2025 समाप्त हुआ और 2026 ने अपना खाता खोला।
फणीश्वर नाथ रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‘मारे गए गुलफाम उर्फ़ तीसरी क़सम’ काफ़ी पहले पढ़ी थी। कहानी पर शैलेंद्र द्वारा बनाई गई फ़िल्म के तमाम क़िस्से पढ़े थे, फ़िल्म भी काफ़ी पहले देखी थी। जब 2020 में कोविड के फैलने से पहले रोशिनी जी से फ़ोन पर बात हुई कि रघुबीर यादव ‘मारे गए गुलफाम’ बड़ी कास्ट के साथ पूरा म्यूज़िकल कर रहे हैं और उसके देश भर में शो करना चाहते हैं। रायगढ़ में भी क्या मंचन हो सकता है? सुनकर हम बहुत उत्सुक हुए। रघुबीर जी के गीत-संगीत की सहज अनगढ़ता के अद्भुत सौंदर्य से हम रूबरू हो चुके थे, अभिनय और निर्देशन तो उनका विशेष था ही, हमने ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकृति दे दी थी। मगर उसके बाद तो कोविड की ऐसी आँधी उठी कि क्या तो नाटक और रंगमंच, लोगों की ज़िंदगियों पर भी बर्बादी का बुलडोज़र फिर गया।
नाटक पर बात शुरू करें, उससे पहले रघुबीर यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व पर अनादि आठले की 2015 में बनाई गई फ़िल्म देखिए। यह फ़िल्म रघुबीर यादव को रायगढ़ इप्टा द्वारा प्रदत्त सातवें शरदचंद्र वैरागकर स्मृति रंगकर्मी सम्मान के अवसर पर बनाई गई थी।
पिछले महीने यूँ ही ‘बुक माय शो’ पर नज़र फिरा रही थी कि अचानक ‘मारे गए गुलफाम’ के 27 दिसंबर के मंचन का पोस्टर देखा। पुरानी स्मृति और उत्सुकता दोनों ही जाग गई और मैंने तुरंत दो टिकट बुक कर लिए। मूल कहानी, 1966 में बनी फ़िल्म की पृष्ठभूमि, और अब 2025 में रघुबीर जी के रूपांतरण, निर्देशन और संगीत परिकल्पना के साथ ‘मारे गए गुलफाम’ देखने का अनुभव … यह सफ़र दिलचस्प रहा। हालाँकि गूगल से मुझे पता चला कि रघुबीर जी ने इस नाटक के पहले भी कुछ मंचन देश के अनेक स्थानों पर किए हैं। मुंबई में शायद यह पहला मंचन था।
चूँकि नाटक के साथ मूल कथा और फ़िल्म ने भी मुझे प्रभावित किया था इसलिए नाटक पर बात करते हुए अनजाने में तीनों की कहीं तुलना भी हो सकती है। हरेक विधा की रचना-प्रक्रिया, प्रस्तुति और प्रभाव पृथक-पृथक होते हैं, मगर इस तरह का अवलोकन भी मानव-स्वभाव का एक अंग है।
‘तीसरी क़सम’ में राज कपूर और वहीदा रहमान का अभिनय और शैलेंद्र तथा हसरत जयपुरी के गीत, शंकर-जयकिशन के कर्णप्रिय संगीत के जादू के समानांतर रघुबीर जी क्या रचते हैं, यह देखना और महसूस करना बहुत दिलचस्प रहा। मूल कहानी के शब्द-बिंब, फ़िल्म के कैमरे से रचे गए चाक्षुष बिंब और तकनीकी ध्वनि-संसार की ‘प्रतिदुनिया’ मंच पर कैसे जीवंत होती है और रूपांतरणकार, अभिनेताओं, निर्देशक, संगीतकार, प्रकाश-ध्वनि-मंच-वेशभूषा-रंगभूषा परिकल्पकों के संयुक्त प्रयास प्रेक्षागृह में कैसा समाँ बाँधते हैं, दो घंटे तक इसका अनुभव करना ताज़ा बयार से गुज़रने जैसा था।
