मुंबई के मैसूर एसोसिएशन हॉल में इप्टा के जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय नाट्य समारोह के दूसरे दिन 21 मई 2026 की सुबह नाट्य-गुरु एवं इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रसन्ना ने ‘अभिनय और रंगमंच’ विषय पर मास्टरक्लास ली। लगभग 50 युवा रंगकर्मियों के साथ प्रसन्ना के पचास साल से ज़्यादा के नाट्यानुभव और जीवन-अनुभवों ने एक अलग समाँ बाँधा। प्रस्तुत है अर्पिता की रिपोर्ट।

प्रसन्ना ने अपनी मास्टरक्लास को आज दो सत्रों में बाँटा। पहले सत्र में उन्होंने चर्चा केंद्रित की कि आज के युवा कहाँ जा रहे हैं, वे इप्टा में क्यों नहीं आ रहे हैं। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि असल में आज युवा किसी भी प्रगतिशील संस्था या संगठन में नहीं जा रहे हैं बल्कि वे प्रतिगामी संस्थाओं और संगठनों में बहुतायत से दिखाई दे रहे हैं। तो ऐसा क्यों? आज जबकि थियेटर में लड़के और लड़कियाँ देश के हर क्षेत्र से सामने आए हैं पर उनमें सरोकार की प्रबल अभिलाषा, आकांक्षा नहीं है और वे अपने तक सीमित और आत्मकेंद्रित रह जाते हैं। इसमें असल बात यह है कि हम उनकी युवावस्था की पीड़ा, वेदना के प्रति जिज्ञासु नहीं रह गए हैं, उनसे संवाद के स्पेस हमने बनाए नहीं है। हमारे सामने भगत सिंह हैं, विवेकानंद हैं, जिन्होंने युवावस्था में वो किया जिसकी नज़ीर हमारे सामने है। यदि कोई युवा संघर्ष कर रहा है वो और जो बॉलीवुड, टॉलीवुड या सिनेमा के किसी क्षेत्र में पहचान बना लेने के बाद खुश है तो इसके पीछे की वजहें विचारणीय हैं।

इप्टा की शुरुआत कैसे हुई? इसकी ज़मीन किन मूल्यों पर बनी? इसे बार-बार याद किया जाना चाहिए। मुंबई में इप्टा की शुरुआत हुई और आज के समय में भी यहीं से मॉर्डन थियेटर समयानुसार आकार लेता है। इप्टा के प्रतिभाशाली अभिनेता, गीतकार, संगीतकार, निर्देशक फिल्मों में आए तो उसके पीछे सामाजिक बदलाव की आकांक्षा साँस ले रही थी पर आज के समय में इसे पूँजी के राक्षस ने दबोचकर मार दिया है। आज के समय में सांस्कृतिक परिवेश कैसा है इस बात को स्पष्ट करते हुए प्रसन्ना ने चिंता ज़ाहिर की कि भाषाएँ मर रही हैं। इन स्थितियों के प्रति हम इप्टा वालों को सोचने की आवश्यकता है।
आज बच्चे, किशोर, युवा, महिला, बूढ़े सभी रील देख रहे हैं। मनोरंजन का साधन बन गई है रील; तो ऐसे समय में, इस संदर्भ में भी समझना ज़रूरी है कि युवा इप्टा में क्यों नहीं आ रहे हैं। वे मोबाइल में रिहर्सल कर ले रहे हैं, जो कि थियेटर के लिए संभव ही नहीं है। सिनेमा में अभिनय क्षमता से ज़्यादा ज़रूरी पक्ष हो गया है चेहरा।

गाँव में युवाओं को अवसर नहीं, थियेटर में कलाकारों को नहीं, आखिर क्यों पूरी दुनिया प्रतिगामी ताकतों के साथ दक्षिणपंथी राजनीति के साथ खड़ी है ? हम समय के साथ नए कंटेन्ट में पीछे हो गए हैं, थियेटर को उस तरह से आविष्कृत (एक्सप्लोर) नहीं कर रहे हैं, जो समय के साथ होना चाहिए । यदि हम कुछ नया सृजित करेंगे तो कला के इस माध्यम से हम लोगों को अपने करीब ला पाएँगे। कला के माध्यम से जो वर्चस्व कायम है, वह बिलकुल अन्य क्षेत्रों की तरह ही है और इन सबके मूल में पूँजी/कॉमर्स है।
प्रसन्ना ने समुदाय बनाने और गाँव में मौजूद समुदायों के साथ काम करने पर ज़ोर दिया जिससे हम अपने सांस्कृतिक स्पेस के साथ जन से जुड़ पाएँगे, क्योंकि जन के लिए की जाने वाली कला आज जन से दूर होती जा रही है।
इस सत्र के बाद मास्टरक्लास के लिए उपस्थित युवाओं ने थियेटर से संबंधित सवालों और जिज्ञासाओं पर प्रसन्ना से बातचीत की। इस सत्र में अभिनेत्री शबाना आज़मी, इप्टा के महासचिव तनवीर अख़्तर, कार्यकारी अध्यक्ष राकेश वेदा, सचिव शैलेन्द्र कुमार, मुंबई इप्टा के सचिव मसूद अख़्तर, झारखंड इप्टा के साथी उपेन्द्र मिश्रा विशेष रूप से उपस्थित रहे।

प्रसन्ना की इस मास्टरक्लास के साथ उनके द्वारा लिखा एक प्रसंग एवं एक रचना पढ़ना रोचक होगा, जो उनकी पिछले साल अंग्रेज़ी में पुनर्प्रकाशित हुई किताब ‘Acting and beyond…’ का हिन्दी अनुवाद है, जो अभी अप्रकाशित है जिसके अनुवादक राकेश वेदा हैं।
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एक
शिक्षक (मुस्कराते हुए) : नहीं… यह शिकायत मत करो कि मैंने रचनात्मकता को पर्याप्त समय नहीं दिया। रचनात्मकता बेचैन करने वाली होती है!
