुआ था।

मुंबई के दर्शकों में अधिकांश तमिलभाषी न होने के कारण समन्वयक संकरा नारायणन ने नाटक के आरंभ से पहले अंग्रेज़ी में नाटक के लेखन व प्रस्तुति की समूची रूपरेखा समझाई थी इसलिए कुछेक विशिष्ट संवादों को छोड़कर समूचा नाटक संप्रेषित हुआ। सभी अभिनेताओं का स्वाभाविक आवेशपूर्ण अभिनय व्यवस्था के बद से बदतर होने, अमानवीय विकास के वास्तव को स्पष्ट कर रहा था।

मंच पर थे – रामालिंगम, वीरमणि और नंदा किशोर, आनंद बसु, कार्थिकेयन, दिलीप कुमार, ईश्वर नटराजन, कीर्थन, ज्ञानसंबदान, अरूल कुमार, सेल्विन एवं चार्ल्स। नाट्यालेख था आनंद बसु और संकरा नारायणन का, प्रकाश संचालन किया सेल्विन व आनंद बसु ने, ऑडियो तथा म्यूजिक समन्वय था चार्ल्स का, गीत थे रामालिंगम के, नृत्य किया था कीर्थना ने।

जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय बहुभाषीय नाट्य समारोह के चौथे दिन 23 मई 2026 को दो नाटकों का मंचन होगा – शाम 5 बजे इप्टा पंजाब का पंजाबी नाटक ‘कुढ़े विच ख़िदेया गुलाब’ (KURHE VICH KHIDEYA GULAB), लेखक : डॉ दविंदर कुमार, निर्देशक : इंद्रजीत रूपोवाली। रात 8 बजे इंदौर मध्य प्रदेश इप्टा का हिन्दी नाटक ‘आज़ादी के तराने’, लेखक : जया मेहता एवं विनीत तिवारी, निर्देशक : गुलरेज़ ख़ान तथा सारिका श्रीवास्तव प्रस्तुत होगा।
जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय बहुभाषीय नाट्य समारोह के पाँचवें दिन 24 मई 2026 को लखनऊ उत्तर प्रदेश इप्टा का हिन्दी नाटक ‘सपना मेरा यही सखी’ प्रस्तुत किया जाएगा। इसके लेखक हैं राजेश जोशी, तथा निर्देशन है वेदा राकेश का। सभी नाटक मैसूर एसोसिएशन, माटुंगा मुंबई में मंचित होंगे। टिकट प्रेक्षागृह में सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक उपलब्ध होंगे।