रघुबीर यादव ने अपने किसी साक्षात्कार में कहा था कि वे एक मिनट भी सुरों के बिना ज़िंदा नहीं रह सकते। मंच पर उन्हें गाते देखकर वाक़ई यह महसूस होता है कि उनका पोर-पोर गा रहा है, उनका पूरा अस्तित्व और व्यक्तित्व सुर-ताल के साथ घुल-मिलकर एक ऐसा वातावरण निर्मित कर देता है कि दर्शक भी अपने तन-मन को अनायास थिरकते हुए पाते हैं। नाटक के बीच ही वे संगीत मंडली से उठकर ‘चाचा’ की भूमिका में मंच पर आ जाते हैं। कहीं किसी ने ‘मज़ा लगाना’ पद का प्रयोग किया है, उससे यहाँ साक्षात होता है। ‘मारे गए गुलफाम’ नाटक में जब हीराबाई से नौटंकी के ‘पास’ मिलने पर गाँव के साथियों के साथ ख़ुशियाँ मनाते हुए बुजुर्ग चाचा ख़ुद ही गाने-नाचने लगता है – ‘मोहन रसिया रे मोहन रसिया रे, मोहन रसिया … ’ और अंतरा में ‘चना चोर गरम बाबू मैं लाया मज़ेदार चनाचोर गरम’ पंक्तियाँ बार-बार अनेक प्रकार से दोहराते हुए दोस्तों के कोरस के साथ मस्ती में नाचता-गाता है, समूचा प्रेक्षागृह उन अनगढ़ और आकर्षक शब्द-सुरों के साथ झूमने लगता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के ‘अंधेर नगरी’ से लेकर हबीब साहब के ‘चरनदास चोर’ की विरासत जगमगाने लगती है। इस ‘मज़ा लगाने वाले’ गीत से एकदम पृथक अहसास दिलाता है ‘महुआ घटवारीन’ का कथा-गीत। मूल कथा तथा फ़िल्म में भी यह है, मगर इसका पूरा गीत और कथा-कहन में जो करुण नादात्मकता और नाटकीयता है, वह नाटक में कहीं ज़्यादा प्रभावी है। संगीत मंडली का गायन-वादन-हमिंग, अभिनेताओं के संवाद और मंच पर दिखाई देने वाले गतिमान बैलगाड़ी में घटित दृश्य इतने एकमेक हो गए थे कि प्रेक्षागृह का समूचा वातावरण तन्मय होकर स्तब्ध हो गया था।
रेणु की इस प्रसिद्ध प्रेम कहानी ने मंच पर आकर लोक-जीवन के छोटे-छोटे व्यावहारिक दृश्यों के माध्यम से, निर्देशक के सूक्ष्म और जीवंत निरीक्षण के माध्यम से सादेपन का एक नया सौन्दर्यशास्त्र रच दिया था। जब हीरामन अपनी रंगबिरंगी झालरों से और पर्दे से सजी ऊँची बैलगाड़ी में हीराबाई को चढ़ाने और उतारने के लिए टीन की पेटी को बतौर सीढ़ी रखता है और उसे हौले से चढ़ने-उतरने की ताक़ीद करता है, वह दृश्य दोनों के बीच बुने जाने वाले आत्मीय सूत्र का पहला धागा बुनता है। इसी तरह हीरामन द्वारा गाड़ी तेज़ भगाने के लिए बैलों को चाबुक मारने के लिए उठाया जाने वाला हाथ जिस तरह हीराबाई रोकती है, जीव-मात्र के प्रति हीराबाई की संवेदना और उससे हीरामन का प्रभावित होकर उसे देखना मनुष्यता के कोमल तारों को झंकारने जैसा लगता है। अन्य दृश्य का रूपक, जहाँ हीरामन की गाड़ी में जुते बैल और अन्य गाड़ीवान की गाड़ी के बैलों के बीच अपने मालिकों के व्यवहार को लेकर जो परस्पर संक्षिप्त संवाद होता है, वह उत्कृष्ट हास्य के साथ-साथ मनुष्य और पालतू पशुओं के आपसी संबंधों की भिन्नता के माध्यम से विभिन्न दृष्टियों को भी अभिव्यक्त करता है। इस तरह के अनेक दृश्यों पर नाटक में बहुत अछूते क़िस्म का काम दिखाई देता है। रेणु की मानवीय दृष्टि की झलकियों को रघुबीर यादव की निर्देशकीय सूझबूझ ने जिस तरह प्रस्तुत किया है, उसकी आज कितनी ज़रूरत है!