(हँसी। चारों ओर देखता है, पाता है कि वे शांत हो गए हैं। मुस्कराता है।)
टिप्पणी कीजिए, कृपया!
असम: टिप्पणी क्या करें, सर! यह तो एक पहेली है।
मोनोज़ : (खिलखिलाता है) सुनने में तो अच्छी पहेली है!
(छात्र मुस्कराते हैं। शिक्षक सिर हिलाता है।)
शिक्षक (आह भरते हुए): नहीं, यह पहेली नहीं है!… अलगाव की त्रासदी भला पहेली कैसे हो सकती है? अलगाव तो हत्यारा होता है, ठीक वैसे ही जैसे इस तस्वीर में इस लड़की के साथ हो रहा है — बस इतनी-सी बात!
(विराम)
शिक्षक: अच्छा, मज़ाक छोड़ो। अब हम इस विषय पर कालिदास के नाटक ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ के उदाहरण से चर्चा करेंगे। और यदि समय मिला, तो अभिनय की एक विशेष समस्या के रूप में भी इसे समझेंगे!
(सिर हिलते हैं।)
कालिदास अपने नाटक में कोई पहेली नहीं, बल्कि एक अंगूठी प्रस्तुत करते हैं! वह मुद्रिका शकुंतला की कोमल उँगली में उसके शक्तिशाली प्रेमी, राजा दुष्यंत द्वारा पहनाई गई थी! वास्तव में वह अंगूठी एक अतिरिक्त कल्पना है; मूल महाभारत में नाटककार ने जो एकमात्र चीज़ जोड़ी है, वही यह अंगूठी है। विद्वानों का कहना है कि वह जोड़ रचनात्मक प्रतिभा का अद्भुत उदाहरण था!
बंगाल: अंगूठी? उसमें इतना रचनात्मक क्या है, सर?
शिक्षक: देखो, पहली बात तो यह कि मूल कथा में अंगूठी है ही नहीं। कालिदास इसे इसलिए जोड़ते हैं ताकि अभिज्ञान — यानी प्रेमी के मन में भूली हुई स्मृति — फिर से जाग उठे। और इस प्रकार पुनर्मिलन संभव हो सके!
(विराम)
इस प्रकार नाटककार बिछड़े हुए प्रेम को पूर्णतः बिखरने से बचा लेता है!
किट्टन: वाह!
शिक्षक: वह अंगूठी संयोग से पूरे नाटक को एक सूत्र में भी बाँधती है और उसे वही बनाती है जो वह है!
किट्टन (नोट्स लेते हुए): वाह!
शिक्षक: नहीं तो यह प्रसिद्ध नाटक कुछ और ही बनकर रह जाता!
उन्मिली (आश्चर्य से): वह कैसे, सर?
शिक्षक: तब यह एक दुखद बिछोह और कड़वी स्मृति की कहानी बन जाती — एक टूटे हुए विवाह की तरह!… ठीक वैसे ही जैसे इब्सन के प्रसिद्ध नाटक A Doll’s House में होता है!