कुछ बातों का विशेष उल्लेख करना अत्यावश्यक है। मानव-शृंखला के संतुलित और विलक्षण सामंजस्य के साथ रेलगाड़ी के स्टेशन पर आने, रुकने और चले जाने का दृश्य, चोरी का माल और लंबे बाँस लादे जाने के अनुभव के बाद हीरामन का दो क़समें खाना – ‘कभी गाड़ी में चोरी का माल नहीं लादूँगा और कभी बाँस नहीं ढोऊँगा, के अलावा नाटक के अंत में तीसरी क़सम लेना कि, आगे से कभी कंपनी की किसी औरत को नहीं बैठाऊँगा’ – अनायास हबीब साहब के ‘चरनदास चोर’ के क़समों की याद दिलाता है। इनके ‘लोक-रस’ में अद्भुत साम्य है।
लोक-नाटक की सरलता, सहजता, सच्चापन और ज़मीनी समाज के आपसी संबंधों की महक से दिल-दिमाग़ तृप्त हो जाता है। 1960 के दशक के लोक-समाज की यह कहानी 2025 में जब रघुबीर यादव तमाम युवा शहरी कलाकारों के साथ मंच पर साकार करते हैं, हम वर्तमान की लगातार बनाई जा रही विषैली परिस्थितियों के काँटों की चुभन को हटाए जाने के जज़्बे को और ज़्यादा महसूस करते हैं। जब व्यक्तिपरकता और जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, भाषा की राजनीति ‘फूट डालो और राज करो’ की ब्रिटिश विरासत को खाद-पानी डाल रही है, तब लगभग 30-35 कलाकारों की लंबी-चौड़ी टीम को लेकर संगीत मंडली के भरपूर योगदान के साथ रंगीन झालरों से सजी बैलगाड़ी और छोटे-छोटे दृश्यों के साथ घटने वाली मंथर गति की घटनाओं की एक-एक भंगिमा, एक-एक गतिविधि, एक-एक शब्द, उनसे ध्वनित होने वाले अर्थ-संदर्भ पूरी सामूहिकता में एक प्रति-दुनिया रचते हैं। इसमें निश्छल हास्य-बोध के साथ करुणा, विसंगति, विषमता, उदारता, मानवता जैसे भाव-भावनाओं-संवेदनाओं की लय गीत-संगीत-संवादों के साथ घुल-मिलकर दर्शक के दृश्य-अनुभव को सार्थकता प्रदान करती है।
नाटक में ग्रामीण जीवन के अनेक प्रसंग – हीरामन की बचपन में हुई शादी में पत्नी की गौने के पहले ही हुई मौत और उसका भौजी की आकांक्षाओं के कारण अविवाहित रह जाना, अचानक नौटंकी कलाकार हीराबाई को अपनी गाड़ी में बिठाना और उसके प्रति जिज्ञासा, सम्मान के साथ अपने निश्छल व्यवहार से उसका दिल जीतना, हीराबाई द्वारा उसे नाम में समानता होने के कारण ‘मीता’ कहना, गीतों और कथाओं के माध्यम से यात्रा को सुखद और सुरक्षित बना देना, मेले पहुँचने के बाद हीराबाई का उसे नौटंकी देखने के लिए आमंत्रित करना, उसे और उसके दोस्तों के लिए पास देना, नौटंकी के दृश्य और अंततः हीराबाई का मेले की नौटंकी छोड़कर वापस पुरानी नौटंकी में लौटने से उदास होने वाला हीरामन – रेणु की मूल कहानी के अनुसार ही मंच पर घटित होते हैं, मगर उसे जिस तरह रघुबीर यादव के ‘पारसी थिएटर’ और रंगमंच के दीर्घ अनुभव ने इंप्रोवाइज़ कर, क्षेत्रीय लोक-समाज और संस्कृति के प्रति अपनी गहरी समझ के साथ आत्मीय विस्तार दिया है, वह अकल्पनीय है। उसमें कहीं कृत्रिमता नहीं है। उन्होंने प्रदर्शन के उपरांत कहा, “यह कहानी उनके जीवन और दिल के बहुत क़रीब रही है और इस मंचन में वे सिर्फ़ दस प्रतिशत ही दे पाए हैं, अगर अगले मंचनों में वे पचास या सत्तर प्रतिशत भी साकार कर पाते हैं, तो उन्हें सचमुच की ख़ुशी मिलेगी।” उनका यह वक्तव्य उनके और उनकी समूची टीम के समर्पणपूर्ण लगाव को देखकर ढेरों संभावनाएँ जगाता है। ‘ढाई आखर प्रेम’ का प्रसार कितना ज़रूरी है!