वह लगातार नोट्स लिए जाने से विचलित हो जाता है।
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किताब की भूमिका भी प्रसन्ना के कार्य-शैली की भिन्नता को दर्शाती है।
अभिनय और उससे आगे : भूमिका
हालाँकि इस पुस्तक का लेखन कुछ वर्ष पहले शुरू हुआ था, लेकिन यह आगे नहीं बढ़ पा रही थी। इसका कारण यह था कि मैं एक ऐसी पुस्तक नहीं लिखना चाहता था जो केवल तकनीकी शब्दजाल से भरी हो। मुझे तकनीकी शब्दों से चिढ़ है। वास्तव में, पूरी दुनिया अब तकनीकी शब्दजाल में उलझ चुकी है। यह पाप करने के बाद, अब दुनिया को यह एहसास हो रहा है कि हम खुद को उस प्रौद्योगिकीय विनाश से नहीं बचा सकते जिसे जलवायु संकट कहा जाता है।
मैं रंगमंच से जुड़ा हूँ — एक ऐसा क्षेत्र से, जो तकनीक के ठीक विपरीत है। रंगमंच सजीव संवाद और मानवीय अभिव्यक्ति के लिए है। इस असाधारण सत्य-खोजी खेल में अभिनेता केंद्र में होता है, न कि पैसा। हम स्वचालित दुनिया के ठीक उलट हैं।
लेकिन अब हमें एक तरह का बंधुआ मज़दूर बना दिया गया है, भले ही हमें अच्छा वेतन मिलता हो। हम अब एक अराजक और हिंसक डिजिटल मनोरंजन का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले मज़दूर भर रह गए हैं। इस अजीब स्थिति में, यह पुस्तक अभिनेता को फिर से सच्ची अभिनय प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास करती है।
सच्ची अभिनय प्रक्रिया, मैं महसूस करता हूँ, केवल अभिनेताओं के लिए ही नहीं, बल्कि नागरिकों के लिए भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। बस, दोनों इसे विपरीत दिशाओं से अपनाते हैं। अभिनेता जो एक झूठ से शुरू करते हैं, वे इसे “प्रेरित अभिनय” कहते हैं।
संवाद अदायगी का सत्य
यह पुस्तक एक और महत्त्वपूर्ण विषय की वकालत करती है — संवाद अदायगी। संवाद तभी सत्यपूर्ण लगता है जब उसे, और वह भी केवल आवश्यक होने पर, किसी क्रिया के बाद बोला जाए। यह सिद्धांत सिर्फ़ अभिनेताओं पर ही नहीं, बल्कि नागरिकों पर भी लागू होता है। लेकिन आज हर कोई यूँ ही बोले जा रहा है, मानो सत्य सिर्फ़ शब्दों का खेल हो।
इसका कारण यह है कि क्रिया, प्रेरणा, गतिविधि और उत्पादकता — ये सभी चीज़ें हमसे मशीनों ने छीन ली हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि अब यह मायने नहीं रखता कि बोले गए शब्द सत्य हैं, असत्य हैं, आवश्यक हैं या अनावश्यक। आज हर कोई बस एक दिखावटी प्रतिबद्धता में फँसकर कुछ भी बोल देता है, जो उस क्षण उसके मन में आता है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए सच है जो आध्यात्मिक और राजनीतिक नेतृत्व की स्थिति में हैं।
श्रम और सच्ची क्रिया
यह कठोर सत्य मुझे तब समझ में आया जब मैंने एक ग्राम्य हथकरघा सहकारी संस्था ‘चरखा’ में श्रम किया। वहाँ मुझे एहसास हुआ कि सच्ची क्रिया के सबसे निकट श्रम ही है। मैंने यह भी जाना कि हमारे देश की लंबी और गौरवशाली आध्यात्मिक परंपरा के मूल में श्रम ही रहा है। और इस परंपरा के अंतिम प्रतिनिधि गांधी जी थे। उन्होंने यदि चरखा को ध्यानमय क्रिया का माध्यम चुना, तो अन्य संतों ने श्रम के अलग-अलग उपकरणों को अपनाया। कुछ ने भिक्षा मांगने तक को अपनाया।
पुस्तक का रूपांतरण