मूल कहानी और फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ की तुलना में एक एकदम अनूठी चीज़ रघुबीर जी ने नाटक में पिरोई है और वह है – हीरामन के बैलों का मानवीकरण। उनकी भूमिका करने वाले कलाकारों की लगभग पूरी अवधि तक की जाने वाली अथक लयात्मक गतियाँ, उनकी देह-मुद्राएँ, उनके शानदार संवाद, उनका उठना-बैठना, उनका विविध तरीक़े से ‘बाँ-बाँ’ कर कथा में एक अलग ही रस पैदा करना, हीरामन और हीराबाई से उनके संवाद, उनका भी नौटंकी देखने जाना जैसे ‘एक्सेंटेशंस’ ‘मारे गए गुलफाम’ को पृथक आयाम प्रदान करते हैं। एक अन्य ‘एक्सटेंशन’ भी मज़ेदार है, जिसका दर्शकों ने खूब आनंद लिया। नौटंकी में हीराबाई का नाच शुरू होने से पहले एक ग़ज़ल-गायिका मुश्तरी बाई आकर दर्शकों को अच्छा-ख़ासा ‘मज़ा लगाती’ है। नौटंकी जैसी लोककला के प्रदर्शन के दौरान किस तरह कलाकारों और दर्शकों के अनौपचारिक और मुखर संबंध होते हैं, प्रदर्शन के मुख्य आकर्षण वाले कलाकार के प्रवेश से पहले बाँधी जाने वाली हास्य और मनोरंजन से भरपूर भूमिका की प्रस्तुति किसी बौद्धिक या तार्किक निकष पर नहीं तौली जा सकती। नौटंकी देखने आए पुरुष दर्शकों की मानसिकता, स्त्री-कलाकार के प्रति उनके नज़रिये को यहाँ निर्देशक के गहरे निरीक्षण से उपजी हुई यह परिघटना प्रस्तुत करती है। विशुद्ध हास्य की सामूहिक रचना का यह एक बहुत सहज मगर संतुलित उदाहरण है। कहीं कोई फूहड़पन नहीं, कहीं कोई विरूपण नहीं। लोक का स्वस्थ, सामूहिक और परस्पर गूँथा हुआ समाज-मन और व्यवहार मंच पर अपने ग्रामीण ताज़ेपन की महक से लबरेज़ था।

रायरा आर्ट की यह प्रस्तुति रोशिनी अचरेजा द्वारा निर्मित थी। अबीर यादव प्रोडक्शन डिज़ाइनर थे। रंगमंच पर बड़ी संख्या में कलाकारों को लेकर नाटक करना आज बहुत मुश्किल हो गया है। मुंबई जैसी जगह में तो रिहर्सल के लिए जगह मिलना काफ़ी मुश्किल और महँगा रहा है। साथ ही लगभग साठ-पैसठ साल पुराने ग्रामीण जीवन की कहानी के वातावरण और समाज-जीवन की घटनाओं, गतियों, संबंधों को आज के युवा कलाकारों के साथ मंच पर जीवंत करना निर्देशक के लिए चुनौती थी। कहानी में वर्तमान परिस्थितियों पर कोई टिप्पणी न होने के बावजूद नाटक हमें समसामयिकता का अहसास कराता रहता है। मुट्ठी भर लोगों के लिए जीवन-स्थितियाँ इक्कीसवीं सदी की संपन्नता लिए आई हैं, मगर बहुत बड़ी जनसंख्या आज भी पिछली सदी की दुश्वारियाँ झेल रही है।
लगभग सभी कलाकारों का अभिनय, कोरस की गतियाँ और गीत-संगीत-नृत्य, प्रतीकात्मक मंच-सज्जा, मगर काफ़ी सारे रंग-उपकरणों के साथ बैक स्टेज के क्रियाकलाप भी करना, लोक-नाटक के अनुरूप प्रकाश-परिकल्पना, वस्त्र-सज्जा और रूप-सज्जा आकर्षक थी।
नाटक में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका थी संगीत मंडली की। जीवंत गीत-संगीत नाटक की जान था। रघुबीर यादव के साथ हारमोनियम पर थे सिद्धार्थ जोशी। ड्रम और अन्य ताल वाद्य पर थे वीरेंद्र जानी। तबला – नयनेश पिंपले, दिलरुबा – हृषिकेश करमरकर, गायन-स्वर थे – रघुबीर यादव, सिद्धार्थ जोशी, आशीष कुमार मिश्रा, दिनेश कुमार, रजनीश पाल, रघुजित सिंह, श्रिया पाठक, हृषिकेश करमरकर तथा कोरस। मंच पर अभिनय कर रहे थे हीरामन – अमित मौर्य, हीराबाई – सम्प्रीति नेहा, हीरामन का बैल एक – शिवम् शुक्ला, बैल दो – विकी राजवीर, दरोग़ा/चालक/बैल चार/पलटदास – प्रवीण गौड, हवलदार/घोड़ा/बैल चालक/मास्टर जी – दिनेश कुमार, सिपाही/लहसुनवा – आदर्श जिज्ञासु, बच्चे/डांसर्स – श्रिया पाठक, श्रेया श्रीवास्तव, दहीवाली – तन्मयी कांबलेकर, मैनेजर – राजशेखर, साइकलवाला/मजनूँ/लफ़ंगा – रघुजित सिंह, लीकवाला – आशीष मिश्रा, बैल तीन/लैला/बहादुर – जय प्रकाश झा, लाल मोहर – आर्यन इक़बाल, धानीराम/डांसर – ईशा किरण, चाचा – रघुबीर यादव, एनाउंसर – राज शेखर, मुश्तरी बेगम – रोशिनी अचरेजा, पोस्टमैन – रजनीश पाल। कोरियोग्राफी थी श्रिया पाठक की। मंच परे की तकनीकी टीम में थे – प्रोडक्शन मैनेजर – शिवम् शुक्ला, पोस्टर डिज़ाइन – चेतना मिश्रा, लाइट डिज़ाइन – त्रिनेत्र, साउंड डिज़ाइनर – निखिल वर्गीस, कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर – सम्प्रीति नेहा तथा प्रवीण गौड़, मेकअप – बाला तथा सम्प्रीति नेहा, बैकस्टेज – रितिक तथा दिव्यांश, स्टेज मैनेजर – आदर्श जिज्ञासु तथा आशीष कुमार मिश्रा, क्रिएटिव्स थे आर्यन इक़बाल के।
भारतीय लोक-नाटकों की परंपरा को हबीब तनवीर से आगे नई आधुनिक ऊँचाइयों तक ले जाता है रघुबीर यादव द्वारा रूपांतरित, निर्देशित एवं संगीत-निर्देशित नाटक ‘मारे गए गुलफाम’। वर्तमान में नफ़रत की जो आँधी फैलाई जा रही है, उसमें फणीश्वर नाथ रेणु की इस प्रेम-कहानी का नाट्य-रूपांतरण और उसकी रंगारंग संगीतमय प्रस्तुति शीतल हवा का झोंका महसूस हुई।

बहुत बढ़िया।तीसरी कसम फिल्म ऑंखों के सामने से गुज़र गयी। रघुबीर यादव जी पर अनादि की फिल्म अद्भुत है।