इस सत्य को ठीक से कहने के लिए, मैंने महसूस किया कि यह पुस्तक अनुभव-आधारित होनी चाहिए। इसलिए मैंने खुद को ग्लैमर सिटी मुंबई के ‘अभिनय बस्ती’ में स्थापित किया और इस पुस्तक को वहीं केंद्रित किया। मैंने इसे एक अच्छे नीयत वाले अभिनय शिक्षक और युवाओं के एक समूह के बीच संवाद के रूप में फिर से लिखना शुरू किया। तब पुस्तक आगे बढ़ी। वहाँ मैंने खुशी भी महसूस की और दुख भी। अभिनेताओं की बस्तियों में रहना एक झकझोर देने वाला अनुभव था, लेकिन वहाँ की ऊर्जावान और संघर्षरत युवा पीढ़ी से संपर्क कर मुझे अत्यंत खुशी हुई। ये युवा गहरे और व्यक्तिगत रूप से अपनी भावनाएँ व्यक्त करना चाहते हैं। वे अभिनेता, गायक, नर्तक, लेखक — कुछ भी बनना चाहते हैं। लेकिन उनमें एक चीज़ की कमी है — सच्ची क्रिया। और इसके लिए मैं हम, बूढ़ों को जिम्मेदार मानता हूँ।
ग्लैमर बनाम थिएटर
यह एक विपर्यय (पैराडॉक्स) है। हमने जीवंत रंगमंच और डिजिटल मनोरंजन के बीच का अंतर मिटा दिया। हमने इसको वह और उसको यह समझ लिया। और अब हम युवा पीढ़ी को दोष दे रहे हैं। लेकिन मुझे युवा पसंद आए। उनकी अजीब पोशाकों और व्यवहार के बावजूद, उनमें से अधिकांश सभ्य इंसान लगे। उनके अजीब फैशन और आदतें सिर्फ उनका बचकाना विरोध प्रदर्शन थीं। मैंने खुद पाँच दशकों तक मुंबई से बचने की कोशिश की क्योंकि मैं जीवंत रंगमंच से अभिनेताओं के पलायन का विरोध कर रहा था। लेकिन अब, जब मैं खुद इस बस्ती के भीतर था, तो मैंने स्थिति को और स्पष्ट रूप से देखा।
ग्लैमर का क्रूर नियम
ये युवा शिक्षित और प्रेरित हैं। लेकिन ग्लैमर इंडस्ट्री की स्थिति को देखते हुए, इनमें से अधिकांश शीर्ष तक नहीं पहुँच पाएँगे। लेकिन हाँ, वे निश्चित रूप से नीचे तक पहुँच जाएँगे। क्योंकि ग्लैमर की दुनिया का नियम यह है कि एक सुपरस्टार बनाने के लिए लाखों ‘नॉन-स्टार्स’ का निर्माण किया जाता है। ग्लैमर लॉटरी से भी बदतर है।
राष्ट्रीय संकट: गेटो (बस्ती) में तब्दील होता अभिनय
अभिनेताओं, अभिनय और सत्य का यह गेटोकरण (बस्तीकरण) एक राष्ट्रीय संकट से कम नहीं है। हजारों युवा अपने घरों, यहाँ तक कि अच्छी नौकरियों को छोड़कर, इस अंधकूप में आ रहे हैं। कल्पना कीजिए! यही वे युवा हैं जिन्होंने कभी महान राष्ट्रीय नेताओं को जन्म दिया था। इन्होंने हमें स्वतंत्रता दिलाई, हमारे वैज्ञानिक, शिक्षक, विद्वान और कलाकार दिए। सोचिए, अगर विवेकानंद या भगत सिंह किसी और परिस्थिति में मुंबई के ग्लैमर गेटो में चले जाते? हमने मुंबई का निर्माण किया। और मुंबई ने इस भयावह गेटो का निर्माण किया। हमने युवा पीढ़ी के हर पहलू का गेटोकरण कर दिया। अब किसी भी प्रकार की बयानबाज़ी — चाहे वह हिंदुत्व की हो, कट्टरपंथी इस्लाम की हो, या समाज-उत्तरदायित्व की — हमें इस अपराध से नहीं बचा सकती।
आभार और समर्पण
इस पुस्तक को लिखने में युवा अभिनेता मित्रों ने मेरी मदद की। वे बहुत अधिक हैं, इसलिए मैं उनके नाम नहीं ले सकता, लेकिन उनका धन्यवाद करता हूँ।
प्रसन्ना द्वारा लिखित और राकेश वेदा द्वारा इस किताब का हिन्दी अनुवाद ‘अभिनय और उससे आगे’ का इंतज़ार है!!!
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जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय नाट्य समारोह मुंबई के तीसरे दिन 22 मई 2026 को शाम 7 बजे इप्टा नाशिक का मराठी नाटक ‘उपटसुंभ’ (लेखक : योगेश गोवर्धन, निर्देशक : मुकेश काले) तथा चौथे दिन 23 मई 2026 को शाम 5 बजे इप्टा पंजाब का पंजाबी नाटक ‘Kande Vich Khileya Gulaab’ (लेखक : डॉ दविंदर कुमार, निर्देशक : इंदरजीत रूपोवाली) तथा रात 8 बजे इप्टा इंदौर मध्य प्रदेश का हिंदुस्तानी नाटक ‘आज़ादी के तराने’ (लेखक : जया मेहता एवं विनीत तिवारी, निर्देशक : गुलरेज़ ख़ान एवं सारिका श्रीवास्तव) मैसूर एसोसिएशन, माटुंगा में प्रस्तुत होगा। टिकट प्रेक्षागृह में सुबह 10 से रात 8 बजे तक उपलब्ध होंगे।

